ऐसा भी होता है – दिलचस्प कहानी

महकता आँचल स्टोरी बुक

“मैडम आज खाने में क्या बनाना है?” नौकरानी उनके पीछे ड्राइंग रूम में ही चली आई थी। “कीमा मटर, बिरयानी।” कुलसूम बेगम के लहजे में प्यार था- “आज इतने दिनों बाद मेरा बेटा घर आ रहा है। खाना भी उसकी पसन्द का होगा।”

कुलसूम बेगम अपने बेटे के आने का सुन कर बहुत खुश हो गयी क्योंकि इस बार वह काफी दिनों के बाद आ रहा था। वह बहुत दिनों से उसके लिए उदास थीं।

कुलसूम बेगम ने उसका बेड रूम साफ करवाया और नौकरानी को उसकी फेवरेट डिशें बनाने का ऑर्डर भी दे दिया। पूरा दिन बेटे के आने की तय्यारियों में ही गुजर गया।

शाम के साये ढल रहे थे जब गेट पर उसकी गाडी का हार्न सुनाई दिया। वह तेज कदमों से गेलरी पार करती हुई बाहर निकल आई थीं। इतने में वह भी गाडी से उतर आया।

“अस्सलामु अलैकुम अम्मां!”  वह उनके सामने झुक गया।और कुलसूम बेगम ने उसके माथे को चूमते हुए उसे सीने से लगा लिया- “मेरे बच्चे! जीते रहो, खुश रहो।” वह उसके कन्धों और बालों पर हाथ फेर रही थीं और दोबारा फिर उसके माथे को चूमा था।

“कैसी हैं आप?” वह उनके दोनों हाथ चूम कर आंखों से लगाते हुए बोला। “अपने बेट को देखती हू तो जवान हो जाती हूं। सारे ग़म भूल जाती हूं।” उनकी आवाज ही नहीं आंखें भी भीग गई थीं।

शौहर के मरने के बाद बेटा ही कुलसूम बेगम का एक सहारा था। शाहान उनको अपने बाजू के घेरे में लेकर अन्दर ले आया था। “आप तो रो रही हैं अम्मी!” उसने अम्मी को सोफे पर बिठाते हुए कहा।

“नहीं बेटा! यह तो खुशी के आंसू हैं।” “अम्मी! क्या हो गया है, खुशी में आंसू कैसे आ सकते हैं” बेटा! जब तुम्हें बहुत बड़ी खुशी मिलेगी तो आंसू खुद ही आ जाएंगे। और वह खुशी के आंसू होंगे। वह उठ खड़ी हुयी।

“आप कहां जा रही हैं?” “तुम्हारे लिए जूस ले आऊं।” “अरे नहीं अम्मी! आप मेरे पास बैठें। में खुद ले आऊंगा। फिर नौकरानी को आवाज दे दीजिए।” उसने उनको रोकना चाहा।

“नौकरानी को क्यों, मैं खुद अपने बेटे के लिए जूस लेकर आती हूं।” वह नर्मी से कह कर किचन में चली गई थीं। कुछ देर ठहरने के बाद उसके लिए जूस ले आई थीं। आप मेरे पास बैठें और यह बताएं कि आप इतनी कमजोर क्‍यों लग रही हैं?”

लेकिन मैं तो आज अपने आप को जवान समझ रही हूँ । वह मुस्कुराने लगी। “लगता है आप खुद को टाइम नहीं दे रही हैं। 

“अरे छोड़ो क्या बात लेकर बैठ गए। बताओ अरसलान कैसा है? तुम्हारा वहां काम कैसा जा रहा है और कब सारा बिजनेस यहाँ लेकर आ रहे हो?” कुलसूम बेगम ने एक ही वक्‍त में इतने सवाल कर दिए।

“अम्मी इतने सारे सवाल एक ही बार में। पहला सवाल, अरसलान बिल्कल फिट है । आपको याद कर रहा था। दूसरा, काम भी बहुत अच्छा जा रहा है। और रही मेरी बात, मै बहुत जल्द ही आपके पास आ रहा हू हमेशा के लिए।”

शाहान ने मुस्कुरा कर जवाब दिया- “अब आप खुश हैं?” हां बेटा! तुम्हारे बगैर घर में रौनक नहीं होती।

“मैडम! खाना लग गया है।” नौकरानी ने आवाज दी। “चलो बेटा! खाना लग गया है।” ओ.के. अम्मी! आप चलें, मैं अभी फ्रेश होकर आया।” वह खाना खाने में बिजी हो गए। “बेटा! खाना कैसा था?” “बहुत अच्छा।” वह रात के खाने के बाद बातें कर रहे थे- “और सुनाएं।”

“हां बेटा! याद आया। तुम्हारी खाला की बेटी नवाल का रिश्ता पक्का हो गया है। बहुत अच्छे लोग हैं। लड़का जर्मनी में रहता है। बड़ा कारोबार वहां है उसका। फैमिली भी अच्छी है। शाहान की मां बड़ी खुशी से यह सब उसे बता रही थीं। वह नहीं जानती थीं कि उनके बेटे पर क्या गुजर रही है।

शाहान ने सोचा था कि इस बार जाकर अम्मी से बात जरूर करेगा। अम्मी को बहुत खुशी होगी और वह नवाल के घर वाले यानी खाला (मौसी) रजिया से बात करेंगी। शाहान को यकीन था कि खाला और खालू जरूर मान जाएंगे।

नवाल मेरी हो जाएगी और फिर वह उसे बताएगा कि वह नवाल से कितना प्यार करता है। शाहान की सारी खुशी मिट्टी में मिल गई।

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वह चुपचाप छत पर आ गई थी। वह अकेली ही छत पर टहलने लगी। जहन उलझा हुआ था इसलिए इस तन्हाई की जरूरत महसूस हो रही थी। आसमान सितारों से भरा हुआ था  लेकिन उसके दिल से सारी रोशनी गायब हो चुकी थी।

अल्लाह ने इन्सान के अलावा बाकी हर चीज को बेफिक्र क्यों बनाया है। वह सितारों की टिमटिमाती रौशनी देख कर सोचने पर मजबूर हुई थी।

चान्द, रात को बेफिक्री से निकलता और दिन को गायब हो जाता । सूरज, दिन को निकलता है और बेफिक्र होकर रात को गायब। बस एक ही बन्धी रूटीन।

लेकिन इन्सान का हर दिन पहले से अलग होता है और हर रात नई रात है। नई-फिक्रें और नई सोचें लेकर इन्सान हर रोज हलकान होता रहता है और बाकी सारी दुनिया बेफिक्र रहती है।

वह सितारों को देखते हुए न जाने क्या क्‍या सोच रही थी कि नीचे से हादिया की आवाज आई- “आपी! नीचे कमरे में आ जाएं। मैं सोने लगी हूं” काफी रात हो गई थी।

“क्या बात है आपी! आप ठीक तो है?  अकेली छत पर क्या कर रही थीं?” नवाल नीचे आई तो हादिया ने पूछा।

“ऐसे ही ऊपर छत पर चली गई।” “नहीं आपी! कोई बात तो जरूर है मैं काफी दिनों से देख रही हूं आप छत पर रोज़ाना जाती हैं। किसी के पास नहीं बैठती।

अम्मी को भी ऐसा लगा। वह मुझसे पूछ रही थीं। चुप चुप भी हैं।” हादिया को अपनी प्यारी बहन की फिक्र हो रही थी।

“मैं ठीक हूं। दिन में आज काम ज्यादा था इसलिए शायद थकन हो गई है। तुम सो जाओ, मुझे भी नीन्द आ रही है।” हादिया को एक बात परीशान किए जा रही थी कि नवाल की किताब में शाहान भाई की तस्वीर कैसे थी। क्या नवाल आपी शाहान भाई से मुहब्बत करती हैं, और शाहान भाई भी?

यह दोनों आपस में मुहब्बत कब से करते हैं? शाहान भाई तो सिर्फ एक बार ही हमारे घर आए थे। क्या पापा के दोस्त के बेटे से आपी की मंगनी हुई है और आपी करना नहीं चाहती या फिर साथ ही निकाह की वजह से परीशान हैं?

हादिया के जहन में बहुत सारे सवाल थे जो उसे सोने नहीं दे रहे थे। उसने फैसला कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह कल अकेले में आपी से बात जरूर करेगी।

शाहान ने कमरे में झांका। कुलसूम बेगम बैठी थीं- “अम्मी! में आ जाऊ” शाहान ने कहा तो कुलसूम बेगम ने प्यार से बेटे की तरफ देखा- “कमाल है  अब माँ के पास आने के लिए भी इजाजत की जरूरत है।” वह मुस्कुरायी।

शाहान कमरे में आया- “आप बिजी तो नहीं थीं?”

“नहीं, बिल्कुल नहीं। अपने बेटे की बात सुनने के लिए तो मेरे पास टाइम ही टाइम है।” उन्होंने उसका हाथ थाम कर अपने पास ही बिस्तर पर बिठा लिया ।

“हां बोलो क्या बात है?” कुलसूम बेगम ने पूरी तवज्जोह उसकी तरफ की। शाहान ने एक नजर मां की तरफ देखा- “अम्मी! आप मुझसे कितना प्यार करती हैं?”

उन्होंने उसके झुके सर पर हाथ रखा। उसकी सन्‍जीदगी कुलसूम बेगम को परीशान कर रही थी क्योंकि आज पहली बार शाहान ने सवाल ही ऐसा किया था।

“अम्मी! बताएं ना।” शाहान के लहजे में जिद थी। “ओ हो मेरी जान! मेरे बच्चे! क्या बात है मुझे बताओ। मुझे परीशानी हो रही है।” अम्मी! मैं नवाल से मुहब्बत करता हूं और उससे शादी करना चाहता हू।”

शाहान ने सर उठा कर सन्‍जीदगी से कहा। उन्होंने बेयकीनी से उसकी  तरफ देखा- “ क्या कहा शाहान?” वह जैसे उससे और ज्यादा यकीन चाहती थीं।

“अम्मी! मैं आपको पहले भी बताना चाहता था लेकिन मैंने सोचा कि पहले कुछ बन जाऊं फिर बात करूंगा ताकि मेरी अम्मी उनकी तरफ फख्र से जाएं।” शाहान का लहजा मज़बूत था।

“लेकिन बेटा! मैंने तुम्हें बताया है कि इस फ्राइडे को उसकी मंगनी और निकाह है।” कुलसूम को समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह अपने बेटे को समझाएं। उसे एहसास, दिलाएं कि यह नहीं हो सकता।

“बेटा! तुमने बहुत देर कर दी। अब मैं आपा रजिया से क्या कहूं। और जिससे निकाह है वह महताब भाई के दोस्त का बेटा है। वह यह रिश्ता कैसे तोड़ सकते हैं बगैर वजह के।”

वह धीरे धीरे अपने बेटे को समझा रही थीं। “लेकिन अम्मी! प्लीज . ..।”

“क्या मैं तुम्हारी खुशी नहीं चाहती शाहान! बोलो जवाब दो । मैं तो हमेशा यह चाहती हूं कि अल्लाह मेरे बेटे की हर खुशी पूरी करे।” उन्होंने उसकी पेशानी पर आए बाल पीछे हटाए- बेटा! मुझे खुशी है कि तुमने अपने दिल की बात अपनी मां से शेयर की लेकिन बेटा! मैं बेबस हूं।

अब मैं कुछ नहीं कर सकती। मैं तो दुआ ही कर सकती हूं कि नवाल न सही तो कोई नवाल जैसी लड़की मेरे बेटे के नसीब में लिख दे।”

शाहान जान चुका था कि अब कुछ नहीं हो सकता- “अम्मी! मैं चलता हूं।” वह उठ कर जाने लगा तो अम्मी ने आवाज दी- “बेटा! नवाल भी तुमसे मुंहब्बत करती है?”

शाहान ने पीछे मुड़ कर मां को देखा- “अम्मी! मैं नहीं जानता” शाहान ने अपने साथ साथ मां को भी परीशान कर दिया था । कुलसूम बेगम सोच सोच कर परीशान हो रही थीं कि नवाल का ख्याल मुझे क्‍यों नहीं आया।

रात के खाने के बाद जब वह सोने के लिए कमरे में आया तो नवाल का चेहरा नज़रो के सामने आ गया। न जाने क्यों न चाहते हुए भी उसकी याद दिल से नहीं जा रही थी। फिर दिल के आगे हार कर  अरसलान को फोन किया ताकि उससे मशवरा ले सके।

वही तो उसका एक दोस्त था जिससे वह दिल की हर बात शेयर करता था। अरसलान ने दूसरी ही ब्रेल पर फोन रिसीव कर लिया।

“हैलो, कैसे हो तुम? दो दिनों से फोन क्यों नहीं किया ?” शाहान पहले ही बहुत परीशान था- “यार! छोड़ो सब बातें। तुम कल सुबह ही यहां आ जाओ। मुझे तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है।”

“क्या बात है? सब ठीक तो है ना?” “हां यार! तुम बस आ जाओ।” अरसलान जान गया था कोई तो बात जरूर है- “ठीक है मैं सुबह आ जाऊगा। अब खुश?” अरसलान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया और फोन बन्द कर दिया।

अरसलान भी सुबह का बेचैनी से इन्तिजार करने लगा। उसे शाहान की फिक्र हो रही थी, पहले तो उसने कभी उसे काल नहीं की थी।

“अस्सलामु अलैकुम आन्टी!” “अरे अरसलान बेटा! तुम्हें आज हमारी याद कैसे आ गई?” कुलसूम बेगम ने सामने से आते अरसलान को गले लगा लिया और प्यार किया।

“बैठो बेटा! मैं तुम्हारे लिए जूस लेकर आती हूं।” “आन्टी! जूस बाद में। पहले शाहान कहां है?” “ओ हो बेटा! वह अपने कमरे में है। तुम चलो, मैं वहीं जूस लेकर आती हूं।”

“थैंक्स आन्टी!  अरसलान को शाहान से मिलने की जल्दी थी। कमरे के दरवाजे पर दस्तक देकर अरसलान अन्दर दाखिल हुआ तो वह अपने कमरे की खुली हुईं खिड़की में खड़ा था।

“हैलो शानी! कैसे हो?” शाहान ने मुड़ कर देखा। अरसलान के गले लग कर फाइन कहा- “कब आए तुम?”

“अभी अभी । तुम बताओ क्या बात है? तुम्हें पता है मैं सारी रात सो नहीं सका कि क्या बात हो सकती है।”

“यार! कुछ नहीं । बस परीशान हूं।” तुमने सलमान खान की तेरे नाम फिल्म तो नहीं देख ली जो इतने परीशान हो।” अरसलान जानता था कि जब भी सलमान की फिल्म तेरे नाम देखता है तो परीशान हो जाता था। 

“नहीं यार! मैं इस वक्‍त बहुत सीरियस हूँ” अरसलान साथ पड़े सोफे पर बैठ गया- अच्छा यार! सोरी। अब मजाक खत्म। बताओ या बात है? 

“नवाल की मंगनी हो गई है, इसी फ्राइडे को उसका निकाह है।” “व्हाट? यह तुम क्या कह रहे हो यार? मंगनी कब हुई जो अब निकाह है?”

“नहीं यार! फ्राइड़े को मंगनी है और साथ ही निकाह भी । मैं सच कह रहा हूं इसी लिए तो तुम्हें बुलाया है।” अरसलान के जहन में आन्टी का ख्याल आया- “तुमने आन्टी से बात की?”

“हां यार! मैं तुमसे पहले अम्मी से बात कर चुका हूं। अम्मी अब कुछ नहीं कर सकती।” बात करते करते शाहान की नजर सामने दरवाजे पर खड़ी कुलसूम बेगम पर पड़ी । वह एकदम खामोश हो गया था।

अरसलान भी इधर उधर देखने लगा। कुलसूम बेगम जानती थीं कि वह अरसलान से बात जरूर करेगा।

“बेटा! यह लड़कियों के मुआमले बड़े नाजुक होते हैं। अब एकदम बगैर वजह के हम इनकार कैसे कर सकते हैं। हमारे समाज में आज भी जहां लड़की की बात पक्की हो जाए वहां ही शादी होती है। लेकिन अब तो बेटा! सिर्फ चार पांच दिन रह गए हैं।

अब मैं क्या कर सकती हूं। काश में तुम्हारी खुशी के लिए कुछ कर सकती ।” कुलसूम बेगम की आंखों में आंसू आ गए। शाहान जल्दी से मां के करीब हो गया-

“अम्मी! यह क्या? आप रो रही हैं?” “तो क्‍या करू। दिल जलता है मेरा तुझे इस हालत में देख कर। दो दिन से तुम इस कमरे में बन्द हो। मेरे दिल पर क्या गुजरती है तुम नहीं जानते” शाहान के पास सिर्फ मां ही मां थी।

वह उनकी आंखों में आंसू नहीं देख सकता था-” प्लीज अम्मी! आप परीशान न हों। गलती मेरी है कि मैंने आपको बताने में देर कर दी। लेकिन अम्मी! आज के बाद में वही करूंगा जो आप मुझे कहेंगी।

मैं आपके लिए, आपकी खुशी के लिए अपना प्यार क्या जान भी दे सकता हूं।” शाहान ने मां को कन्धों से पकड़ कर सामने किया। “अल्लाह तुम्हें बहुत खुश रखेगा मेरे बच्चे!” कुलसूम बेगम ने प्यार से उसका चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा।

अरसलान ने ऊंची आवाज में आमीन कहा तो उन दोनों को एहसास हुआ की हमारे बीच कोई और भी मौजद है कुलसूम बेगम ने भीगी आँखो के साथ बेटे के माथे को चूम लिया शाहान ओर अरसलान भी मुस्कुराने  लगे। अरसलान को अपने दोस्त फख्र महसूस हुआ।

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वह किचन में काम कर रही थी की हादिया ने अन्दर आकर झांका। उसे तन्हा पाकर उसे लगा कि अब बात करनी चाहिए “हैलो, क्या हो रहा है आपी जान एक काफी का कप मिल सकता है?”

“अभी नहीं, कुछ देर बाद मिल जाएगा । अब मैं काम कर रही हूं।” बर्तन धोती नवाल ने जवाब दिया। हादिया ने नवाल को कन्धों से थाम कर अपनी तरफ कर लिया था-

“क्या बात है आपी! मुझे बताओ तुम्हारे चेहरे पर खामोशी और उदासी क्‍यों है? बोलो ना आपी!” वह लगातार उससे जवाब मांग रही थी।

जिस सवाल का जवाब वह खुद भी नहीं जानती थी उसे वह क्या बताती कि एक तस्वीर से मुहब्बत हो गई है। यह जाने बिना कि वह उसके बारे में क्‍या सोचता है।

“तुम्हें किसने बताया कि मैं परीशान हूं? मैं तो बहुत खुश हूं।” नवाल जबान मे झूट बोल रही थी लेकिन उसकी आंखें जबान का साथ नहीं दे रही थीं।

“आपी! अल्लाह ने मुझे आंखें दी हैं इसी घर में रहती हूं आपके साथ” वह गुस्से से बोली। 

“देखो हादिया! यह जो तुम समझ रही हो वैसी कोई बात नहीं। मेरे सर में सुबह से दर्द है।” नवाल रुख मोड़ कर बोली।

“मैंने आपकी आंखों में शाहान भाई की तस्वीर देखी है।” नवाल ने एकदम हादिया की तरफ देखा -“यह तुम क्या कह रही हो ?” वह बिल्कुल गुमसुम हो गई।

“आपी प्लीज़…।” “हादिया! मुझसे कोई सवाल मत करना । मेरे पास तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नहीं है। और हां, आज तो तुमने मेरे सामनें यह बात कर दी लेकिन किसी और के सामने मत करना।”

वह जाने लगी तो हादिया ने उसका हाथ पकड़ लिया-” अगर आप चाहें तो…..।” “खुदा के लिए हादिया! इस बात को यहीं दफ़्न कर दो।” हादिया की बात पूरी होने से पहले ही नवाल बोल पडीं।

घर में फंक्शन की तय्यारियां जोर पकड़ती जा रही थीं। चूंकि सिर्फ निकाह का फक्शन था इसलिए बड़े तौर पर अरेन्ज नहीं की जा रही थी। मगर ना ना करते हुए भी खानदान वाले, करीबी रिश्तेदारों और कुछ एक दोस्तों की अच्छी खासी गेदरिंग होनी थी।

कुलसूम बेगम और शाहान भी निकाह से एक दिन पहले आ गए थे। शाहान बिल्कुल खामोश था । जब से आया था नवाल को उसने एक नजर भी नहीं देखा था । शायद वह एक दूसरे को देखना नहीं चाहते थे। नवाल भी सुबह से कमरे में बन्द थी।

“शाहान! कहां जा रहे हो बेटा?” कुलसूम बेगम उसकी तरफ ही आ रही थीं। शाहान भी उन्हें सीढ़ियों पर ही मिल गया था।

“ऊपर सोने के लिए जा रहा हूं।” सरसरी सा जवाब देकर उसने आगे बढ़ना चाहा “क्यों बेटा! खाना नहीं खाओगे?” कुलसूम बेगम जानती थी उनके बेटे पर क्या गुज़र रही है।

“नहीं अम्मी! मुझे भूक नहीं है।” प्लीज बेटा! जहां इतना सब्र कर लिया है वहां कुछ देर और सही। चलो तुम्हें तुम्हारे खालू याद कर रहे हैं।”

“अम्मी! मैं सुबह से झूटा मुस्कुरा मुस्कुरा कर थक चुका हूं। अब मुझे आराम करने दें।” वह लम्बे लम्बे डिग भरता ऊपर चेला गया।

कुलसूम वहीं खामीशी से उसे देखती रहीं। “क्या हुआ कुलसूम! यहां क्यों बैठी हो? सब लोग वहां तुम्हारा और शाहान का इन्तिजार कर रहे हैं।”

और वह न जाने कितने ही पल अपनी सोचों में गुम वहां खड़ी रहती कि आपा रजिया की आवाज उनक़ो सोचों से खींच लाई। 

“और शाहान कहां है?” “खैर तो है कुलसूम? जबसे शाहान आया है बुझा बुझा सा रहता है। कोई परीशानी तो नहीं है?”

“नहीं आपा! परीशानी की कोई बात नहीं। मौसम बदलने की वजह से कुछ दिनों से शाहान की तबीअत खराब है इसलिए थोड़ा ऐसा हो गया है। आप चलें, मैं नवाल के पास से होकर आती हूं।” कुलसूम बेगम सरसरी अन्दाज में कहती आगे बढ़ गयीं।

पांव की आहट पर नवाल दरवाजे की तरफ पलटी। कुलसूम बेगम चेहरे पर एक अजीब सा इम्प्रेशन लिए अन्दर आ गयीं वह मुस्कुराते हुए बेड से उठ आई- “खाला क्या कोई काम था? मुझें कह दिया होता मैं आपके पास आ जाती।”

“नहीं बेटा! काम तो कोई न था। बस अपनी बेटी के पास बैठने को दिल कर रहा था।” वह नवाल के पास बेड पर बैठ गयी। बेटा! मेरी तो दुआ है अल्लाह तुम्हें हजारों खुशियां दे।”

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निकाह और मंगनी का फंक्शन एक होटल में था। सब लोग होटल चले गए। घर में हादिया, नवाल और पार्लर वाली थी।

होटल में हर तरफ रौनक थी । महताब खान अपने सबसे अच्छे और पुराने दोस्त जमान का इन्तिजार कर रहे थे जो सिर्फ उनकी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए जर्मनी से आ रहा था।

“अस्सलामु अलैकुम यार! कैसा है?” “मैं ठीक हूं। तुमने इतनी देर क्यों कर दी? तुम्हें तो कल आ जाना था।”

“बस यार!। कल वक्‍त नहीं मिला। तुम सुनाओ क्या हाल है? इतनी जल्दी नवाल बेटी की शादी कर रहे हो?”

“बस यार! रिश्ता अच्छा था तो मेंने हां कर दी । लड़का जर्मनी में रहता है। वहां कारोबार भी अच्छा है।”

“कौन लोग हैं वह?” “सिकन्दर हयात का बेटा आलम हयात है। एक ही बेटा है।” आलम हयात का नाम सनते ही जमान कुछ सोचने लगे।

“क्या बात है यार! क्या सोच रहे हो?” यार! में सोच रहा हूं वही आलम हयात तो नहीं जिसे में जानता हूं।” “यार! सब ठीक तो है?”

“यार! उसके बाप का नाम भी सिकन्दर हयात है।” “जमान! क्या बात है?” “तुम मेरे साथ आओ।” उन्हें वह होटल के अलग कमरे में ले आए-”जिस आलम हयात से तुम नवाल बेटी निकाह कर रहे हो उसने जर्मनी में दो दो शादिया की हुई हैं। वह नशा करता है।”

“व्हाट? यह तुम क्या कह रहे हो?” महताब खान की आंखें बेयकीनी से फट सी गई थी। “में ठीक कह रहा हूं।” “आई कान्ट बिलीव दिस। यह तुम कैसे कह सकते हो ।” महताब खान को अपना दिमाग माउफ होता महसूस हआ।

उन्हें यकीन नहीं आ रहा था वह एक बहुत बडी गलती कर चुके हैं। “तुम्हारे लिए तो यही  काफी था कि लड़का जर्मनी में रहता है । नवाल बेटी को जर्मनी ले जाएगा चाहे वहां वह खुश रहे या न रहे।” जमान को अपने दोस्त पर गुस्सा आ रहा था।

“अब तुम बताओ हमें क्‍या करना चाहिए? अब तो मेहमान भी आना शुरू हो गए हैं।” कुछ लम्हों की खामोशी के बाद उन्होंने सर उठाए हुए सवाल किया।

“तुम मेरे साथ चलो। हम खुद जाकर उन लोगों को मना कर देते हैं कि वह निकाह के लिए न आए।” “लेकिन मेहमानों का क्या होगा जो आ चुके हैं। लोग क्या कहेंगे बेटी का निकाह क्यों नहीं किया तो मैं क्या जवाब दूंगा।”

इतने में बाहर खडी कुलसूम को देखा “आप कब आयी?” दोनों ने हैरानी से कुलसूम को देखा। “मैं सब सुन चुकी हूं।” “कुलसूम! प्लीज इस मुआमले का कुछ करो अगर मेहमान और रिश्तेदारों को भनक भी लग गई तो मेरी इज्जत खाक में मिल जाएगी।

मैं बहुत बड़ी गलती कर चुका हूँ” महताब ख़ान दोनों हाथों में सर गिराए वहीं जमीन पर बैठ गए थे। “भाई जान! अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहू?”

“हां हां बोलो।” जमान कुलसूम बेगम के नजदीक आ गए। “आप उन्हें मना कर दें। हम लोग नवाल और शाहान का निकाह कर देते हैं। वह दोनों हैरत से कुलसूम का चेहरा देखने लगे थे जिस पर बर्फ सी ठन्डक फैली हुई थी- “यह तुम क्या कह रही हो?”

“मै ठीक कह रही हूं। मैं वैसे भी आपा रजिया के फोन करने से पहले अपने बेटे के लिए नवाल का हाथ मांगने आ रही थी। लेकिन आप लोगों ने बहुत जल्दी कर दी।”

महताब खान कुलसूम बेगम की बात सुन कर सोच में पड़ गए। “यार! सोच मत, बस हां  कर दे। शाहान से बढ़ कर हमें अपनी नवाल के लिए कोई नहीं मिलेगा ।”

जमान ने तेजी से आगे बढ़ कर उनका बाजू थाम लिया- “यार! तू पहले भी एक गलती कर चुका है। अब मत करना।”

“ठीक है यार! आप लोगों की मर्जी है तो फिर ठीक है। हम लोग खुद वहां जाकर उन लोगों को मना कर आते हैं। आप शाहान से नवाल को निकाह के लिए तय्यार कर दे।

हाल के अन्दर मेहमानों की अफरा तफरी मची हुई थी। शाहान खामोशी से बिना देखे मां के पास से गुजरा तो कुलसम बेगम ने पीछे से आवाज दी।

“अम्मी! आपने मुझे आवाज दी?” शाहान हौले से मुस्कुराया तो कुलसूम बेगम ने आगे बढ़ कर उसे सीने से लगा लिया। शाहान को हैरत हुई- “अम्मी! यह क्या आप मुझे हौसला देती हैं और अब खुद आपकी आंखों में आंसू हैं।”

“नहीं बेटा! यह तो खुशी के आंसू हैं। आज मेरे बेटे को उसकी मुहब्बत मिलने वाली है।” “आप क्‍या कह रही हैं? यह कैसे हो सकता है?” शाहान के लहजे में हैरत थी।

“तुम्हारा और नवाल का आज निकाह है। बाकी बातें बाद में करेंगे। तुम अरसलान से कहो नवाल और हादिया को घर से ले आए । तुम्हारे खालू भी उन लोगों को मना करके वापस आते होंगे।”

“शाहान अहमद वलद अहमद अली आपको नवाल महताब खान अपने निकाह में कबूल है?” शाहान का तीन बार कबूल कहना साउन्ड सिस्टम के जरीये साथ वाले कमरे में बैठी नवाल तक पहुंचा तो उसके आंसुओं में तेजी आ गई।

इस सारे फंक्शन में अरसलान और हादिया पेश पेश थे। जब नवाल को शाहान के साथ बाहर हाल में बिठाया गया तो शाहान साथ बैठी नवाल को बेयकीनी से बार बार मुड़ कर देख रहा था।

शाहान ने कभी सोचा भी नहीं था कि वह अपनी मुहब्बत को हासिल कर लेगा। लेकिन वह भूल गया था कि करिश्मे अब भी होते हैं। सच्ची चाहत अपनी मन्जिल को पा ही लेती है।

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This Post Has 7 Comments

  1. Pappu khan

    Please update regularly

    1. Faisal

      Complete story to hai bhai, 2 page hai dhyan se dekho

      1. Pappu khan

        Bhai ab naya story kyu nahi aata hai

  2. Pappu Khan

    Please update jaldi kare shukriya

  3. Pappu Khan

    Kya hua isper update nahi aayega kya

  4. Talat Naaz

    Osm…

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