फूल जैसे रिश्ते – एक कहानी एक सबक – महकता आँचल कहानी इन हिंदी

रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते। एहसास और खुलूस से भी बनते हैं। वह रिश्ते जो हम खुद बनाते हैं अक्सर रेत भी साबित होते हैं।

लेकिन अगर नीयतों में खुलूस और मुहब्बत की सच्चाई शामिल हो तो हम अपने बनाए हुए रिश्तों को मजबूत और देर तक़ का बना सकते हैं।

शर्त सिर्फ नीयतों का खुलूस होना है। सास और बहू के रिश्ते अक्सर खून के नहीं होते मगर उन्हें खूब के रिश्तों जैसी मजबूती देने के लिए खुलूस और प्यार की जरूरत होती है।

मगर एहसास और खुलूस न हों तो कोई भी रिश्ता जो हम खुद बनाते हैं वह कभी टिकाऊ नहीं हो सकता। सास और बहू के रिश्ते में जहां सासू मां के दर्जे पर होती है वहीं बहू का मकाम भी बेटी जैसा होता है।

अगर इस रिश्ते को मां और बेटी का रिश्ता समझा जाए तो . ..। मगर ऐसा मुश्किल से ही होता है। सास के लिए एक अनजान लड़की को बहू के रिश्ते के तौर पर कबूल करना और एक बहू के लिए अपने शौहर की मां को अपनी मां मानना बहुत कठिन महसूस होता है।

लेकिन अगर यह दोनों रिश्ते प्यार से आगे बढ़ते रहें तो एक दिन कामयाबी यकीनी ओर टिकाऊ होती है

मेहरुन्निसा और सानिया के रिश्ते को प्यार मुहब्बत की जरूरत थी। रमजान का महीना तो पिछले हफ्ते ही शुरू हो चुका था।

और हर साल की तरह इस साल भी मेहरून्निसा बेगम ने इस मुबारक महीने को खुश आमदीद (Welcome) कहने का भरपूर इन्तिजाम पहले से कर रखा था।

इस महीने उन्होंने इबादत के लिए अपना शेडयूल तय्यार कर लिया था और वह पूरा दिन इबादत करती। फिर सानिया के साथ मिल कर इफ्तारी के लिए बहू की थोड़ी बहुत मदद करतीं। 

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वैसे भी उनके यहां इफ्तारी का ज्यादा इन्तिजाम नहीं किया जाता था। सिर्फ खजूरों और फ्रूट चाट के साथ किसी भी फ्रूट मिल्क का शेक तय्यार कर लिया जाता था।

और फिर इफ्तार करके मगरिब की नमाज के बाद सादा खाना खा लिया जाता था। बरसों से मेहरुन्निसा ने अपने घराने की यही रूटीन बना रखी थी।

वह रमजान के महीने में बेहतरीन खाने के बजाए इबादत ज्यादा करती थीं। यह सोच कर कि न जाने अगली बार यह बरकत का महीना मिले या न मिले।

इसलिए बेटे की शादी के बाद बहूँ सानिया को भी यही समझाया था। मेहरुन्निसा के दो बच्चे थे। हाल ही में शौहर की डैथ हुई थी जिसके बाद वह जिन्दगी पर भरोसा करना छोड़ चुकी थीं।

दोनों बच्चे बेटा सारिम और बेटी सबा शादीशुदा थे। उनके शौहर ने अपनी ही ज़िन्दगी में मेहरुन्निसा के साथ मिल कर यह अहम फर्ज अदा कर दिए थे।

इसलिए वह अपने बच्चों की जिम्मेदारी से किसी हद तक आजाद थी। इसलिए अपना ज्यादात्तर वक्‍त इबादत में गुजारती।

सारिम सानिया और दो बच्चों के साथ अच्छी जिन्दगी गुजार रहा था। जबकि सारिम से छोटी सबा भी अपने सुसराल में खुशी खुशी जिन्दगी जी रही थी

दोनों बच्चों की तरफ से इसी इतमीनान व सुकून को उनको अपने रब के शुक्रगुजार बन्दों में शामिल कर दिया था।

अगरचे उनकी गिनती सफेद पोश घराने में होती थी। सारिम किसी कम्पनी में जाब करता था। सानिया एक सुलझी हुईं समझदार और पढ़ी लिखी लड़की थी।

मेहरुन्निसा के शौहर गवर्नमेन्ट सर्वेन्ट थे इसलिए उम्र भर की जमा पून्‍जी से सर छुपाने के लिए सर्विस के दौरान अपना घर बना लिया था।

चूंकि मेहरुन्निसा ने बड़े सलीके से घर का इन्तिजाम संभाला हुआ था इसलिए आज सर पर अपनी छत मौजूद थी।

बहू सानिया भी उन्हीं के नक्शे क़दम पर चलती घर को अच्छी तरह से चला रही थी। लेकिन कभी कभार मेहरुन्निसा शौहर की पेन्शन से मिलने वाले पैसे भी घर के खर्चे में दे

दिया करती थीं क्योंकि सारिम ने खुद ही कहा था कि मेहरून्निसा पेन्शन के पैसे अपने ही पास रखें क्योंकि उस पर हक सिर्फ उन्हीं का है।

इसलिए घरदारी और किचन के इन्तिजाम की जिम्मेदारी मेहरुन्निसा ने खुद ही सानिया की खीर पकाई की रस्म पर ही उसके हवाले कर दी थी ताकि वक्‍त गुजरने के साथ साथ वह धीरे धीरे घरदारी के इन्तिजाम में माहिर हो जाए।

इस तरह से उसे आगे जाकर किसी परीशानी का सामना न करना पड़े। वैसे भी सारिम उनका इकलौता बेटा था इसलिए कल को सानिया ने ही इस घर को संभालना था।

जिसे मेहरुन्निसा ने अपनी मुहब्बत, खुलूस से जन्नत का नमूना बना दिया था। लेकिन खुदा का शुक्र था सानिया गैर खानदान से होने के बावुजूद बहुत अच्छी और बात को मानने वाली बहू साबित हुई थी।

वह मेहरुन्निसा की बहुत इज्जत करती थी। घर से लेकर घरदारी तक हर छोटे बड़े मुआमलात में सास से मशवरा किया करती ताकि वह अपनी जात में हमेशा भरोसेमन्द रहें। 

उनके रिश्ते में सास बहू वाली उठा पटक न थी क्योंकि सानिया सास और शौहर के साथ साथ इकलौती नन्द और उसके शौहर, बच्चों का भी उतना ही ख्याल रखती थी।

किसी को शिकायत का मौका न देती थी। वैसे भी ताली दोनों हाथों से बजती है।तब ही घर की दीवारों और रिश्तों में दराड़ें नहीं पड़ती हैं।

चूंकि सानिया ने छोटी व बडी दोनों ईद के मौके पर बड़ी समझदारी से निभाया था इसलिए इस ईद पर भी सबा को जाने वाली मैके की तरफ से ईदी के हवाले से मेहरून्निसा को कोई परीशानी न थी।

वह जानती थीं कि सानिया उनके बिना कहे ही इकलौती नन्द की सुसराल को जाने वाली ईदी का इन्तिज़ाम खुद ही अच्छी तरह कर देगी जैसा कि बरसों से होता आ रहा है।

मगर इस बार वह बेटी की ईदी और ईद की खुशियों में होने वाले इन्तिजाम को भूल कर बेटे की देखभाल में जी जान से लगी थी।

पिछले हफ्ते सारिम की बाइक का बुरी तरह एक्सीडेन्ट हुआ था उसकी दाएं टांग में फ्रेक्चर आया था। बाजू  पर भी गहरी चोट आई थी।

सो रमजान क़ा पहला हफ्ता हास्पिटल की भागदौड़ में गुजरा था। मेहरून्निसा तो इस अचानक मुसीबत पर बुरी तरह घबरा गई थीं।

सानिया ने भी हौसले और समझदारी से काम लेते हुए सब कुछ संभालते हुए बहादुरी का सुबूत दिया। क्योंकि उसे ही सब कुछ करना था।

उसके मैके में भी एक भाई भावज और मां के सिवा कोई नहीं था जो उस मुश्किल घड़ी में उसका सहारा होता। क्योंकि भाई रोजगार के लिए बाहर मुल्क में रहता था।

जबकि बाप की डैथ हो चुकी थी। लेकिन सबा और उसके शौहर अयाज़ ने भी इस मौके पर रिश्तेदारी का पूरा हक अदा किया था।

वह दोनों रोजाना ही शाम को सारिम को देखने हास्पिटल आ जाया करते थे। फिर जब हफ्ते भर हास्पिस्टल में रहने के बाद वह डिस्चार्ज होकर घर आया तो वह दोनों छुट्टी वाले दिन आने लगे।

यू भी रमजान की वजह से रोजाना आना मुमकिन नहीं था। मगर सबा जब भी मैके आती थी भाई के लिए कुछ न कुछ स्पेशल डिश बना कर लाती थी।

डाक्टर ने सरिमा की टांग पर प्लास्टर चढ़ा कर डेढ़ माह बेड रेस्ट का मशवरा दिया था। यूं सानिया और मेहरून्निसा सारिम की देखभाल में उन दिनों बिजी थीं चूंकि सारिम के 

इलाज पर काफी पैसे खर्च हो गए थे इसलिए अब ईद की तय्यारियों के हवाले मे सानिया कुछ परीशान नजर आ रही थी।

लेकिन उसने सारिम से इस बारे में कुछ न कहा था। यहां तक कि सास पर भी फिक्रमन्दी जाहिर होने न दी। वह दोनों में से किसी को भी परीशान नहीं करना चाहती थी।

मगर जब सारिम ने हद से ज्यादा उसे सुस्त और फिक्रमन्द देखा, चेहरे पर फैली फिक्र की लकीरों को पढ़ लिया तो खुद ही पूछा तब सानिया को उससे बात करनी पड़ी।

हर साल की तरह इस साल भी सबा के सुसराल उसकी ईदी भिजवानी थी जिसका इन्तिजाम इस बार सानिया को मुश्किल नज़र आ रहा था।


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