“यार! कुछ नहीं । बस परीशान हूं।” तुमने सलमान खान की तेरे नाम फिल्म तो नहीं देख ली जो इतने परीशान हो।” अरसलान जानता था कि जब भी सलमान की फिल्म तेरे नाम देखता है तो परीशान हो जाता था। 

“नहीं यार! मैं इस वक्‍त बहुत सीरियस हूँ” अरसलान साथ पड़े सोफे पर बैठ गया- अच्छा यार! सोरी। अब मजाक खत्म। बताओ या बात है? 

“नवाल की मंगनी हो गई है, इसी फ्राइडे को उसका निकाह है।” “व्हाट? यह तुम क्या कह रहे हो यार? मंगनी कब हुई जो अब निकाह है?”

“नहीं यार! फ्राइड़े को मंगनी है और साथ ही निकाह भी । मैं सच कह रहा हूं इसी लिए तो तुम्हें बुलाया है।” अरसलान के जहन में आन्टी का ख्याल आया- “तुमने आन्टी से बात की?”

“हां यार! मैं तुमसे पहले अम्मी से बात कर चुका हूं। अम्मी अब कुछ नहीं कर सकती।” बात करते करते शाहान की नजर सामने दरवाजे पर खड़ी कुलसूम बेगम पर पड़ी । वह एकदम खामोश हो गया था।

अरसलान भी इधर उधर देखने लगा। कुलसूम बेगम जानती थीं कि वह अरसलान से बात जरूर करेगा।

“बेटा! यह लड़कियों के मुआमले बड़े नाजुक होते हैं। अब एकदम बगैर वजह के हम इनकार कैसे कर सकते हैं। हमारे समाज में आज भी जहां लड़की की बात पक्की हो जाए वहां ही शादी होती है। लेकिन अब तो बेटा! सिर्फ चार पांच दिन रह गए हैं।

अब मैं क्या कर सकती हूं। काश में तुम्हारी खुशी के लिए कुछ कर सकती ।” कुलसूम बेगम की आंखों में आंसू आ गए। शाहान जल्दी से मां के करीब हो गया-

“अम्मी! यह क्या? आप रो रही हैं?” “तो क्‍या करू। दिल जलता है मेरा तुझे इस हालत में देख कर। दो दिन से तुम इस कमरे में बन्द हो। मेरे दिल पर क्या गुजरती है तुम नहीं जानते” शाहान के पास सिर्फ मां ही मां थी।

वह उनकी आंखों में आंसू नहीं देख सकता था-” प्लीज अम्मी! आप परीशान न हों। गलती मेरी है कि मैंने आपको बताने में देर कर दी। लेकिन अम्मी! आज के बाद में वही करूंगा जो आप मुझे कहेंगी।

मैं आपके लिए, आपकी खुशी के लिए अपना प्यार क्या जान भी दे सकता हूं।” शाहान ने मां को कन्धों से पकड़ कर सामने किया। “अल्लाह तुम्हें बहुत खुश रखेगा मेरे बच्चे!” कुलसूम बेगम ने प्यार से उसका चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा।

अरसलान ने ऊंची आवाज में आमीन कहा तो उन दोनों को एहसास हुआ की हमारे बीच कोई और भी मौजद है कुलसूम बेगम ने भीगी आँखो के साथ बेटे के माथे को चूम लिया शाहान ओर अरसलान भी मुस्कुराने  लगे। अरसलान को अपने दोस्त फख्र महसूस हुआ।

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वह किचन में काम कर रही थी की हादिया ने अन्दर आकर झांका। उसे तन्हा पाकर उसे लगा कि अब बात करनी चाहिए “हैलो, क्या हो रहा है आपी जान एक काफी का कप मिल सकता है?”

“अभी नहीं, कुछ देर बाद मिल जाएगा । अब मैं काम कर रही हूं।” बर्तन धोती नवाल ने जवाब दिया। हादिया ने नवाल को कन्धों से थाम कर अपनी तरफ कर लिया था-

“क्या बात है आपी! मुझे बताओ तुम्हारे चेहरे पर खामोशी और उदासी क्‍यों है? बोलो ना आपी!” वह लगातार उससे जवाब मांग रही थी।

जिस सवाल का जवाब वह खुद भी नहीं जानती थी उसे वह क्या बताती कि एक तस्वीर से मुहब्बत हो गई है। यह जाने बिना कि वह उसके बारे में क्‍या सोचता है।

“तुम्हें किसने बताया कि मैं परीशान हूं? मैं तो बहुत खुश हूं।” नवाल जबान मे झूट बोल रही थी लेकिन उसकी आंखें जबान का साथ नहीं दे रही थीं।

“आपी! अल्लाह ने मुझे आंखें दी हैं इसी घर में रहती हूं आपके साथ” वह गुस्से से बोली। 

“देखो हादिया! यह जो तुम समझ रही हो वैसी कोई बात नहीं। मेरे सर में सुबह से दर्द है।” नवाल रुख मोड़ कर बोली।

“मैंने आपकी आंखों में शाहान भाई की तस्वीर देखी है।” नवाल ने एकदम हादिया की तरफ देखा -“यह तुम क्या कह रही हो ?” वह बिल्कुल गुमसुम हो गई।

“आपी प्लीज़…।” “हादिया! मुझसे कोई सवाल मत करना । मेरे पास तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नहीं है। और हां, आज तो तुमने मेरे सामनें यह बात कर दी लेकिन किसी और के सामने मत करना।”

वह जाने लगी तो हादिया ने उसका हाथ पकड़ लिया-” अगर आप चाहें तो…..।” “खुदा के लिए हादिया! इस बात को यहीं दफ़्न कर दो।” हादिया की बात पूरी होने से पहले ही नवाल बोल पडीं।

घर में फंक्शन की तय्यारियां जोर पकड़ती जा रही थीं। चूंकि सिर्फ निकाह का फक्शन था इसलिए बड़े तौर पर अरेन्ज नहीं की जा रही थी। मगर ना ना करते हुए भी खानदान वाले, करीबी रिश्तेदारों और कुछ एक दोस्तों की अच्छी खासी गेदरिंग होनी थी।

कुलसूम बेगम और शाहान भी निकाह से एक दिन पहले आ गए थे। शाहान बिल्कुल खामोश था । जब से आया था नवाल को उसने एक नजर भी नहीं देखा था । शायद वह एक दूसरे को देखना नहीं चाहते थे। नवाल भी सुबह से कमरे में बन्द थी।

“शाहान! कहां जा रहे हो बेटा?” कुलसूम बेगम उसकी तरफ ही आ रही थीं। शाहान भी उन्हें सीढ़ियों पर ही मिल गया था।

“ऊपर सोने के लिए जा रहा हूं।” सरसरी सा जवाब देकर उसने आगे बढ़ना चाहा “क्यों बेटा! खाना नहीं खाओगे?” कुलसूम बेगम जानती थी उनके बेटे पर क्या गुज़र रही है।

“नहीं अम्मी! मुझे भूक नहीं है।” प्लीज बेटा! जहां इतना सब्र कर लिया है वहां कुछ देर और सही। चलो तुम्हें तुम्हारे खालू याद कर रहे हैं।”

“अम्मी! मैं सुबह से झूटा मुस्कुरा मुस्कुरा कर थक चुका हूं। अब मुझे आराम करने दें।” वह लम्बे लम्बे डिग भरता ऊपर चेला गया।

कुलसूम वहीं खामीशी से उसे देखती रहीं। “क्या हुआ कुलसूम! यहां क्यों बैठी हो? सब लोग वहां तुम्हारा और शाहान का इन्तिजार कर रहे हैं।”

और वह न जाने कितने ही पल अपनी सोचों में गुम वहां खड़ी रहती कि आपा रजिया की आवाज उनक़ो सोचों से खींच लाई। 

“और शाहान कहां है?” “खैर तो है कुलसूम? जबसे शाहान आया है बुझा बुझा सा रहता है। कोई परीशानी तो नहीं है?”

“नहीं आपा! परीशानी की कोई बात नहीं। मौसम बदलने की वजह से कुछ दिनों से शाहान की तबीअत खराब है इसलिए थोड़ा ऐसा हो गया है। आप चलें, मैं नवाल के पास से होकर आती हूं।” कुलसूम बेगम सरसरी अन्दाज में कहती आगे बढ़ गयीं।

पांव की आहट पर नवाल दरवाजे की तरफ पलटी। कुलसूम बेगम चेहरे पर एक अजीब सा इम्प्रेशन लिए अन्दर आ गयीं वह मुस्कुराते हुए बेड से उठ आई- “खाला क्या कोई काम था? मुझें कह दिया होता मैं आपके पास आ जाती।”

“नहीं बेटा! काम तो कोई न था। बस अपनी बेटी के पास बैठने को दिल कर रहा था।” वह नवाल के पास बेड पर बैठ गयी। बेटा! मेरी तो दुआ है अल्लाह तुम्हें हजारों खुशियां दे।”

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निकाह और मंगनी का फंक्शन एक होटल में था। सब लोग होटल चले गए। घर में हादिया, नवाल और पार्लर वाली थी।

होटल में हर तरफ रौनक थी । महताब खान अपने सबसे अच्छे और पुराने दोस्त जमान का इन्तिजार कर रहे थे जो सिर्फ उनकी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए जर्मनी से आ रहा था।

“अस्सलामु अलैकुम यार! कैसा है?” “मैं ठीक हूं। तुमने इतनी देर क्यों कर दी? तुम्हें तो कल आ जाना था।”

“बस यार!। कल वक्‍त नहीं मिला। तुम सुनाओ क्या हाल है? इतनी जल्दी नवाल बेटी की शादी कर रहे हो?”

“बस यार! रिश्ता अच्छा था तो मेंने हां कर दी । लड़का जर्मनी में रहता है। वहां कारोबार भी अच्छा है।”

“कौन लोग हैं वह?” “सिकन्दर हयात का बेटा आलम हयात है। एक ही बेटा है।” आलम हयात का नाम सनते ही जमान कुछ सोचने लगे।

“क्या बात है यार! क्या सोच रहे हो?” यार! में सोच रहा हूं वही आलम हयात तो नहीं जिसे में जानता हूं।” “यार! सब ठीक तो है?”

“यार! उसके बाप का नाम भी सिकन्दर हयात है।” “जमान! क्या बात है?” “तुम मेरे साथ आओ।” उन्हें वह होटल के अलग कमरे में ले आए-”जिस आलम हयात से तुम नवाल बेटी निकाह कर रहे हो उसने जर्मनी में दो दो शादिया की हुई हैं। वह नशा करता है।”

“व्हाट? यह तुम क्या कह रहे हो?” महताब खान की आंखें बेयकीनी से फट सी गई थी। “में ठीक कह रहा हूं।” “आई कान्ट बिलीव दिस। यह तुम कैसे कह सकते हो ।” महताब खान को अपना दिमाग माउफ होता महसूस हआ।

उन्हें यकीन नहीं आ रहा था वह एक बहुत बडी गलती कर चुके हैं। “तुम्हारे लिए तो यही  काफी था कि लड़का जर्मनी में रहता है । नवाल बेटी को जर्मनी ले जाएगा चाहे वहां वह खुश रहे या न रहे।” जमान को अपने दोस्त पर गुस्सा आ रहा था।

“अब तुम बताओ हमें क्‍या करना चाहिए? अब तो मेहमान भी आना शुरू हो गए हैं।” कुछ लम्हों की खामोशी के बाद उन्होंने सर उठाए हुए सवाल किया।

“तुम मेरे साथ चलो। हम खुद जाकर उन लोगों को मना कर देते हैं कि वह निकाह के लिए न आए।” “लेकिन मेहमानों का क्या होगा जो आ चुके हैं। लोग क्या कहेंगे बेटी का निकाह क्यों नहीं किया तो मैं क्या जवाब दूंगा।”

इतने में बाहर खडी कुलसूम को देखा “आप कब आयी?” दोनों ने हैरानी से कुलसूम को देखा। “मैं सब सुन चुकी हूं।” “कुलसूम! प्लीज इस मुआमले का कुछ करो अगर मेहमान और रिश्तेदारों को भनक भी लग गई तो मेरी इज्जत खाक में मिल जाएगी।

मैं बहुत बड़ी गलती कर चुका हूँ” महताब ख़ान दोनों हाथों में सर गिराए वहीं जमीन पर बैठ गए थे। “भाई जान! अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहू?”

“हां हां बोलो।” जमान कुलसूम बेगम के नजदीक आ गए। “आप उन्हें मना कर दें। हम लोग नवाल और शाहान का निकाह कर देते हैं। वह दोनों हैरत से कुलसूम का चेहरा देखने लगे थे जिस पर बर्फ सी ठन्डक फैली हुई थी- “यह तुम क्या कह रही हो?”

“मै ठीक कह रही हूं। मैं वैसे भी आपा रजिया के फोन करने से पहले अपने बेटे के लिए नवाल का हाथ मांगने आ रही थी। लेकिन आप लोगों ने बहुत जल्दी कर दी।”

महताब खान कुलसूम बेगम की बात सुन कर सोच में पड़ गए। “यार! सोच मत, बस हां  कर दे। शाहान से बढ़ कर हमें अपनी नवाल के लिए कोई नहीं मिलेगा ।”

जमान ने तेजी से आगे बढ़ कर उनका बाजू थाम लिया- “यार! तू पहले भी एक गलती कर चुका है। अब मत करना।”

“ठीक है यार! आप लोगों की मर्जी है तो फिर ठीक है। हम लोग खुद वहां जाकर उन लोगों को मना कर आते हैं। आप शाहान से नवाल को निकाह के लिए तय्यार कर दे।

हाल के अन्दर मेहमानों की अफरा तफरी मची हुई थी। शाहान खामोशी से बिना देखे मां के पास से गुजरा तो कुलसम बेगम ने पीछे से आवाज दी।

“अम्मी! आपने मुझे आवाज दी?” शाहान हौले से मुस्कुराया तो कुलसूम बेगम ने आगे बढ़ कर उसे सीने से लगा लिया। शाहान को हैरत हुई- “अम्मी! यह क्या आप मुझे हौसला देती हैं और अब खुद आपकी आंखों में आंसू हैं।”

“नहीं बेटा! यह तो खुशी के आंसू हैं। आज मेरे बेटे को उसकी मुहब्बत मिलने वाली है।” “आप क्‍या कह रही हैं? यह कैसे हो सकता है?” शाहान के लहजे में हैरत थी।

“तुम्हारा और नवाल का आज निकाह है। बाकी बातें बाद में करेंगे। तुम अरसलान से कहो नवाल और हादिया को घर से ले आए । तुम्हारे खालू भी उन लोगों को मना करके वापस आते होंगे।”

“शाहान अहमद वलद अहमद अली आपको नवाल महताब खान अपने निकाह में कबूल है?” शाहान का तीन बार कबूल कहना साउन्ड सिस्टम के जरीये साथ वाले कमरे में बैठी नवाल तक पहुंचा तो उसके आंसुओं में तेजी आ गई।

इस सारे फंक्शन में अरसलान और हादिया पेश पेश थे। जब नवाल को शाहान के साथ बाहर हाल में बिठाया गया तो शाहान साथ बैठी नवाल को बेयकीनी से बार बार मुड़ कर देख रहा था।

शाहान ने कभी सोचा भी नहीं था कि वह अपनी मुहब्बत को हासिल कर लेगा। लेकिन वह भूल गया था कि करिश्मे अब भी होते हैं। सच्ची चाहत अपनी मन्जिल को पा ही लेती है।

Categories: Story

7 Comments

Pappu khan · July 3, 2020 at 8:24 pm

Please update regularly

hasan khan · July 7, 2020 at 6:36 pm

complete story kha read kre

    Faisal · July 22, 2020 at 10:08 am

    Complete story to hai bhai, 2 page hai dhyan se dekho

      Pappu khan · July 24, 2020 at 11:23 am

      Bhai ab naya story kyu nahi aata hai

Pappu Khan · July 15, 2020 at 12:29 am

Please update jaldi kare shukriya

Pappu Khan · August 3, 2020 at 11:49 am

Kya hua isper update nahi aayega kya

Talat Naaz · August 21, 2020 at 3:22 pm

Osm…

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