महकता आँचल स्टोरी बुक

“मैडम आज खाने में क्या बनाना है?” नौकरानी उनके पीछे ड्राइंग रूम में ही चली आई थी। “कीमा मटर, बिरयानी।” कुलसूम बेगम के लहजे में प्यार था- “आज इतने दिनों बाद मेरा बेटा घर आ रहा है। खाना भी उसकी पसन्द का होगा।”

कुलसूम बेगम अपने बेटे के आने का सुन कर बहुत खुश हो गयी क्योंकि इस बार वह काफी दिनों के बाद आ रहा था। वह बहुत दिनों से उसके लिए उदास थीं।

कुलसूम बेगम ने उसका बेड रूम साफ करवाया और नौकरानी को उसकी फेवरेट डिशें बनाने का ऑर्डर भी दे दिया। पूरा दिन बेटे के आने की तय्यारियों में ही गुजर गया।

शाम के साये ढल रहे थे जब गेट पर उसकी गाडी का हार्न सुनाई दिया। वह तेज कदमों से गेलरी पार करती हुई बाहर निकल आई थीं। इतने में वह भी गाडी से उतर आया।

“अस्सलामु अलैकुम अम्मां!”  वह उनके सामने झुक गया।और कुलसूम बेगम ने उसके माथे को चूमते हुए उसे सीने से लगा लिया- “मेरे बच्चे! जीते रहो, खुश रहो।” वह उसके कन्धों और बालों पर हाथ फेर रही थीं और दोबारा फिर उसके माथे को चूमा था।

“कैसी हैं आप?” वह उनके दोनों हाथ चूम कर आंखों से लगाते हुए बोला। “अपने बेट को देखती हू तो जवान हो जाती हूं। सारे ग़म भूल जाती हूं।” उनकी आवाज ही नहीं आंखें भी भीग गई थीं।

शौहर के मरने के बाद बेटा ही कुलसूम बेगम का एक सहारा था। शाहान उनको अपने बाजू के घेरे में लेकर अन्दर ले आया था। “आप तो रो रही हैं अम्मी!” उसने अम्मी को सोफे पर बिठाते हुए कहा।

“नहीं बेटा! यह तो खुशी के आंसू हैं।” “अम्मी! क्या हो गया है, खुशी में आंसू कैसे आ सकते हैं” बेटा! जब तुम्हें बहुत बड़ी खुशी मिलेगी तो आंसू खुद ही आ जाएंगे। और वह खुशी के आंसू होंगे। वह उठ खड़ी हुयी।

“आप कहां जा रही हैं?” “तुम्हारे लिए जूस ले आऊं।” “अरे नहीं अम्मी! आप मेरे पास बैठें। में खुद ले आऊंगा। फिर नौकरानी को आवाज दे दीजिए।” उसने उनको रोकना चाहा।

“नौकरानी को क्यों, मैं खुद अपने बेटे के लिए जूस लेकर आती हूं।” वह नर्मी से कह कर किचन में चली गई थीं। कुछ देर ठहरने के बाद उसके लिए जूस ले आई थीं। आप मेरे पास बैठें और यह बताएं कि आप इतनी कमजोर क्‍यों लग रही हैं?”

लेकिन मैं तो आज अपने आप को जवान समझ रही हूँ । वह मुस्कुराने लगी। “लगता है आप खुद को टाइम नहीं दे रही हैं। 

“अरे छोड़ो क्या बात लेकर बैठ गए। बताओ अरसलान कैसा है? तुम्हारा वहां काम कैसा जा रहा है और कब सारा बिजनेस यहाँ लेकर आ रहे हो?” कुलसूम बेगम ने एक ही वक्‍त में इतने सवाल कर दिए।

“अम्मी इतने सारे सवाल एक ही बार में। पहला सवाल, अरसलान बिल्कल फिट है । आपको याद कर रहा था। दूसरा, काम भी बहुत अच्छा जा रहा है। और रही मेरी बात, मै बहुत जल्द ही आपके पास आ रहा हू हमेशा के लिए।”

शाहान ने मुस्कुरा कर जवाब दिया- “अब आप खुश हैं?” हां बेटा! तुम्हारे बगैर घर में रौनक नहीं होती।

“मैडम! खाना लग गया है।” नौकरानी ने आवाज दी। “चलो बेटा! खाना लग गया है।” ओ.के. अम्मी! आप चलें, मैं अभी फ्रेश होकर आया।” वह खाना खाने में बिजी हो गए। “बेटा! खाना कैसा था?” “बहुत अच्छा।” वह रात के खाने के बाद बातें कर रहे थे- “और सुनाएं।”

“हां बेटा! याद आया। तुम्हारी खाला की बेटी नवाल का रिश्ता पक्का हो गया है। बहुत अच्छे लोग हैं। लड़का जर्मनी में रहता है। बड़ा कारोबार वहां है उसका। फैमिली भी अच्छी है। शाहान की मां बड़ी खुशी से यह सब उसे बता रही थीं। वह नहीं जानती थीं कि उनके बेटे पर क्या गुजर रही है।

शाहान ने सोचा था कि इस बार जाकर अम्मी से बात जरूर करेगा। अम्मी को बहुत खुशी होगी और वह नवाल के घर वाले यानी खाला (मौसी) रजिया से बात करेंगी। शाहान को यकीन था कि खाला और खालू जरूर मान जाएंगे।

नवाल मेरी हो जाएगी और फिर वह उसे बताएगा कि वह नवाल से कितना प्यार करता है। शाहान की सारी खुशी मिट्टी में मिल गई।

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वह चुपचाप छत पर आ गई थी। वह अकेली ही छत पर टहलने लगी। जहन उलझा हुआ था इसलिए इस तन्हाई की जरूरत महसूस हो रही थी। आसमान सितारों से भरा हुआ था  लेकिन उसके दिल से सारी रोशनी गायब हो चुकी थी।

अल्लाह ने इन्सान के अलावा बाकी हर चीज को बेफिक्र क्यों बनाया है। वह सितारों की टिमटिमाती रौशनी देख कर सोचने पर मजबूर हुई थी।

चान्द, रात को बेफिक्री से निकलता और दिन को गायब हो जाता । सूरज, दिन को निकलता है और बेफिक्र होकर रात को गायब। बस एक ही बन्धी रूटीन।

लेकिन इन्सान का हर दिन पहले से अलग होता है और हर रात नई रात है। नई-फिक्रें और नई सोचें लेकर इन्सान हर रोज हलकान होता रहता है और बाकी सारी दुनिया बेफिक्र रहती है।

वह सितारों को देखते हुए न जाने क्या क्‍या सोच रही थी कि नीचे से हादिया की आवाज आई- “आपी! नीचे कमरे में आ जाएं। मैं सोने लगी हूं” काफी रात हो गई थी।

“क्या बात है आपी! आप ठीक तो है?  अकेली छत पर क्या कर रही थीं?” नवाल नीचे आई तो हादिया ने पूछा।

“ऐसे ही ऊपर छत पर चली गई।” “नहीं आपी! कोई बात तो जरूर है मैं काफी दिनों से देख रही हूं आप छत पर रोज़ाना जाती हैं। किसी के पास नहीं बैठती।

अम्मी को भी ऐसा लगा। वह मुझसे पूछ रही थीं। चुप चुप भी हैं।” हादिया को अपनी प्यारी बहन की फिक्र हो रही थी।

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“मैं ठीक हूं। दिन में आज काम ज्यादा था इसलिए शायद थकन हो गई है। तुम सो जाओ, मुझे भी नीन्द आ रही है।” हादिया को एक बात परीशान किए जा रही थी कि नवाल की किताब में शाहान भाई की तस्वीर कैसे थी। क्या नवाल आपी शाहान भाई से मुहब्बत करती हैं, और शाहान भाई भी?

यह दोनों आपस में मुहब्बत कब से करते हैं? शाहान भाई तो सिर्फ एक बार ही हमारे घर आए थे। क्या पापा के दोस्त के बेटे से आपी की मंगनी हुई है और आपी करना नहीं चाहती या फिर साथ ही निकाह की वजह से परीशान हैं?

हादिया के जहन में बहुत सारे सवाल थे जो उसे सोने नहीं दे रहे थे। उसने फैसला कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह कल अकेले में आपी से बात जरूर करेगी।

शाहान ने कमरे में झांका। कुलसूम बेगम बैठी थीं- “अम्मी! में आ जाऊ” शाहान ने कहा तो कुलसूम बेगम ने प्यार से बेटे की तरफ देखा- “कमाल है  अब माँ के पास आने के लिए भी इजाजत की जरूरत है।” वह मुस्कुरायी।

शाहान कमरे में आया- “आप बिजी तो नहीं थीं?”

“नहीं, बिल्कुल नहीं। अपने बेटे की बात सुनने के लिए तो मेरे पास टाइम ही टाइम है।” उन्होंने उसका हाथ थाम कर अपने पास ही बिस्तर पर बिठा लिया ।

“हां बोलो क्या बात है?” कुलसूम बेगम ने पूरी तवज्जोह उसकी तरफ की। शाहान ने एक नजर मां की तरफ देखा- “अम्मी! आप मुझसे कितना प्यार करती हैं?”

उन्होंने उसके झुके सर पर हाथ रखा। उसकी सन्‍जीदगी कुलसूम बेगम को परीशान कर रही थी क्योंकि आज पहली बार शाहान ने सवाल ही ऐसा किया था।

“अम्मी! बताएं ना।” शाहान के लहजे में जिद थी। “ओ हो मेरी जान! मेरे बच्चे! क्या बात है मुझे बताओ। मुझे परीशानी हो रही है।” अम्मी! मैं नवाल से मुहब्बत करता हूं और उससे शादी करना चाहता हू।”

शाहान ने सर उठा कर सन्‍जीदगी से कहा। उन्होंने बेयकीनी से उसकी  तरफ देखा- “ क्या कहा शाहान?” वह जैसे उससे और ज्यादा यकीन चाहती थीं।

“अम्मी! मैं आपको पहले भी बताना चाहता था लेकिन मैंने सोचा कि पहले कुछ बन जाऊं फिर बात करूंगा ताकि मेरी अम्मी उनकी तरफ फख्र से जाएं।” शाहान का लहजा मज़बूत था।

“लेकिन बेटा! मैंने तुम्हें बताया है कि इस फ्राइडे को उसकी मंगनी और निकाह है।” कुलसूम को समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह अपने बेटे को समझाएं। उसे एहसास, दिलाएं कि यह नहीं हो सकता।

“बेटा! तुमने बहुत देर कर दी। अब मैं आपा रजिया से क्या कहूं। और जिससे निकाह है वह महताब भाई के दोस्त का बेटा है। वह यह रिश्ता कैसे तोड़ सकते हैं बगैर वजह के।”

वह धीरे धीरे अपने बेटे को समझा रही थीं। “लेकिन अम्मी! प्लीज . ..।”

“क्या मैं तुम्हारी खुशी नहीं चाहती शाहान! बोलो जवाब दो । मैं तो हमेशा यह चाहती हूं कि अल्लाह मेरे बेटे की हर खुशी पूरी करे।” उन्होंने उसकी पेशानी पर आए बाल पीछे हटाए- बेटा! मुझे खुशी है कि तुमने अपने दिल की बात अपनी मां से शेयर की लेकिन बेटा! मैं बेबस हूं।

अब मैं कुछ नहीं कर सकती। मैं तो दुआ ही कर सकती हूं कि नवाल न सही तो कोई नवाल जैसी लड़की मेरे बेटे के नसीब में लिख दे।”

शाहान जान चुका था कि अब कुछ नहीं हो सकता- “अम्मी! मैं चलता हूं।” वह उठ कर जाने लगा तो अम्मी ने आवाज दी- “बेटा! नवाल भी तुमसे मुंहब्बत करती है?”

शाहान ने पीछे मुड़ कर मां को देखा- “अम्मी! मैं नहीं जानता” शाहान ने अपने साथ साथ मां को भी परीशान कर दिया था । कुलसूम बेगम सोच सोच कर परीशान हो रही थीं कि नवाल का ख्याल मुझे क्‍यों नहीं आया।

रात के खाने के बाद जब वह सोने के लिए कमरे में आया तो नवाल का चेहरा नज़रो के सामने आ गया। न जाने क्यों न चाहते हुए भी उसकी याद दिल से नहीं जा रही थी। फिर दिल के आगे हार कर  अरसलान को फोन किया ताकि उससे मशवरा ले सके।

वही तो उसका एक दोस्त था जिससे वह दिल की हर बात शेयर करता था। अरसलान ने दूसरी ही ब्रेल पर फोन रिसीव कर लिया।

“हैलो, कैसे हो तुम? दो दिनों से फोन क्यों नहीं किया ?” शाहान पहले ही बहुत परीशान था- “यार! छोड़ो सब बातें। तुम कल सुबह ही यहां आ जाओ। मुझे तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है।”

“क्या बात है? सब ठीक तो है ना?” “हां यार! तुम बस आ जाओ।” अरसलान जान गया था कोई तो बात जरूर है- “ठीक है मैं सुबह आ जाऊगा। अब खुश?” अरसलान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया और फोन बन्द कर दिया।

अरसलान भी सुबह का बेचैनी से इन्तिजार करने लगा। उसे शाहान की फिक्र हो रही थी, पहले तो उसने कभी उसे काल नहीं की थी।

“अस्सलामु अलैकुम आन्टी!” “अरे अरसलान बेटा! तुम्हें आज हमारी याद कैसे आ गई?” कुलसूम बेगम ने सामने से आते अरसलान को गले लगा लिया और प्यार किया।

“बैठो बेटा! मैं तुम्हारे लिए जूस लेकर आती हूं।” “आन्टी! जूस बाद में। पहले शाहान कहां है?” “ओ हो बेटा! वह अपने कमरे में है। तुम चलो, मैं वहीं जूस लेकर आती हूं।”

“थैंक्स आन्टी!  अरसलान को शाहान से मिलने की जल्दी थी। कमरे के दरवाजे पर दस्तक देकर अरसलान अन्दर दाखिल हुआ तो वह अपने कमरे की खुली हुईं खिड़की में खड़ा था।

“हैलो शानी! कैसे हो?” शाहान ने मुड़ कर देखा। अरसलान के गले लग कर फाइन कहा- “कब आए तुम?”

“अभी अभी । तुम बताओ क्या बात है? तुम्हें पता है मैं सारी रात सो नहीं सका कि क्या बात हो सकती है।”


6 Comments

  • Pappu khan · July 3, 2020 at 8:24 pm

    Please update regularly

    hasan khan · July 7, 2020 at 6:36 pm

    complete story kha read kre

      Faisal · July 22, 2020 at 10:08 am

      Complete story to hai bhai, 2 page hai dhyan se dekho

        Pappu khan · July 24, 2020 at 11:23 am

        Bhai ab naya story kyu nahi aata hai

    Pappu Khan · July 15, 2020 at 12:29 am

    Please update jaldi kare shukriya

    Pappu Khan · August 3, 2020 at 11:49 am

    Kya hua isper update nahi aayega kya

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