Ehsaas – Mahakta Aanchal Story in Hindi

उज़मा जब से आई थी, अपने कैमरे में सो रही थी। दो तीन बार सीमाब बेगम ने जाकर देखा भी था, मगर वह गहरी नींद में थी।

अब रात के खाने का वक्त़ हो रहा था, सीमाब बेगम ने खाना टेबिल पर लगाया और दोबारा उसको उठाने आ गईं ।

“चलो बेटा देखो रात हो गई है, उठकर खाना खा लो ।” उन्होंने उसके मुंह से चादर हटाते हुए प्यार से कहा । उज़मा ने कसमसा कर आँखें खोली ।

“कब से सो रही हो तुम? वैसे भी कहते हैं ना कि लड़कियाँ मायके में आकर सो सो कर अपनी थकन उतारती हैं ।” प्यार से उज़मा के बालों में हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा था।

“ओह मम्मा! इतना टाइम हो गया?” उज़मा ने घड़ी में वक़्त देखा तो जल्दी से उठ बैठी। “ओके! आप चलें में मुंह हाथ धो कर आती हूं ।’ वह चप्पल पहनते हुए बोली तो सीमाब बेगम कमरे से बाहर निकल गई और उज़मा बाथ रूम की तरफ बढ गई ।

आज शाम को जब उज़मा अकेली आई वो सीमाब बेगम ने ज़ीशान के बारे में पूछा था। “मम्मा! उन्हें कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना है इस लिए में आ गई।

उज़मा ने उन्हें मुतमइन करा दिया था। खाना खाकर दोनों मां बेटी लाउंज में बैठ कर बातें करने लगीं । उज़मा चाय बना लाई थी यूं दोनों चाये भी पी रही थी।

“अच्छा जीशान कब वापस आएगा? सीमाब बेगम ने पूछा । “मम्मा’ जीशान कहीं नहीं गये वह यहीं पर हैं।” चाय का कप टेबिल पर रखते हुए उज़मा ने नज़रें झुका कर आहिस्ता से कहा ।

“अरे! तो फिर तुम ने झूठ क्‍यों बोला?” सीमाब बेगम ने हैरत से इसकी जानिब देखा । “बस मम्मा! आजिज़ आ गई हूं मैं । नहीं रहा जाता मुझसे इतनी बड़ी फौज के दरमियान ।”

“कैसी बातें कर रही हो तुम ?” सीमाब बेगम के लहज़े में नाराज़गी थी। “जी मम्मा! आपको तो पता है ना मुझे आदत है तन्हाई की और वहां जीशान की फैमिली और फिर दर्जन भर बहनें, कभी कोई आई है, तो कभी कोई ।

उफ़ वह घर नहीं चिडया घर है। “ उज़मा ने कानों को हाथ लगाकर बेज़ारी से कहा । “लेकिन तुम को पता था कि ज़ीशान की फैमिली कितनी बड़ी है फिर…?”

“हा मम्मा! मगर मेंने सोचा था कि मे कुछ दिनों में जीशान से कह कर किसी फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊंगी, मगर छह महीने हो गए शादी को, जीशान मानते ही नहीं।

इसीलिए नाराज़ होकर आ गई । अब जब तक वह बन्दोबस्त नहीं कर लेते मैं नहीं जाऊंगी।” सीमाब बेगम को लगा जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा उनके कानों में उंडेल दिया हो।

जैसे तारीख अपने आपको दोहरा रही हो । वह सर से पैर तक लरज़ उठीं। उनका पोर पोर सुलगने लगा।

बेइख़्तियार वह अपनी जगह से उठी ओर दूसरे ही लम्हें उनका भरपूर नमांचा उज़मा के नर्म व नाज़ुक सफेद गाल को सुर्ख़ कर चुका था।

यूं अचानक पड़ने वाले थप्पड़ ने उज़मा के चौदह तबक़ रौशन कर दिये । वह मम्मा जिन्होंन आज तक उज़मा को ऊंची आवाज़ में डांटा भी नहीं था, वह हाथ कैसे उठा सकती थीं।

वह गाल पर हाँथ रखे हैरत से अपनी मां को देख रही थी । “मम्मा…!” उसने डबडबाई आँखे झपकाई कि शायद उन्हें अपनी गलती का एहसास हो, मगर सीमाब बेगम के चेहरे पर चट्टोनों जैसी सख्ती थी।

“आज तो तुम ने इतनी बड़ी बात कह दी आइन्दा तुम्हारे मुंह से यह जुमला सुना तो मुझ से बरा कोई न होगा। उंगली उठाकर उन्होंने दांत भीचकर निहायत गुस्से में कहा और अपने कमरे की तरफ चल दी।

यह मम्मा को अचानक क्या हो गया? उज़मा हेरान थी । मम्मा का यह रूप उसके लिए कतई अजनबी था।

वह कुछ लम्हे गाल पर हाथ रखे यूं ही गुमसुम बैठी रही । फिर उठकर सीमाब बेगम के कमरे की तरफ चल दी । सीमाब बेगम दीवार की जानिब मुंह किए लेटी थीं।

“मम्मा! मम्मा!” उज़मा ने बेड पर बेेठकर आहिस्ता से उन्हें पुकारा, सीमाब बेगम का जिस्म हौल-हौल लरज़ रहा था। “मम्मा प्लीज!” उज़मा ने आगे बढ़कर अपनी जानिब उनकी करवट की ।

उनका चेहरा आंसुओं से तर था और आंखें ज़ब्त से सुर्ख हो रही थीं। “मम्मा क्या हुआ आपको ? बताएं ना प्लीज।

आपको बुरा लगा तो आई एम सोरी मगर…. प्लीज इस तरह तो न करें नां।” उज़मा उनकी हालत देखकर रो पड़ी।

“बताएं नां आप कुछ तो….” सीमाब बेगम उठी और उज़मा को गले लगाकर सिसक पड़ीं। “मेरी जान! तेरी मां ने सारी जिन्दगी जो तुझ से छुपाया शायद आज बताने का वक्‍त आ गया है।

यह जो तेरी मां है ना! जो बहुत मजबूत, निडर और हंसती मुस्कुराती नज़र आती है ना। यह औरत अन्दर से उतनी कमजोर, टूटी हुई और नाकाम औरत है।

अना परस्त और खुद गर्ज…. मैं ने आज तक जो तुझे बताया सब कुछ गलत था, अपनी ज़िद, हंटधर्मी और असलियत को तझ से छपाया है।

वह कह रही थीं और उज़मा हैरत से आंखें फाड़े उनकी बात सन रही थी। “बेटा तू ने अपनी मां की आंखों में कभी एक आंसू न देखा ना, यह बहुत कमजोर है बहुत बेबस ।”

उज़मा ने जल्दी से उन्हें पानी दिया, पानी पी कर वह कुछ संभली ।

“अब बताएं मम्मा हकीकत क्‍या है?” उज़मा ने गिलास इनके हाथ से लेकर साइड पर रखा और इनके हाथ थाम कर घबराए हुए लहजे में कहा।

सीमाब बेगम कुछ देर रुकी ओर फिर माजी के वाकेआत उनके जहन में धीरे धीरे एक एक करके आने लगे।

“उमर यह क्या है सब?” तीन दिन अपने भाई के घर रह कर सीमाब बेगम वापस आई तो अपने कमरे में हाशिम को खेलता देखकर उनकी तेवरियों पर बल पड़ गए।

उमर वहीं कुर्सी पर बैठकर जते उतार रहे थे । उसकी बात पर सर उठाकर हैरत से पछा । “क्यों क्या हुआ?”

“देखें जरा कितना गन्दा कर दिया है मेरा कमरा।” सीमाब बेगम ने कारपेट पर पड़े दो खिलौनों की तरफ इशारा किया। “यह सब कुछ होता है मेरे पीछे।”

“अरे यार! ऐसा क्‍या हो गया? अभी हम देखकर तो आया है हाशिम और फिर खिलाने ही तो हैं नां।” उमर ने जते में मोजे रखते हुए धीमे लहजे जे कहा ।

“देखें कारपेट पर धब्बे पड़े हुए हैं, खाना खाया होगा बच्चों ने ।” उसने कहा। “ओफोह। तुम भी नां? यहां खाना कौन खाएगा भला?” उमर ने थोड़े से तेज लहजे में कहा और कमर से निकल गये।

“होन्ह! पागल हु ना मैं।” बड़बड़ाती हुई सीमाब बेगम उज़मा का डाइपर चेंज करने लगीं । यह कोई नई बात न थी, शादी के शुरू के दिनों में ही सीमाब वेगम के यह लच्छन थे।

उमर की अम्मां, एक गैर शादी शदा बहन इरज, एक बेवा बहन मलाहत आपा और उनके दो छोटे छोटे बच्चे हाशिम और अरुना।

यह सब लोग सीमाब बेगम को एक आंख न भाते थे, क्योंकि सब उमर की जिम्मेदारी थे। हालांकि उमर सीमाब बेगम का बहुत ख्याल रखते, बहत मुहब्वत करते।

उज़मा की हर जरूरत वक्त से पहले पूरी कर देते, मगर फिर भी सीमाब बेगम मुतमइन न रहती ।

घर के काम काज में वह ज्यादा दिलचस्पी न लेती थीं। ज़्यादा तर काम मलाहत आपा ही करती थीं। इरज भी कालिज से आकर कुछ न कुछ करती रहती। इरज का रिश्ता हो चुका था और ग्रेजुएशन के बाद उसकी शादी थी।

अम्मा भी उज़मा की जिम्मेदारियां निभाती थीं। सीमाब बेगम उन दिनों रिसाले पढ़ती रहती या टीवी पर हिन्दी फिल्में देखती रहती ।

वह फिल्मों और अफसानों में सेपरेट फेमिली देखती तो उनका दिल भी मचल जाता, उनको शदीद ख्वाहिश होती कि वह अपने मियां और बेटी के साथ ऐश करें।

घुमें फिरें, होटलिंग, पिकनिक, पार्टियां । वह इन्जवाएमेन्ट चाहती थीं। यहां पर तो एक बार बाहर जाकर खाना खाना भी अज़ाब था। पूरा घर साथ होता यह सब उनको बहुत बुरा लगता ।

उस रोज सीमाब बेगम की सालगिरा थी । सीमाब ने सबह ही उमर को कह दिया था कि हम शाम को बाहर घूमने जाएंगे और उमर ने भी हामी भर ली थी। शाम को उमर के आने से पहले वह तय्यार हो गई।

उमर भी आफिस से आकर तय्यार हो गया। वह दोनों तय्यार होकर बाहर आए। बरआमदे में अम्मां और मलाहत आपा बैठी थीं। इरज किचन में थी । “तम लोग कहीं जा रहे हो क्‍या?” अम्मां ने जो यूँ उन्हें तय्यार देखा तो हेरत से पछा।

“जी अम्मां! आज सीमाब की सालगिरा है। हम लोग बाहर खाना खाएंगे। तमने अम्मां को बताया नहीं सीमाब?” उमर ने पहले मां और फिर सीमाब की तरफ पलटकर पूछा ।

“नहीं बेटा! ऐसी कोई बात नहीं, मगर सीमाब मैं ने तुम को बताया था नां कि इरज के ससराल वाले आने वाले हैं उमर को बता देना।” अम्मां ने गुस्से भरे लहजे में सीमाब को मुखातिब किया ।

“हां मुझे याद नहीं रहा ।” सीमाब ने जल्दी से झट बोला। “अरे सीमाब! तुम को कैसे याद नहीं रहा?” उमर सीमाब से मखातिब था।

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“अगर वह लोग आ रहे हैं तो हम लोग किस तरह जा सकते हैं ।” “इन्सान हूं मैं, भूल सकती हूँ। सीमाब के लहज़े में बदतमीज़ी थी।

और वैसे भी यह लोग किसी और दिन भी आ सकतें है नां मेरी सालगिरा रोज़ रोज़ आएगी क्या?” “हां मगर…” इससे पहले कि उमर कोई बदतमीजी करता मलाहत आपा जल्दी से दरमियान में आ गई।

“कोई बात नहीं उमर तुम लोग हो आओ । वह लोग वैसे भी लेट ही आते हैं।” “नहीं आपा! अच्छा नहीं लगेगा।” उमर ने कहा।

सीमाब ने एक गुस्सीली नजर उमर पर डाली उसके तेवर खासे बिगड़े हुए लग रहे थे। अम्मां ने मोका की नजाकत देखी तो जल्दी से बोलीं ।

“कोई बात नहीं बेटा, जाओ तम लोग।” “नहीं कोई जरूरत नहीं है कुछ कहने की। नहीं जाना मुझे ।” बदतमीजी से कहकर वह पलटी और धम धम करती पैर पटखती अपने कमरे में चली गईं।

ज़ोर से पर्स बेड पर फेंका और सेंडल उतारे बिना ही औन्धे मुँह बेड पर गिर गई । उमर भी पीछे आ गया। “सीमाब क्‍या बच्चों की सी हरकतें कर रही हो तुम? पागल हो गई हो क्या?” “हां! मैं बच्ची हूं, पागल हूं मैं ।

अजीब कैद में आ गई में तो…” वह जान बूझकर जोर से बोल रही थी ताकि अम्मां और मलाहत आपा सुन सकें । “सीमाब तुम बदतमीजी कर रही हो । यह इतना बडा मुआमला नहीं है।” उमर को भी गुस्सा आ रहा था।

“प्लीज! आप जाएं यहां से ।” वह हाथ जोड़कर बोली तो उमर ने एक तेज नज़र उस पर डाली और कमरे से निकल गया और वह औन्‍्धी पड़ी रोने लगी ।

सीमाब ने अपना गुस्सा इस तरह निकाला कि फिर वह कमरे से बाहर ही न निकली । इरज के सुसराल वाले आए भी ओर चले भी गए।

उमर ने कितना चाहा कि यह बाहर आ जाए, मगर वह जिद और हटधर्मी में एक ही थी। उसकी नां हां में न बदली और उमर खामोश हो गया ।

फिर दो दिन बाद ही सीमाब ने अलग घर की फरमाइश कर दी। “मुझे अलग फ्लैट लेकर दो । मुझे नहीं रहना इस जंजाल में ।” “सीमाब तुम ज्यादती कर रही हो।”

उमर ने गुस्से कहा। “आप कुछ भी कहें उमर । मुझें अपनी बच्ची की परवरिश अपने तरीके से करनी है । ऐसी फेमिलीज में बेजा लाड प्यार में बच्चे बिगड़ जाते हैं।

कल को हमारी उज़मा बड़ी होगी तो में उसको मिसाली बच्ची देखना चाहती हूं। हमारे और भी बच्चो होंगे। हमें इनकी अच्छी तरबीयत करनी होगी।” “तुम पालग हो रही हो।

खामोशी से सो जाओ ।” उमर ने लाइट आफ करके जैसे बात खत्म करना चाही और करवट बदल कर लेट गया। “हां पागल ही सही, मगर अब मैं यहां नहीं रह सकती, यहां पर तो अपनी मरजी से जिन्दगी भी नहीं गुजार सकती मैं ।

इतने बजे सोना, उतने बजे उठना, लंच टाइम, डिनर टाइम, शाम की चाय, खाने का मीनु … हर चीज हर काम वक्‍त पर एहतियात और बाहमी रज़ामन्दी के साथ। उठना बेठना भी सोच समझकर।

तौबा घर नहीं प्राइमरी स्कूल है जैसे ।” वह उज़मा की फीडर बनाते बनाते बुलन्द आवाज़ में बड़बड़ा रही थी और उमर मुंह लपेटे खामोश लेटा था।

रफ़्ता रफ़्ता सीमाब की ख़्वाहिश तूल पकड़ती गई और किसी न किसी बहाने वह खूब शोर करती, घर में चीखो पुकार करती । हाशिम ने उज़मा को गिरा दिया, अरीबा ने उसकी टांग मोड़ दी।

मेरी लिपस्टिक सत्यानास कर दी, कारेपट पर बिरयानी गिरा दिया। “तौबां….तौबा यह बच्चे हैं या शैतान के चेले। संभालें आपा अपने बच्चों को । अज़ाब हैं अज़ाब ।” वह झुंझलाकर कुछ न कुछ कहती रहती ।

अम्मां और मलाहत आपा सब कुछ सुनती, मगर खामोश रहती कि उमर का दिल बुरा न हो फिर इरज की शादी भी सर पर थी। उमर ने प्यार से सीमाब को समझना चाहा कि इरज की शादी सर पर है अभी फ़्लैट का इन्तिज़ाम मुश्किल है।

फिर शायद उमर को जाब की तरफ से बाहर जाने का चान्स भी मिलने वाला था। उसने समझाना चाहा कि तुम अकेली किस तरह रह पाओगी, लेकिन किसी कीमत पर भी अपनी जिद नहीं छोड़ी।

उस रोज तो सीमाब ने हद कर दी मलाहत आपा और इरज मार्किट गई हुई थी। अम्मां अन्दर कमरे में कुछ काम कर रही थीं। सीमाब किचन में थी, उमर आफिस से नहीं आया था।

हाशिम नजर बचाकर सीमाब के कमरे में आ गया । चार साल के हाशिम को गोल मटोल उज़मा बहुत अच्छी लगती थी।

वह बहाने बहाने से आकर उसे प्यार करता रहता था। उसने उज़मा को उठाना चाहा तो उज़मा उसके हाथ से छूट कर वहीं बेड पर फिसल कर गिर पडी।

बच्ची थी रोने लगी। सीमाब दौडकर आई और जो यूँ उज़मा को रोते देखा तो आओ देखा न ताओ तमांचा नन्‍्हें हाशिम के गाल पर जड़ दिया। पहले ही बच्चा सहमा हुआ था।

इस अचानक थप्पड़ पर ज़ोर जोर से रोने लगा तब ही उमर आफिस से आया, साथ ही अम्मां भी आवाज़ सुनकर भागी आईं।

“सीमाब! बच्चा है वह मासूम।” उमर ने सीमाब को मारता देख लिया था। हां वह बच्चा है और यह मासूम बच्ची, जिसको इसने पटख दिया।” सीमाब बदतमीजी से बोली ।

“उज़मा चुप हो चकी थी। वह बेड पर ही थी नां। अगर चोट लगती तो रोती नहीं क्या?” उमर का लहजा गुस्सीलां था।

अम्मां खामोशी से हाशिम को गोद में उठाकर कमरे से बाहर निकल गईं। “पता नहीं कब तक इस जहन्नम में रहना होगा मझे।” वह बडबड़ाई।

“सीमाब तुम हद से बढ़ रही हो । तम चाहती क्या हो आखिर?” उमर का जब्त भी जवाब देने लगा था। “पता है आपको कि मैं क्या चाहती हूं। नहीं रहा जाता मुझ से इस हाउस फुल में…और में ने कोई अनोखी चीज नहीं मांगी आपसे।

अच्छी जिन्दगी देना फर्ज है आपका।” “तो यहां कमी किस चीज की है तुम को?” “सुकून की, प्राइवेसी की।” “और तुम्हारा कोई फर्ज नही, तुम सिफ मरजी, अपनी ख्वाहिशात को अहमियत दे रही हो।

मेरी फैमिली, मेरी प्राब्लम्ज और मेरे हालात तुम्हारे नजदीक कोई अहमियत नहीं रखते । क्या तुम्हारा और मेरा तअल्लुक ऐसा है कि सिर्फ अपने बारे में सोचो, मेरी प्राब्लम्ज तुम्हारी नहीं हैं क्या?” उमर ने तीखे लहजे में पछा।

“नहीं ।” वह बेसाख्ता बोली । “तुम क्या कह रही हो सीमाब!””उमर को लम्हे भर के लिए धचका सा लगा।

उसे शायद इतने दो टूक जवाब की उम्मीद न थी। उसने ठन्डी सांस लेकर सीमाब को दखा। “तुम….तुम एक बार फिर सोच लो समीबा….कहीं तुम अपने लिए गलत रास्ते का इन्तिखाब तो नहीं कर रही हो ।

कहीं तम्हें बाद में पंछतावा न हो।” उमर ने आखिरी बार अपनी जानिब से समझाने की कोशिश की।

“नहीं करूंगी आपसे शिकायत ।” वह हतमी अन्दाज में बोली। “ओके तुम्हारी मरजी ।” उमर का चेहरा धूआं धूआं हो रहा था ।

कैसी औरत थी सीमाब, वह थके थके कदमों से कमरे से बाहर निकल गया । इस वाकऐ को मुश्किल से दस बारह देन गज़रे होंगे ।

एक शाम उमर आफिस से घर आया तो उसने नया फ्लैट लेने की खुशखबरी सनाई । “क्या सच?” वह खुशी से बेकाबू हो गयी।

“हा! कल इतवार है, कल शिफ्टिंग कर लेंगे।” उमर बुझे बुझे लहजे में बोला मगर वह तो हवाओं में उड़ रही थी। उसको यकीन नहीं आ रहा था कि उमर इतनी जल्दी मान लेंगे। वह खुशी खुशी पैकिंग करने लगी।

“सुबह जाकर में सफाई वगैरह कर लूंगी, शाम को सामान शिफ्ट कर लेंगे।” वह आप ही आप मुस्कराते हए सोचने लगी।

सब लोग अपनी अपनी जगह चप थे बस सीमाब ही थी जो बहुत खुश थी। नाश्ते से फारिग होकर वह तीनो घर से निकले। शहर के बीचों बीच फ्लैट था।

“काफी मेहंगा होगा।” इसने सोचा, मगर इन बातों की उसे कोई परवा कहां थी। हां ऐसा था कि इस फ्लैट में आस पास इसके मायके के काफी लोग आबाद हे।

दो कमरों का फ्लैट था। लाउंज, एटेच बाथरूम और बालकनी । बहुत खुश हुई कार्नर का फ्लैट था, दोनों तरफ से सड़कें नज़र आ रही थीं।

“किचन में फ्रिज रखा था जिसमे जरूरत की हर चीज़ मौजूद थी। “वाह ।” सीमाब को उमर पर प्यार आ गया । कितना ख्याल रखता था वह।

“ओके तुम ठहरो में सामान ले आता हूँ।” कहकर उमर सामान लेने चला गया । काफी देर बाद आया तो मजदरों के साथ सामान सेट करवा दिया ।

काम से फारिग होकर मजदूर पैसे लेकर चले गये । वह थका थका सा सोफे पर बैठ गया। “आप नहाकर फ्रेश हो जाएं।” उमर को देखकर सीमाब ने कहा ।

हां नहाऊंगा घर जाकर ।” वह सोफे से उठता हुआ बोला। “घर जाकर. …मतलब…..? यह घर नहीं क्या?” सीमाब ने चौंक कर कदरे हैरानी से पछा।

“नहीं सीमाब बेगम! यह मेरा घर नहीं, यह आपका फ्लैट है। आपकी मिलकियत, आपके ख्वांबों की ताबीर। एक एक लफ्ज चबा चबा कर उमर जहर भरे लहजे में बोलता चला गया।

यहीं आप रहेंगी अपनी बच्ची के साथ कि उसकी तरबीयत जो करनी है आपको । “क्या….? क्या पागल हो गए हे आप? मैं….मैं अकेली किस तरह रह सकती हूं।” वह घबरा कर बोली ।

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“यह तो आपकी ही ख्वाहिश थी नां, समझो में बाहर चला गया । तुम्हारी ज़िद और ख्वाहिश के मुताबिक सब कुछ हो गया है नां।

तुम ने कहा था अकेली रह सकती हो तो रहो, अब मगर मेरी बूढ़ी मां को मेरी जरूरत है । मेरी छोटी बहन की शादी बाकी है, जो मेरी जिम्मेदारी है।

मेरी बड़ी बहन का निकाह करवाना है ताकि उसका ठिकाना लग सके । हां तुम को और उज़मा को कभी भी किसी चीज की कमी न होगी ।

फ्लैट की किस्त और तुम्हारा खर्चा हर महीने वक्‍त से पहले तुम को मिल जाया करेगा । जब उज़मा अठारह साल की होगी तो तुम्हारे कहने से पहले मैं उसकी शादी के अखराजात के लिए भारी रकम भिजवा दुगा ।

तुम और उज़मा मेरी जिम्मेदारी हो । इन्शा अल्ला कभी इस में कमी नहीं होगी । हां फिलहाल यह रख लो ।”

उसने जेब से लिफाफा निकालकर मेज पर फेंका जिस में काफी सारे पैसे थे और दरवाजे की तरफ बढने लगा।

“उमर….उमर….प्लीज बात सुनिए मेरी…. आप ऐसा कैसे कर सकते हैं । कैसे रहूंगी मैं?” वह रास्ते में आ गई।

“तुम ने खद ही कहा था नां कि तुम को मेरी प्राब्लम्ज से कोई सरोकार नहीं । तुम रह सकती हो फिर? मेरे फराइज से तुम्हें कोई मतलब नहीं।

मुझे अपने फराइज पुरे करने हैं।” “तो ….तो…. मैं और उज़मा आपके फराइज में शामिल नहीं ।” वह रुहांसी होकर बहस पर उतर आई ।

“हो…और मैं एडजस्ट भी कर रहा था ना मगर तुम्हारी ही थी नां ज़िद अकेले रहने की तो रहो। मै कभी भी अपने फराइज से चूक नहीं करूगा, यह मेरा वादा है।”

इतना कहकर उसने आहिस्तगी से उसे आगे से हटाया और खुले दरवाजे से बाहर निकल गया।

“यह.. यह क्या हो गया था। एक लम्हे के लिए सीमाब का दिमाग़ सन्‍न हो चुका था। जवान जहान औरत। नन्‍्हीं बच्ची .. या अल्लाह में किस तरह रह सकूंगी । यह क्‍या हो गया था।

वह वहीं बैठकर फूट फूटकर रोने लगी । कुछ दिन गुज़रे थे कि उमर की जानिव से उसके लिए तलाक के कागजात भी आ गए। कितना कठोर बन गया था वह।

वह तो बहुत मुलायम और धीमे मिजाज का इन्सान था। उसे क्या हाे गया था। तब सीमाब को एहसास हुआ कि मुहब्बत करने और ख्याल करने वाले आदमी को कभी भी बेवकूफ और पागल नहीं समझना चाहिए ।

जो जितनी शिद्दत से प्यार करता है अगर नफरत करने पर आ जाए तो नफरत की शिद्दतें भी नाकाबिल बरदाश्त हो जाती हैं । वक़्त अपनी रफ्तार से गुज़रता रहा ।

कभी कहीं से कोई खबर मिल जाती । अम्मां का इन्तिकाल हो चुका था। मलाहत आपा का अकद हो चुका था वह मुंबई चली गई थीं।

इरज शादी के बाद सऊदी अरब चली गई थी और उमर अमरीका चला गया था। उज़मा को सीमाब ने यही बताया था कि इसके पापा की डेथ हो गई है ।

उज़मा की बीमारी में भाग दौड़, घर और बाहर देखन कठिन हो गया था। उज़मा का स्कूल, सब कुछ जिम्मेदारियां निभानी पड़ती।

माँ बाप वो थे नहीं, कजिन्ज वगैरह थे। वह भी सब अपने अपने धंधों में बिज़ी थे। कभी कभार आना जाना होता था, वर्ना सीमाब होती और उज़मा । ईद, बकरीद पर कभी कोई आ जाता, वर्ना वह भी आम दिनों की तरह ही गुजर जाता।

हर महीने भारी रकम सीमाब को अखराजात के लिए मिल जाती । सीमाब बड़े हौसले और हिम्मत के साथ गुज़ारा करती ।

कभी भी उज़मा के सामने खुद को कमजोर और बेबस महसूस नहीं होने िदया । उज़मा अपनी मम्मा को दुनिया की सब से बाहिम्मत और अजीम मम्मा कहती थी, जिन्होंने उज़मा की खातिर सारी जवानी यू ही गुज़ार दी थी।

उज़मा बड़ी हुई तो उसने एक बार पछा। “मम्मा सब के पापा आफिस जाते हैं और सैलरी लाते हैं, हमारे पापा तो नहीं फिरआप मेरे स्कूल और ट्यूशन की फीस कैसे देती हैं और हमारे घर के खर्च…..?”

तब सीमाब ने कमाल होशियारी से एक ओर झूट बोला कि बेटा तुम्हारे पापा की प्रापटी है। वहुत्त बड़ी बड़ी दकानें हैं उनका किराया आता हे, उसी का हर माह मनीआडर आता है।” और यूं उजमा मुतमइन हो गई।

उज़मा ने बी.एस.सी. कर लिया तो एक बहुत अच्छा रिश्ता उसके लिए आ गया। उज़मा की शादी के नाम पर पहले ही रकम आ चुकी थी।

यूं थोड़ी बहुत छान बीन के बाद जीशान से उज़मा की शादी हो गई । जीशान पढ़ा लिखा और खुश शक्ल नौजवान था। फैमिली भी अच्छी थी।

जीशान की चार बहने शादी शुदा थीं जो बच्चों वाली थी इस लिए आना जाना लगा रहता था । शुरू शुरू में तो उज़मा ने गुजारा कर लिया मगर अब उसे बड़ी फैमिली से एलर्जी होने लगी थी ।

उसे शुरू से ही तन्हाई की आदत थी । उसने जीशान से दबे दबे लफ्जों में अलग होने का मुतालबा किया, मगर जीशान ने कोई तवज्जोह न दी तो वह रूठकर मां के घर आ गई कि

जीशान उसकी बात मान लेगा और सीमाब बेगम को जब हकीकत का इल्म हुआ तो वह सारे जख्म जो बड़ी मुश्किल से छुपाए थे एक बार फिर से ताज़ा हो गये।

उन्हें उज़मा की शक्ल में अपना आप दिखाई दे रहा था। वक्‍त ने एक बार फिर करवट ली थी ओर अपने आपको दोहराना चाह रहा था शायद । लेकिन अब की बार वह हरगिज ऐसा नहीं होने देने वाली थीं।

जो बेवकूफी उन्होंने की किसी सूरत वह बेटी को नहीं करने देने वाली थीं। वह अपने रत जगों की अकेली गवाह थीं।

कितने कठिन और दर्दनाक दिन और रात गज़ारे थे उन्होंने जो बजाहिर हिममते और हौसले का मुज़ाहिरा करती थीं अंदर से कितनी जख्मी और हारी थीं।

कहते कहते सीमाब बेगम एक मिनट को रुकी तो उनका चेहरा आंसुओं से तर था। सारा जिस्म हौले हौले लरज़ रहा था। “मम्मा….मम्मा….वह आप…..?” उज़मा निहायत तलाशे जुस्तजू में मसरूफ आखे फाड़े सब कुछ सुन रही थी।

“हां ।” उन्होंने सर हिलाकर जैसे अपने जुर्म का एतेराफ किया। दोनों मां बेटी एक दूसरे से लिपट कर रोती रहीं । न जाने रात का कौन सा पहर था।

“बच्चे! अपनी मां को मुआफ कर देना, मगर तुम….तुम….हरगिज़ हरगिज वह गलती न करना।” उन्होंने कांपते हाथ उसके सामने जोड दिये।

“मम्मा….मम्मा ।” वह मां का हाथ थामकर सिसक पड़ी। “प्लीज बस करें बहुत रो चुकी हैं आप । बहुत रात हो चुकी है अब आप सो जाएं कुछ मत सोचें, जो हुआ सो हुआ ।” उज़मा ने प्यार से उनके हाथ थपथपाए।

उन्हें बेड पर लिंटाकर चादर ओढ़ाई और लाइट आफ करके दरवाज़ा बन्द करके बाहर आगई। अब भला सीमाब बेगम को कहां नीन्द आती। यह सोच उन्हें तंग कर रही थी कि शायद उज़मा उनसे नाराज हो गई है। हां ठीक ही तो है।

बाप के होते हुए भी सारी जिन्दगी वह यतीमों की तरह रही, वह तकिए में मुंह देकर सिसक पड़ीं। सुबह सीमाब बेगम की आंख खुली तो सर दर्द की वजह से फटा जा रहा था।

अचानक उन्हें रात वाली बातें याद आ गई। वह शर्मिन्दगी महसूस कर रही थीं। कमरे से बाहर आईं तो उज़मा किचन में थी। “मम्मा जल्दी से मुंह धोकर आएं, मैं ने नाश्ता बना दिया है।” उज़मा ने खुशगवार लहजे में कहा तो उन्हें इत्तमीनान हुआ।

नाश्ते के बाद उज़मा उठकर अपने कमरे में चली गयी। बाहर आई तो उसके हाथ में बैग था। “मम्मा मैं ने जीशान को फोन कर दिया था, वह आफिस जाने से पहले मझे । घर ले जाकर छोडेगा। मैं अपने घर जा रही हूं मम्मा ।

जहां मेरा प्यार करने वाला शौहर, माँ जैसी सास और बहनो जैसी नंदें है, जिसे जन्नत बनाना मेरी जिम्मेदारी हैं । और मम्मा आप दिल पर कोई बोझ मत रखिएगा।

मैं आपसे बिल्कुल नाराज नहीं बल्कि आपने मुझे भी सही रास्ता दिखा या है, बस मेरे लिए दुआ कीजिएग़ा, ओके । ओह मम्मा! जीशान का मैसेज आ गया । वह नीचे मेरा वेट कर रहे हैं, अल्ला हाफिज । अपना बहुत ख्याल रखिएगा।”

जाते जाते मां से लिपट कर उज़मा की आंखें भीग गई थीं। “ओके मेरी जान! खुदा तुम्हें बहुत सारी खुशियां और मुहब्बतें दे ।” सीमाब बेगम की आंखों में भी आंसू आ गये थे । उज़मा बाहर निकली तो वह बालकनी में आ गईं।

उज़मा को देखकर जीशान कितने प्यार भरे अन्दाज में आगे बढ़ा था और प्यार से उसके हाथ थामकर गाडी में बिठाया था। कितने खुश लग रहे थे दोनों।

गाड़ी जल्दी से आगे बढ़ गई । सीमाब बेगम ने मुतमइन होकर सर रेलिंग से टिका दिया । बहुत बेफिक्र हो गई वह, कम से कम उन्होंने अपनी बेटी का मुस्तकबिल तो बचा लिया था।

उनके लबों से ढेर सारी दुआओं के साथ बेशुमार आंसू बह निकले । आज वह आखिरी बार जी भर के रोना चहती थी।

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  1. Unknown

    Nice story please upload more stories…..

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