Dosti aur Bharosa – Khubsurat Afsana

यह मुझे क्या होता जा रहा है आखिर कब तक उसकी यादों की परछाइयां अलाव बनकर मेरे जिस्म को अपने शोलों में लपेटती रहेंगी, मुझे अपने जहन पर अपने दिल पर कब इसख्तियार मिलेगा, यह इन्तिजार की घड़ी कब रुकेगी।

हिना करवट बदलते-बेचैन होकर उठ बैठी थी। आमिर भाई और भाभी अपने कमरे में आराम से सो रहे थे, अम्मां बी भी दिन भर की थकन से चूर होकर बेंखबर सो रही थीं।

हिना ने थक कर घड़ी की तरफ देखा जो रात के तीन बजा रही थी । उसके हलक में कांटे पड़ रहे थे, उसने गटागट पानी की बोतल निकाल कर तीन-चार गिलास हल्क तक चढ़ा लिए।

खिड़की से पूनम के चांद की रौशनी हवा के हल्के हल्कें झोंके के साथ अन्दर आ रही थी, माहौल में सन्‍नाटा छाया हुआ था, कहते है जिस याद को जितना दबाया जाता है

उतनी ही तेजी से वह उभरती है, वह भी मजबूर हो गयी और खुद को उस माहौल के हवाले कर दिया, थादों को एक दम ढील दे दी।

“हिना” आमिर भाई की आवाज गूंजी, वह किचन से वैसे ही ड्राइंग रूम में आ घुसी ओर सुन सी खड़ी रह गई, आमिर के साथ कोई दोस्त था।

“हिना क्या कर रही हो? कम से कम चाय ही पिला दो।” आमिर ने मुस्कुराते हुए कहा, वह सटपटाकर रह गई। “इनसे तो मिलो।”

आमिर भाई ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा ओर कहने लगे। ”हम्माद यह हमारी काम वाली है हिना।”

आमिर के लबों पर वही शोख सी मुस्कुराहट फेली हुई थी, वह शर्मिन्दा हो गईं, आमिर ने शायद उसके चेहरे के उतार चढ़ाव से अन्दाज़ा लगा लिया या फिर शायद अपनी चाय का मुस्तक्‌बिल खतरे में नजर आने लगा फौरन मुस्कुरा कर कहने लगे।

”नहीं भई मेरी अम्मां की लड़की है, बीएससी के फाइनल इयर में हे ओर हिना यह है मेरा अजीज दोस्त हम्माद ।”

आमिर ने दोनों को मिलवाया, हिना ने सरसरी नज़रों से उसका जायजा लिया, हम्माद के चेहरे पर अज़ीब सी बेबसी थी, वह शर्मिन्दा सा था।

“आपसे मिलकर खुशी हुई।” उसने कहा। ”मुझे भी” हम्माद ने कहा। “मैं चाय भिजवाती हूं।” हिना कहती हुई ड्राइंग रूम से निकल गई, यह हम्माद से उसकी पहली मुलाकात

थी, किचन में वापस आकर वह आमिर भाई की शरारत पर मुस्कुराती रही और बेचारा हम्माद सीधा सादा इन्सान है यह हिना का ख्याल था। हम्माद से हिना का सामना दसरी बार डाइनिंग टेबल पर हुआ।

भाभी सुबह से हसन को लेकर मायके गई हुई थीं और अम्मां बी कभी टेबल पर बैठकर नहीं खाती थीं।

आमिर का मूड कुछ सीरियस था, उन लोगों की बातचीत से पता चल रहा था कि आमिर उसको तीन चार दिन रुकने के लिए मना रहे हैं और वह शायद अपनी मजबूरी बता रहा है,

आमिर की जिद के सामने उसे झुकना ही पड़ा और वह रुकने को तय्यार हो गया, हिना खामोशी से खाला खा रही थी वह दोनों बातें कर रहें थे कि अचानक वह हिना से बोला।

“आप कुछ खामोश खामोश सी हैं या फ़िर टापिक आपके लेवल का नहीं है। “जी नहीं!” न जाने क्यों उसका लेहजा ठंडा पड़ गया।

“ऐसी बात नहीं है, खाना मेरे सामने है और रिज्क का एहतिराम जरूरी है।” कह कर वह अपनी प्लेट में झुक गई, दोनों शर्मिन्दा से होकर खामोशी से खाना खाने लगे, उसने बातों में हिस्सा नहीं लिया और नोक झोंक आगे न बढ़ सकी।

रात जब हिना अपने कमरे में सोने की तस्यारियां कर रही थी आमिर अचानक कमरे में चले आए और बातों बातों में संजीदगी से हम्माद के बारे में बताया, वह उनके क्लास फेलो

थे, मां बाप का साया सर से उठ चुका था, छोटा भाई जो कि बीकाम के फाइनल इयर में था हादिसे का शिकार हो गया, वह इस दुनिया में तन्हा रह गए अब एक कालिज में

लेक्चरार थे, अचानक आमिर से मुलाकात हो गई, वह उसे जबरदस्ती अपने घर ले आए, हम्माद के बारे में जानने के बाद वह मुजरिम सी बन गई, अपना अन्दाज उसे तकलीफ देने लगा, उसका रवैया बिला वजह हम्माद से सख्त हो गया था।

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दोनों बार ही उसने बहुत बेरुखी दिखाई थी उससे। और फिर हिना के बर्ताव में बदलाव आ गया, वह हर लिहाज से उसका ख्याल रखने लगी, तब हिना को मालूम हुआ कि उसकी सीधी सादी शख्सीयत के पीछे कितना मुकम्मल और भरपूर इन्सान छुपा हुआ है।

जिन्दगी का वह कौन सा ऐसा कोना था जिस पर हम्माद की नज़र न हो, दुनिया का कौन सा ऐसा टापिक था जिस पर उसे पकड़ न हो, फिर आमिर से यह भी पता चला कि अपनी

सैलरी को एक बड़ा हिस्सा कालिज के जरूरतमन्द स्टूडेन्टस की फीस और होस्टल के खर्चे में दे देते हैं और इन तमाम बातों ने मिल कर उसके दिल में हम्माद के लिए बड़ी जगह

बना दी, हम्माद को सामने देखकर हिना को कुछ होने लगता, एक बेनाम सी कशिश एक अंजानी सी गुदगुदी।’

वैसे वह उन लड़कियों में से नहीं थी जो हर लड़के पर लटटु हो जाए, उसे अगर किसी बात ने हिलाया था तो वह हम्माद के किरदार की खूबी थी जो हर किसी की नजरों से छुपी हुई थी।

और हिना एक अनजानी आग में जलने लगी, यह आग एक तरफा थी। दोनों में हर टापिक पर बात होती, लेकिन क्या मजाल जो हम्माद की नजर चन्द सेकन्ड के लिए ही हिना की

तरफ किसी दिलचस्पी के साथ पड़ी हो, दिल के हाथों मजबूर होकर, हिना ने औरत की अना जहां तक इजाजत दे सकती थी हर मुमकिन कोशिश कर डाली कि उन्हें अपनी

उलझनों से आगाह कर दे, अपनी बेचैनियों में राजदार बना दे, लेकिन वह तो जैसे जानते बूझते हर बात से अनजान हो चुके थे। उन्ही दिनों खाला ने अज़ीज़ के लिए हिना का रिश्ता मांग लिया।

अजीज एक बड़ी कंपनी इंजीनियर था, वह हसमुख इन्सान था, जिसके नजदीक हंसना हंसाना जिन्दगी का दूसरा नाम था, अगर हम्माद यहां न आए होते तो हिना शायद ऐतिराज भी न करती, लेकिन अब तो बात ही दूसरी थी।

इधर हिना का दिल अनजाने अन्देशों से धड़क ही रहा था, उधर अम्मी ने सबसे मश्वरा करके अपनी रज़ामन्दी दे दी।

फिर भी आमिर ने इस मुआमले में उससे राय नहीं ली थी, लेकिन यह बात वह भी समझ सकती थी कि आमिर को उस पर कितना ऐतमाद है और फिर उन्होंने हिना और अज़ीज़

के साथ को, हंसी मजाक को, दिल लगी को उसकी पसन्द समझा था, इसलिए किसी ने उसकी पसन्द जानना भी गैर ज़रूरी समझा।

वैसे हालात का रुख उनकी नजरों के सामने कब था, दिन रात घुटन से तंग आकर एक दिन हिना ने फैसला कर लिया कि अब हम्माद से खुलकर बात कर लेनी चाहिए।

दोपहर का वक्‍त था, भाभी और अम्मी खाला के घर गई हुई थीं भाभी ने उसे भी चलने को कहा, मगर उसने सर दर्द का बहाना कर दिया, आमिर आफिस गए हुए थे कि कुछ ही देर

में हम्माद घर आ गए, जब से हिना उनका ज़्यादा ध्यान रसने लगी थी उनके बर्ताव में रुखाई आ गई थी, हिना उसकी वजह जानती थी।

वह खाने की टेबल पर सर झुकाए खाने में मसरूफ थे हिना ने धीरे से खंखारकर गला साफ करके उनसे कहा। “मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं।”

”जी”। वह हिना के लहजे के अजनबी पन पर चौक पड़े। “आप जानतें ही हैं कि मैं साफ साफ बात करना पसन्द करती हूँ” वह उसे गौर से देख रहे थे।

“आज कल जो बात घर में चल रही है वह आमिर के जरिए आपको पता चल गयी होगी, अब आप मुझे मुझे कुछ भी कह लें, लेकिन मैं वहां अपनी ज़िंदगी का सौदा नहीं न सिर्फ

वहाँ, बल्कि कहीं भी नहीं और उसकी वजह आप अच्छी तरह जानतें हैं, इससे ज़्यादा मैं और कुछ नहीं कह सकती।”

उसकी सांस फूल चुकी थी और वह अपने अन्दर एक शर्मिन्दगी सी महसूस कर रही थी उसके अन्दर छुपी हुई औरत अपनी अना के जख्मी किए ज़ाने का शिकवा कर रही थी,

मगर दिल मुतमइन था कि उसने दिल के फैसले के मुताबिक काम किया था। हम्माद चुपचाप थोड़ी देर तक उसे देखते रहे फिर धीमे लहजे में कहने लगे।

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“हिना! क्या तुम चाहती हो कि मैं अपनी नजरों से गिर जाऊं, ऐसी हरकत करुं जोचुभन बनकर एतमाद खुलूस और दोस्ती के नाम पर सदा खटकती रहे?

तुमने इस दुनिया का सिर्फ निचला रूप देखा है, तुम नहीं जानतीं कि दुनिया में कुछ जज्बे ऐसे होते हैं जिन पर इन्सान अपनी आबरू, माल, जान, मुहब्बत, इमान हर चीजे कुर्बान कर

देता है और दोस्ती इन तमाम जज्जों में सबसे ऊचा जज़्बा है, फर्ज करो अगर तुम मेरी पसन्द के लेवल पर खतरी भी उतरी हो तो क्या तुम सुझसे यह उम्मीद करती हो कि मैं

तुम्हारे भाई अपने दोस्त आमिर से कह सकूगा, जज्बाती बनने से जिन्दगी संवर नहीं जाती, अगर तुम इतने मामूली से जज्बे पर यूं अंपने जहन को गन्दगी का शिकार बना लोगी तो

पहाड़ सी जिन्दगी काटना तो तुम्हारे लिए मुश्किल हो जाएगा। वह एक लम्हे रुके, उनका लहजा अफसोस लिए हुए था, उनका एक एक लफ़्ज उसके दिल में तीर की तरह लग रहा था।

“मुहब्बत में इन्सान कुछ खोकरही कुछ पाता है, फिर तुम तो पढ़ी लिखी हो समझदार हो, तमन्ना और हासिल के मतलब को जानती हो तमन्ना जब तक तमन्ना रहती है जिन्दगी को

रौशन बनाए रखती है और हासिल कर लेने के बाद इन्सान एक नाकाबिले बयान बेकली में मुब्तिला हो जाता है।” वह कुछ रुके।

“मैं तो सिर्फ इतना समझती हूं कि मुहब्बत में नाकाम होकर इन्सान टूट जाता है, बिखर जाता है, वह जो दिल में एक गर्मी सी हुआ करती है बुझ जाती है और फिर यह नाकामी इन्सान को खुदकुशी, बदला और नजाने किन किन बातों के अन्जाम तक ले जाती है।”

उसने कहा फिर अपने चेहरे को दोनों हाथों में छुपाकर सिसकती हुई वहाँ से भाग खड़ी हुई और उसी शाम आमिर के लाख रोकने के बावुजूद हम्माद दिल्‍ली चले गए।

वक्‍त की सूइयां अपनी रफ़्तार से घूमती रहीं, हिना रो रो कर परवरदिंगार से दुआ करती रही, अपने दिल के सुकून के लिए भीख मांगती रही, हिना की हालत उस जुआरी की तरह थी जो जीतने के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगाकर हार चुका हो।

हिना की हालत घर के किसी भी शख्स से छुपी नहीं थी, शादी की तय्यारी शुरू हो गई थी, मगर हिना की उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी।

आखिर उसने खुद को हालात के हवाले करके तकदीर से समझौता कर लिया, हम्माद ने दोस्ती की लाज रखी थी, हिना ने हम्माद की लाज रख ली।

चार दिन बाद शादी थी वह अपने रब को सजदा करने के बाद दिल के सुकून के लिए दुआ मांग रही थी। “ऐ मालिक! मुझे सुकून दे,दिल की खुशी दे और मैं तुझसे कुछ नहीं मांगती।”

उसने अचानक अपने सर पर किसी के हाथ का बोझ महसूस करके सजदे से सर उठाया आमिर नम आंखों से उसकी तरफ देख रहे थे।

“पगली!” आमिर की आवाज गूंजी। “बेवकूफ तू अपने भय्या को अपना दुश्मन समझती थी? तेरी खुशी क्या मेरी खुशी नहीं है? पागल तूने मुझसे न सही अपनी भाभी से ही अपनी

राय जता दी होती, इशारों में ही सही, तो तुझे इतनी तकलीफों से तो नहीं गुजरना पड़ता।”

“और वह मेरा दोस्त, हर टापिक पर बात करता था, इस टापिक को छोडकर, वह तो शुक्र मुझे उसका वह खत मिल गया जो उसने आखरी बार तुम्हारे नाम भेजा था, फिर मुझे

सब बातों का पता चला और मैं इतना जालिम नहीं कि दोस्त को भी खो दूं, और बहन को भी, मैंने अम्मी से कह दिया है खला को मना कर दें, मेरी बहन रायपर से दिल्‍ली रुस्सत होकर जाएगी, मगर मेरे दोस्त के साथ ठीक है ना?”

आमिर ने मुस्कुराते हुए पूछा और हिना बेयकीनी से उसको देखती रही, उसे यकीन नहीं आ रहा था कि दुआएं इस तरह भी कबूल होती हैं।

उसने भीगी आंखों और मुस्कुराते लबों से आमिर को देखा और झेंपकर गर्दन झुकाली, उसकी दुआएं कुबूल हो गईं थीं उसे अपने परवरदिगार का शुक्र अदा करना था।

-Asiya Riyaz

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This Post Has 2 Comments

  1. Unknown

    Nice story please upload more stories

  2. Khursheed siddiqui

    Masha allah bahut hi khubsurat story he

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