उज़मा जब से आई थी, अपने कैमरे में सो रही थी। दो तीन बार सीमाब बेगम ने जाकर देखा भी था, मगर वह गहरी नींद में थी।

अब रात के खाने का वक्त़ हो रहा था, सीमाब बेगम ने खाना टेबिल पर लगाया और दोबारा उसको उठाने आ गईं ।

“चलो बेटा देखो रात हो गई है, उठकर खाना खा लो ।” उन्होंने उसके मुंह से चादर हटाते हुए प्यार से कहा । उज़मा ने कसमसा कर आँखें खोली ।

“कब से सो रही हो तुम? वैसे भी कहते हैं ना कि लड़कियाँ मायके में आकर सो सो कर अपनी थकन उतारती हैं ।” प्यार से उज़मा के बालों में हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा था।

“ओह मम्मा! इतना टाइम हो गया?” उज़मा ने घड़ी में वक़्त देखा तो जल्दी से उठ बैठी। “ओके! आप चलें में मुंह हाथ धो कर आती हूं ।’ वह चप्पल पहनते हुए बोली तो सीमाब बेगम कमरे से बाहर निकल गई और उज़मा बाथ रूम की तरफ बढ गई ।

आज शाम को जब उज़मा अकेली आई वो सीमाब बेगम ने ज़ीशान के बारे में पूछा था। “मम्मा! उन्हें कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना है इस लिए में आ गई।

उज़मा ने उन्हें मुतमइन करा दिया था। खाना खाकर दोनों मां बेटी लाउंज में बैठ कर बातें करने लगीं । उज़मा चाय बना लाई थी यूं दोनों चाये भी पी रही थी।

“अच्छा जीशान कब वापस आएगा? सीमाब बेगम ने पूछा । “मम्मा’ जीशान कहीं नहीं गये वह यहीं पर हैं।” चाय का कप टेबिल पर रखते हुए उज़मा ने नज़रें झुका कर आहिस्ता से कहा ।

“अरे! तो फिर तुम ने झूठ क्‍यों बोला?” सीमाब बेगम ने हैरत से इसकी जानिब देखा । “बस मम्मा! आजिज़ आ गई हूं मैं । नहीं रहा जाता मुझसे इतनी बड़ी फौज के दरमियान ।”

“कैसी बातें कर रही हो तुम ?” सीमाब बेगम के लहज़े में नाराज़गी थी। “जी मम्मा! आपको तो पता है ना मुझे आदत है तन्हाई की और वहां जीशान की फैमिली और फिर दर्जन भर बहनें, कभी कोई आई है, तो कभी कोई ।

उफ़ वह घर नहीं चिडया घर है। “ उज़मा ने कानों को हाथ लगाकर बेज़ारी से कहा । “लेकिन तुम को पता था कि ज़ीशान की फैमिली कितनी बड़ी है फिर…?”

“हा मम्मा! मगर मेंने सोचा था कि मे कुछ दिनों में जीशान से कह कर किसी फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊंगी, मगर छह महीने हो गए शादी को, जीशान मानते ही नहीं।

इसीलिए नाराज़ होकर आ गई । अब जब तक वह बन्दोबस्त नहीं कर लेते मैं नहीं जाऊंगी।” सीमाब बेगम को लगा जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा उनके कानों में उंडेल दिया हो।

जैसे तारीख अपने आपको दोहरा रही हो । वह सर से पैर तक लरज़ उठीं। उनका पोर पोर सुलगने लगा।

बेइख़्तियार वह अपनी जगह से उठी ओर दूसरे ही लम्हें उनका भरपूर नमांचा उज़मा के नर्म व नाज़ुक सफेद गाल को सुर्ख़ कर चुका था।

यूं अचानक पड़ने वाले थप्पड़ ने उज़मा के चौदह तबक़ रौशन कर दिये । वह मम्मा जिन्होंन आज तक उज़मा को ऊंची आवाज़ में डांटा भी नहीं था, वह हाथ कैसे उठा सकती थीं।

वह गाल पर हाँथ रखे हैरत से अपनी मां को देख रही थी । “मम्मा…!” उसने डबडबाई आँखे झपकाई कि शायद उन्हें अपनी गलती का एहसास हो, मगर सीमाब बेगम के चेहरे पर चट्टोनों जैसी सख्ती थी।

“आज तो तुम ने इतनी बड़ी बात कह दी आइन्दा तुम्हारे मुंह से यह जुमला सुना तो मुझ से बरा कोई न होगा। उंगली उठाकर उन्होंने दांत भीचकर निहायत गुस्से में कहा और अपने कमरे की तरफ चल दी।

यह मम्मा को अचानक क्या हो गया? उज़मा हेरान थी । मम्मा का यह रूप उसके लिए कतई अजनबी था।

वह कुछ लम्हे गाल पर हाथ रखे यूं ही गुमसुम बैठी रही । फिर उठकर सीमाब बेगम के कमरे की तरफ चल दी । सीमाब बेगम दीवार की जानिब मुंह किए लेटी थीं।

“मम्मा! मम्मा!” उज़मा ने बेड पर बेेठकर आहिस्ता से उन्हें पुकारा, सीमाब बेगम का जिस्म हौल-हौल लरज़ रहा था। “मम्मा प्लीज!” उज़मा ने आगे बढ़कर अपनी जानिब उनकी करवट की ।

उनका चेहरा आंसुओं से तर था और आंखें ज़ब्त से सुर्ख हो रही थीं। “मम्मा क्या हुआ आपको ? बताएं ना प्लीज।

आपको बुरा लगा तो आई एम सोरी मगर…. प्लीज इस तरह तो न करें नां।” उज़मा उनकी हालत देखकर रो पड़ी।

“बताएं नां आप कुछ तो….” सीमाब बेगम उठी और उज़मा को गले लगाकर सिसक पड़ीं। “मेरी जान! तेरी मां ने सारी जिन्दगी जो तुझ से छुपाया शायद आज बताने का वक्‍त आ गया है।

यह जो तेरी मां है ना! जो बहुत मजबूत, निडर और हंसती मुस्कुराती नज़र आती है ना। यह औरत अन्दर से उतनी कमजोर, टूटी हुई और नाकाम औरत है।

अना परस्त और खुद गर्ज…. मैं ने आज तक जो तुझे बताया सब कुछ गलत था, अपनी ज़िद, हंटधर्मी और असलियत को तझ से छपाया है।

वह कह रही थीं और उज़मा हैरत से आंखें फाड़े उनकी बात सन रही थी। “बेटा तू ने अपनी मां की आंखों में कभी एक आंसू न देखा ना, यह बहुत कमजोर है बहुत बेबस ।”

उज़मा ने जल्दी से उन्हें पानी दिया, पानी पी कर वह कुछ संभली ।


1 Comment

  • Unknown · April 25, 2020 at 1:21 pm

    Nice story please upload more stories…..

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