आई मिलन की बेला – दिलचस्प अफ़साना – हुमैरा राहत

अम्मां बी ने कुछ गलत भी तो नहीं कहा साहिरा आपी। निदा ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए कहा।

“जरा ठन्डे दिमाग से सोचें, ऐसा कब तक चलेगा, अच्छे रिश्ते हमेशा नहीं आएंगे, वक्‍त भाग रहा है आपी।” “निदा में क्या करू तू ही बता?”

उसने अपनी हल्की सुर्ख होती गहरी आंखों को ऊपर उठाया। में जान बुझकर तो नहीं करती ऐसा, मेरी आदत ही ऐसी है।” उसका लहजा ज्यादा धीमा हो गया।

“आपी।’ निदा ने दबी हुई आवाज़ में कहा । “वह आदतें बदल लेनी चाहिए जो आपकी खुशबू का रास्ता रोके हुए हों ।

आपके लिए तकलीफ की वजह बनती हों । अब मेरी तरफ देखिए” निदा ने उसका चेहरा अपनी तरफ किया “मुझ से वादा कीजिए आप अपने आपको बदलेंगी।”

वह बुत बनी खड़ी रही। “कीजिए न वादा…..” निदा ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। “मैं कोशिश करूगी।” साहिरा ने शर्मिन्दा लहजा में कहा।

“वेरी गुड…..यह हुई न बात।” निदा ने उसे गले लगा लिया। मन्सूर शाह की वफात हुए 27 साल गुजर गए थे।

अम्मां बी हमेशा के लिए गांव छोड़कर बेवा बहू और पोतियों की ढारस बनने बड़ी हवेली शिफ्ट हो गई थीं।

उनका दिल नौजवान बहू को बेवगी के लिबास में देखकर बहुत कुढ़ता। उन्होंने कई बार इशारों में शाजिया बेगम से दूसरी शादी के लिए कहा, मगर शाजिया बेगम के लिए अब सब कुछ मन्सूर की निशानी यह दोनों बेटियां ही थीं।

वक्‍त गुजरता गया। शाजिया बेगम के बालों में सफेदी उतर गई। दोनों बेटियों के चेहरों पर जवानी फूलों में जौबन की तरह खिल खिला उठी थी।

एक अरसे तक खामोश रहने वाली मन्सूर हवेली अब छोटी निदा की हसीं शरारतों ओर कहकहों से गूंजने लगी। निदा जितनी शोख थी साहिरा उसके बिल्कुल बरअक्स थी।

निदा जितनी बातूनी वह इतनी ही खामोश सारे दिन में वह मुश्किल से तीन चार जुमले बोलती थी। बकौल अम्मां बी जब से उनकी समाअत कमजोर हुई है कई कई हफ्ते गुजर जाते हैं साहिरा की आवाज सुने यूं लगता है जैसे वह इस घर में है ही नहीं।

“अरे बेटा…. थोड़ा सा तो बोल लिया कर …इन बूढ़े कानों को हमेशा तेरी आस रहती है ।” अम्मां बी अक्सर उसे समझाती । “ठीक है अम्मां।”

वह भी अक्सर इतना ही कहकर चली जाती। “फिर एक दिन मन्सूर हवेली एक बार फिर खामोश हो गई। दो साल पहले साहिरा के लिए एक बहुत भले घर से रिश्ता आया। अम्मां बी को पूरा यकीन था कि रिश्ता तय हो जाएगा और उनका यकीन सच भी हुआ ।

फोन की घंटी बजते ही शाजिया बेगम ने बसब्री से फोन उठाया। कुछ देर बाद उन्होंने जितनी गरम जीशी में फाेन उठाया था उतने ही दुःख से रख दिया ।

अम्मां बी जो बड़ी तवज्जोह से शाजिया बेगम की तरफ देख रही थी और मन ही मन में सुशखबरी का इन्तिजार कर रही थीं। शाजिया बेगम को इतना परीशान देखकर चौंक गई।

“अरे, क्या हुआ बेटी? अम्मां बी ने घबराकर पुछा। “क्या बताऊं अम्मां! शाजिया बेगम ने तख्त पर तकरीबन गिरते हुए कहा।

“हुआ क्या है कुछ बोलेगी भी ।” अम्मां बी ने माथे पर सिलवटें लाते हुए कहा। ”अम्मां वह शहला बहन का फोन था ।” उन्होंने हकलाते हुए कहा।

“अरे यह तो अच्छी बात है।’ अम्मां बी ने पानदान गोद में रखा। “अच्छी बात नहीं है अम्मां।” शाजिया बेगम ने सर को झटका दिया।

“उन्होंने कहा है कि उन्हें अपने बेटे के लिए साहिरा नहीं निदा पसन्द है।” “हाय वह क्‍यों?” अम्मां बी ने सीने पर हाथ मारा।

“पता नही अम्मां, कहने लगी साहिरा भी बहुत प्यारी है मगर उन्हें अपने बेटे के लिए निंदा ज्यादा पसन्द है।” “ओह खुदाया….यह क्या हो गया। “अम्मां बी ने सरहाने से सर टिका दिया।

कई दिन घर में बहस चलती रही। आखिरकार निदा के रिश्ते के लिए हां कर दी गई । अब उसकी शादी को भी दो साल हो गए थे । मन्सूर हवेली बिल्कुल खामोश थी।

साहिरा जो पहले ही कम बातें करती थी अब वह और कम बोलने लगी। कुछ अरसे बाद चची नसीरा साहिरा के लिए एक और रिश्ता लायीं । घर भर में खुशी की लहर दौड़ गई।

अम्मां बी ने निदा को भी फोन कर दिया। आने वाले मेहमानों के लिए इस तरह तय्यारियां हो रही थीं जैसे अभी साहिरा की शादी हो रही हो। जर्द और फीरोजी कन्ट्रास्ट सूट में साहिरा बहुत खूबसूरत लग रही थी।

“आपी प्लीज! थोड़ी सी बात चीत भी करना अच्छे खुशगवार मूड में रहना। खामोश गुम सुम न बैठी रहना।” निदा ने यह बात उसे चौथी मरतबा समझाई थी। “अच्छा ठीक है निदा ।” वह अब झुंझला गई।

“हाय निदा, क्यों मेरी बच्ची को सता रही है।” अम्मां ने निदा को हल्की सी चपत लगते हुए कहा। ‘ वैसे भी ज्यादा बोलना अच्छी बात नहीं ।” अम्मां ने साहिरा की साइड ली ।

“ज्यादा बोलने की कौन कमबख्त कह रहा है अम्मां बी, में तो सिर्फ यह कह रही हूं कि बिल्कुल खामोश न रहना आपी। थोड़ी बातचीत करना, थोड़ा हंसी मजाक करना उन लोगों को अच्छा लगेगा।”

निदा ने साहिरा का दोपट्टा ठीक करते हुए कहा। साहिरा ने बड़ी मुश्किल से दो या तीन मर्तबा बात की होगी वह भी निदा के इस दौरान बार बार घूरने पर। उस्मान अजीज की फैमिली रिश्ते के बारे में फोन करके बताएंगे कह कर रुखसत हो गई ।

एक हफ्ते के इन्तिजार के बाद मिसेज उस्मान का फोन आया। “कैसी हैं बहन?” शाजिया बेगम ने बड़े चाव से पूछा। “मैं ठीक हूं और अम्मां बी और आप कैसी हैं?” “हम भी ठीक हैं।”

शाजिया बेगम ने बड़े इत्तमीनान से जवाब दिया। कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद आखिर शाज़िया बेगम ने पूछ ही लिया। “आप ने रिश्ते के बारे में क्या सोचा है बहन?” “मैं वही बताने लगी थी।”

मिसेज उस्मान ने गला साफ करते हुए कहा। “जी जी बताएं, में सुन रही हूं।” शाजिया बेगम ने रिसीवर को कान पर दबाते हुए कहा । “आपकी बेटी प्यारी तो है, मगर मुझे ऐसी बहू नहीं चाहिए।”

मिसेज उस्मान ने हल्के सख्त लहजे में कहा। “क्या….यह आप क्या कह रही हैं?” शाजिया बेगम ने मायूसी भरे लहलजे में कहा।

“तो फिर केसी बहू चाहिए।” वह अगले ही लम्हे संभल गई। “मेरा मतलब यह है।” मिसेज उस्मान ने कहा। “मेरी बहू ऐसी होनी चाहिए जिसके आने से घर में रौनक हो जाए

जिसकी बातों और हंसी से घर चहक उठे, मगर आपकी बेटी…..” वह कुछ लम्हों के लिए रुक गई। शाजिया का दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मगर आपकी बेटी तो कुछ बोलती ही नहीं ।” वह फिर बोली ।

“बोलना तो दरकिनार वह तो किसी बात का ठीक से जवाब तक नहीं देती, न हंसती है न बोलती है, बस गुम सुम रहती है। मुआफ कीजिएगा बहन, मगर मुझे लगता है कि वह इस रिश्ते से खुश नहीं है, कहीं कोई और तो…” “नहीं, नहीं।”

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शाज़िया बेगम ने टोक दिया। “ऐसी कोई बात नहीं।” उन्होंने सफाई दी। “ठीक है, खैर हमें इससे क्या….हमारी तरफ से तो इन्कार है।” “ऐसा न कहिए बहन।” शाजिया बेगम ने गुजारिश के अन्दाज में कहा।

“उसकी आदत है वह शुरू ही से ऐसी है। आहिस्ता आहिस्ता बदल जाएगी।” “रहने दीजिए बहन।” दूसरी तरफ फैसला अटल था । इसलिए अगले ही सिकैंड फोन पटाख से रखने की आवाज आई।

शाजिया बेगम सर पकड़ कर बैठ गई। “क्या हुआ अम्मी?” निदा ने मां को इस तरह बैठा देखा तो सवाल किया। उन्होंने कोई जवाब न दिया। “अम्मी ….” निदा ने अपनी मां का बाजू झिंझोड़ा।

“मिसेज उस्मान का फोन था।” मां ने सर उठाकर थकी थकी आवाज में कहा। “ओह…..फिर…..” निदा ने मां की हालत देखकर सूरतेहाल समझते हुए कहा । “फिर क्या….. इन्कार कर दिया ।”

शाजिया ने बीमार सी आवाज में कहा । “इन्कार कर दिया!” निदा ने मां की बात जेरे लब दोहराई जैसे खुद की यकीन दिला रही हो ।” मगर क्‍यों अम्मी?” निदा ने तड़प कर पूछा।

“उन्होंने कहा कि उन्हें घर के लिए रौनक चाहिए मगर हमारी साहिरा तो ठीक से बात का जवाब भी नहीं देती।

न हंसती है न बोलती है यू लगता है किसी चीज का रोग लगा हो, इतनी खामोश लडकी कैसे घर की रौनक बढ़ा सकती है।”

अपनी मां के अल्फाज साहिरा के कानों में बिजली की तरह गिर रहे थे। वह फर्श पर ही बैठ गई। “मैं कहती थी इस लड़की से थोड़ा बोल लिया कर, क्या सारी उम्र बाबा के घर ही रहना है ।”

अम्मां बी ने चीखते हुए कहा । “यही वजह थी अम्मां बी ।” निदा ने खड़े होते हुए ऊंची आवाज़ से कहा। “जानते हैं आप लोग, मैं क्‍यों बार बार साहिरा आपी से कह रही थी कि उन लोगों से कुछ बातें कुछ हंसी मज़ाक करना, क्योंकि मैं जानती हूं उनके पहले रिश्ते के इन्कार की वजह भी यही रही थी।”

निदा ने लफ्ज़ों को चबाते हुए कहा । शाज़िया बेगम और अम्मां बी की आंखें फट गई। अन्दर साहिरा के कानों में निदा की आवाज बगैर किसी रुकावट के पहुंच रही थी। उसकी आंखों में हजारों आंसू ठहर गए।

“अम्मी कसूर आपी का नहीं है।” निदा ने मां को समझाते हुए कहा। “मगर जमाना यह बातें नहीं समझता है, बल्कि कुछ और ही समझता है।

आप आपी को बदलने की कोशिश करें।” निदा लगातार बोलती गई । वह शाम मन्सूर हवेली की बाकी शामों से ज्यादा खामोश और उदास थी।

अगली सुबह से ही साहिरा पे मेहनत शुरू हो गई खुद साहिरा भी इन हालात से तंग आ गई थी। वह भी खुद को बदलना चाहती थी। कई महीने गुजर गए।

अम्मा और शाजिया बेगम सारा दिन बगैर किसी वजह के साहिरा से बातें करती, मगर साहिरा पर कुछ ज्यादा असर नहीं हुआ।

उसकी शखसीयत में सिर्फ उन्‍नीस बीस का फर्क आया । वह जूं की तू थी। अम्मी बी और शाजिया बेगम कुछ इसलिए भी परीशान थीं कि इतने महीने गुजर गए साहिरा के लिए कोई भला रिश्ता नहीं आया।

“रोजे आने वाले हैं। अम्मां बी सोच रही हूं निदा को रमजान में यही बुलवा लूं। साहिरा का मन भी बट जाएगा।

शाजिया ने शाइस्तगी से अम्मां से कहा । “हां ठीक है।” अम्मां बी ने आहिस्तगी से जवाब दिया । शाजिया बेगम ने निदा को फोन किया ।

“हैलो अम्मी कैसी हैं आप? अम्मा बी और साहिरा आपी कैसी हैं?” निदा ने शोख सी आवाज में पूछा । “सब ठीक हैं बेटा…..और तुम्हें याद भी कर रहे हैं, सोच रही हूं कि तुम रमज़ान में यहीं आ जाओ । उन्होंने मुहब्बत से कहा ।

“अम्मी मैं आपको एक दो दिन में बताऊंगी इस बारे में, बल्कि बहुत जरूरी बात करनी है आपसे ।” निदा ने राजदाराना तरीके से कहा। “हां, हां, तो करो, क्या बात करनी है।”

शाजिया बेगम ने जोर देकर पूछा । “वह में आकर बताऊंगी।” निदा ने शरारती लहजे में कहा। “अच्छा अल्लाह तुम्हें खुश रखे बेटा, ठीक है।

उन्होंने दुआ देते हुए रिसीवर रख दिया। तीन दिन गुजर गए। अम्मां बी मुसल्ला पर बैठी मगरिब की नमाज अदा कर रही थीं कि शाज़िया बेगम की खुशी वाली आवाज़ गूंजी।

“अम्मां बी, साहिरा रमजान का चान्द नज़र आ गया। रमजान मुबारक हो।” “या अल्लाह तेरा शुक्र है तू ने रमजान के रोजे रखने की सआदत बख्शी।

“अम्मां बी ने दुआ के लिए हाथ बलन्द किए तो छत की तरफ निगाह चली गईं । साहिरा खामोश गुम सुम सी खडी चान्द को देख रही थी। अम्मां बी का कलेजा मुंह को आ गया।

“’ऐ अल्लाह, मेरे परवर दिगार….मेरी बच्ची का नसीब खोल दे, मेरी बच्ची को ऐसा साथी अता कर जो उसे समझ सके, आमीन।” अम्मां बी ने झुके झुके ही मुसल्‍्ला उठाया और तख्त पर बैठ गयी।

तभी पास रखे फोन की घंटी बजी। उन्होंने ही फोन उठाया। “फैलो कौन…..?” “अम्मां बी में आपकी निदा, रमजान मुबारक अम्मां बी।”

“अरे खैर मुबारक बेटी….तुम्हे भी मुबारक हो, अब कब आ रही हो तुम?” “पहले एक खुश खबरी तो सुनें।” निदा ने पुरजोश आवाज़ में कहा।

“कैसी खुश खबरी बेटा ।” अम्मां बी ने हैरानी से पुछा। “अम्मां बी मेरी एक दोस्त है शाइस्ता, इसकी फैमिली साहिरा आपी को अपने बेटे अली के लिए देखना चाहती है।” “शुक्र ।” अम्मां बी ने फौरन अल्लाह तअला का शुक्रिया अदा किया ।

खुशी से उनकी आंखें भर आई। “ऐ शाजिया बहू ।” वह जब भी खुश होतीं तो शाजिया बहू कहकर पुकारती। “देखो यह अपनी यह अपनी निदा क्‍या कह रही है भला ।” शाजिया बेगम दौड़कर आयी।

निदा से बात करके वह भी खुशी से चहक उठीं। “ठीक है अम्मी मैं कल ही आ जाऊंगी।” निदा ने कहा । साहिरा तक भी ख़बर पहुंच गई थी। वह भी मन ही मन में बहुत खुश हुई ।

“कुछ भी हो, मैं अब अपनी मां के लिए परीशानी का सबब नहीं बनूगी।” उसने दिल में ठान ली। “पहला रोजा था। साहिरा निदा के आने पर काफी खुश थी…..मगर वह अपनी खुशी का इजहार भी बहत कम किया करती थी।

दो तीन दिन निदा, साहिरा के साथ मगज़ खोरी करती रही । आपी आप यह सूट पहनना, आपी आप खूब बोलना, शाइस्ता मेरी दोस्त है उससे खूब गप हांकना । सबीहा खाला से भी खूब बातें करना कि वह बस खुश हो जाए।

निंदा, साहिरा को कोई बीसियों मर्तबा सबक पढ़ाती । “साहिरा आपी यूं समझें कि बस आप को थोडी देर के लिए निदा बनने का ड्रामा करना है किसी तरह ।”

“अच्छा ठीक है बाबा ।” साहिरा ने मुस्कुराकर कहा। पांचवे रोजे को निदा ने अफ्तारी पर शाइस्ता की फैमिली को दावत दी।

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अफ्तारी के लिए दोपहर से ही तेय्यारियां शुरू हो गई । साहिरा ने भी खुद चिकन पकोडे बनाए। “आपी मैं ने आपके चिकन पकोड़ो की बड़ी तारीफ की है उनके सामने ।”

निदा ने चटखारे लेकर कहा। “अच्छा बस । शाजिया बेगम ने निदा के कान खींचे और पकौड़ों को हाट पाट में रख दिया। अस्र के वक्‍त शाइस्ता की फैमिली मन्सूर हवेली पहुंची।

अस्र की नमाज अदा करने के बाद सभी लोग हाल में बैठ गए। आज साहिरा पहले से कहीं ज़्यादा खूबसूरत और जहनी तौर पर मुकम्मल तय्यार थी।

शाइस्ता उसके पास आ बैठी और साहिरा ने निदा का पढ़ाया हुआ सबक जहनी तौर पर दोहराया और अगले ही लम्हे निदा का लिबादा ओढ लिया और ऐसा ओढ़ा कि शाइस्ता को भी न बालने दिया । वहां पर बैठे सभी लोग खुश थे।

यंू लग रहा था कि रिश्ता देखने शाइस्ता नहीं साहिरा आई थी, मगर अली जो कुछ देर पहले उसको देखकर बहुत खुश हुआ था अब गुम सुम सा बैठा था।

साहिरा के इस अन्दाज़ पर सभी घर बाले हैरान थे। साहिरा ने न सिर्फ शाइस्ता, बल्कि उसकी सारी फैमिली के सामने ऐसे बोल कर दिखाया जैसे आज उसकी ज़बान का इम्तिहान हो ।

उनके सवाल किए बगैर साहिरा ने सब सवालों के जवाब दे डाले। पुरतकल्लुफ अफ्तारी के बाद शाइस्ता की फैमिली कुछ रोज बाद दोबारा आने का कहकर रुखसत हो गई।

उस दिन से मन्सूर हवेली साहिरा की किस्मत खुलने का इन्तिजार करने लगी। बारहवीं रोजे की शाम थी दोनों मां बेटे में बहस हो रही थी। “अली बेटा आखिर किस चीज की कमी है साहिरा में, खूबसूरत है, खुश अखलाक है।

इस घर में आएगी तो रौनक हो जाएगी । शाइस्ता तो अपने घर की हो गई है और तुम इतने खामोश रहते हो कि तुम से बात करना दीवार पर टक्कर मारने के बराबर है।” सबीहा बेगम ने माथे पर हाथ रखते हुए कहा ।

“मम्मां मैं ने आप से कहा था न कि मुझे कम बोलने वाली लड़की पसन्द हैं। मुझे मेरी नेचर जेसी लड़की चाहिए थी। मियां बीवी अगर एक मिजाज के हों तो एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

मुझे नहीं करनी साहिरा सें शादी जो हम से पहली ही मुलाकात में एक मिनट के लिए चुप नहीं हुई । “या अल्लाह! सबीहा बेगम ने कांपती आवाज़ में कहा। क्या जवाब दूंगी मैं शाइस्ता को निदा उसकी इतनी प्यारी सहेली है और वह बच्ची साहिरा, कितनी आस थी उसकी आंखों में ।”

सबीहा बेगम की आखें भीग गयीं । एक के बाद एक दिन गुजरता गया। उन्‍नीसवां रोज़ा आ पहुंचा । मन्सूर हवेली में अब इस रिश्ते की आस भी दम तोड़ गई थी। उधर मां बेटे की तकरार बढ़ती जा रही थी।

“मम्मा आप नहीं समझ रहीं। में खुद उनको जवाब दे आऊंगा। शाइस्ता आपी को भी बताने का कोई फाइदा नहीं हुआ । अली ने गुस्से से मा से कहा । “चुप कर नालायक ।”

सबीहा बेगम एक बार फिर बिगड़ गई। “जा रहा हूं में खुद उन लोगों को मना करने ।” वह गुस्से में उठकर चला गया।

“मन्सूर हवेली की उदासी उस वक्‍त कुछ छटी जब निदा चान्द रात के लिए मन्सूर हवेली आ पहुंची, मगर साहिरा के चेहरे पर मायूसी पर फेैलाए खड़ी थी।

साहिरा की नम आंखें निदा से छुप न सकी अभी तो निदा ने घर वालों को कुछ बताया भी नहीं था, क्योंकि आखिरी बार शाइस्ता से जब उसकी बात हुई तो वह उनका फैसला तक्रीबन जान गई थी।

“साहिरा आपी।” निदा ने दुख से उसे पुकारा । “मैं दरवाजा बन्द कर आती हूं पता नहीं किस ने खुला छोड़ दिया ।” साहिरा नज़र चुराकर छत से नीचे उतर आई ।

“साहिरा आपी ।” निदा उसके पीछे पीछे चल दी ।” साहिरा आपी क्‍या हो गया है आपको? वह उसके पीछे पीछे गेट पर ही पहुंच गई। वह खामोश रही।

“साहिरा आपी प्लीज कुछ तो बोलिए।” निदा ने उसका बाज झिंझोड़ा । “क्या बोलूं निदा?” वह फट पड़ी। “कितनी तकलीफ देकर, कितनी तकलीफ सहकर में ने अपने

आपको शाइस्ता की फेमिली के सामने पेश किया, मैं ने अपनी पूरी जिन्दगीद में शायद कभी इतना न बोला हो ओर न अब कभी बोलूंगी। अपनी फितरत से लड़कर एक ड्रामा किया ताकि यह रिश्ता तय हो जाए, मेरी वजह से तुम लोगों को और दुख न मिलें ।”

साहिरा की आंखों से आसूं निकले।” मगर अब मान लो निदा, मेरे नसीब में ही शादी नहीं है । अब कम से कम यह तो साबित हो गया कि मेरे खामोश रहने की आदत का इस में कोई कसूर नहीं है ।

अब मैं जैसी हूं वैसी हूं और वैसी ही रहूंगी । अब किसी को रिश्ते के लिए आना है तो आए और अगर नहीं आना तो न सही ।” साहिरा ने आंसू साफ करते हुए कहा । “निदा….ओ निदा।”

अम्मां बी की आवाज आई तो वह अभी आई आपी कहकर चली गई। वह दरवाजा बन्द करने लगी। “जरा रुकिए।” साहिरा के सामने वही चेहरा उभर आया उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

“आप यहां?” साहिरा ने हिचकिचाते हुए कहा । “जी में आया तो किसी और मकसद के लिए था, मगर अब समझ आया कुदरत ने मुझे यहां इस मकसद के लिए भेजा था।”

“मैं समझी नहीं।” साहिरा ने फिर कहा । “कोई बात नहीं, अब तो पूरी जिन्दगी पड़ी है समझने समझाने के लिए, फिर कभी समझा दूगा।” साहिरा फटी फटी आंखों से उसकी तरफ देखने लगी।

“एक बात कहूं!” उसने फिर कहा । “जी!” साहिरा ने नज़रें झुका कर जवाब दिया। “अब आपको खुद को बदलने की जरूरत नहीं, क्योंकि खुदा ने मुझे आपका नसीब बनाकर भेज दिया है।”

सफेद दोपट्टा उसके सर पर था। वह हल्की हल्की रौशनी में और भी खूबसूरत लग रही थी। “चान्द मुबारक ।” गली से बच्चों का शोर आ रहा था । “मेरे चान्द को भी चान्द मुबारक हो ।”

उसने साहिरा की आंखों में झांकते हुए कहा । वह शर्मा गई। “क्या आप ईदी के तौर पर इस नाचीज के साथ पूरी जिन्दगी गुजारना पसन्द करेंगी?” साहिरा को अपनी अखों और कानों पर यकीन नहीं आ रहा था।

“क्यों नहीं !” पीछे से जोर दार आवाज आई। “मेरा मतलब है, आपी क्‍यों नहीं गुज़रेंगी आपके साथ ज़िंदगी।” निदा की शोख सी आवाज ने दोनों को चौंका दिया ।

“और अली भाई….ऐसी ईदी तो आपी कभी न छोड़ें ।” निदा ने साहिरा को कोहनी मारी तो वह हड़बड़ा गई ।

यह ईद मन्सूर हवेली के लिए खुशियां लाई थी। साहिरा की मुस्कुराहट और झुकी नजरें उन दोनों के मिलन का एतेराफ कर रही थीं।

हुमैरा राहत

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