फूल जैसे रिश्ते – एक कहानी एक सबक

रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते। एहसास और खुलूस से भी बनते हैं। वह रिश्ते जो हम खुद बनाते हैं अक्सर रेत भी साबित होते हैं।

लेकिन अगर नीयतों में खुलूस और मुहब्बत की सच्चाई शामिल हो तो हम अपने बनाए हुए रिश्तों को मजबूत और देर तक़ का बना सकते हैं।

शर्त सिर्फ नीयतों का खुलूस होना है। सास और बहू के रिश्ते अक्सर खून के नहीं होते मगर उन्हें खूब के रिश्तों जैसी मजबूती देने के लिए खुलूस और प्यार की जरूरत होती है।

मगर एहसास और खुलूस न हों तो कोई भी रिश्ता जो हम खुद बनाते हैं वह कभी टिकाऊ नहीं हो सकता। सास और बहू के रिश्ते में जहां सासू मां के दर्जे पर होती है वहीं बहू का मकाम भी बेटी जैसा होता है।

अगर इस रिश्ते को मां और बेटी का रिश्ता समझा जाए तो . ..। मगर ऐसा मुश्किल से ही होता है। सास के लिए एक अनजान लड़की को बहू के रिश्ते के तौर पर कबूल करना और एक बहू के लिए अपने शौहर की मां को अपनी मां मानना बहुत कठिन महसूस होता है।

लेकिन अगर यह दोनों रिश्ते प्यार से आगे बढ़ते रहें तो एक दिन कामयाबी यकीनी ओर टिकाऊ होती है

मेहरुन्निसा और सानिया के रिश्ते को प्यार मुहब्बत की जरूरत थी। रमजान का महीना तो पिछले हफ्ते ही शुरू हो चुका था।

और हर साल की तरह इस साल भी मेहरून्निसा बेगम ने इस मुबारक महीने को खुश आमदीद (Welcome) कहने का भरपूर इन्तिजाम पहले से कर रखा था।

इस महीने उन्होंने इबादत के लिए अपना शेडयूल तय्यार कर लिया था और वह पूरा दिन इबादत करती। फिर सानिया के साथ मिल कर इफ्तारी के लिए बहू की थोड़ी बहुत मदद करतीं। 

वैसे भी उनके यहां इफ्तारी का ज्यादा इन्तिजाम नहीं किया जाता था। सिर्फ खजूरों और फ्रूट चाट के साथ किसी भी फ्रूट मिल्क का शेक तय्यार कर लिया जाता था।

और फिर इफ्तार करके मगरिब की नमाज के बाद सादा खाना खा लिया जाता था। बरसों से मेहरुन्निसा ने अपने घराने की यही रूटीन बना रखी थी।

वह रमजान के महीने में बेहतरीन खाने के बजाए इबादत ज्यादा करती थीं। यह सोच कर कि न जाने अगली बार यह बरकत का महीना मिले या न मिले।

इसलिए बेटे की शादी के बाद बहूँ सानिया को भी यही समझाया था। मेहरुन्निसा के दो बच्चे थे। हाल ही में शौहर की डैथ हुई थी जिसके बाद वह जिन्दगी पर भरोसा करना छोड़ चुकी थीं।

दोनों बच्चे बेटा सारिम और बेटी सबा शादीशुदा थे। उनके शौहर ने अपनी ही ज़िन्दगी में मेहरुन्निसा के साथ मिल कर यह अहम फर्ज अदा कर दिए थे।

इसलिए वह अपने बच्चों की जिम्मेदारी से किसी हद तक आजाद थी। इसलिए अपना ज्यादात्तर वक्‍त इबादत में गुजारती।

सारिम सानिया और दो बच्चों के साथ अच्छी जिन्दगी गुजार रहा था। जबकि सारिम से छोटी सबा भी अपने सुसराल में खुशी खुशी जिन्दगी जी रही थी

दोनों बच्चों की तरफ से इसी इतमीनान व सुकून को उनको अपने रब के शुक्रगुजार बन्दों में शामिल कर दिया था।

अगरचे उनकी गिनती सफेद पोश घराने में होती थी। सारिम किसी कम्पनी में जाब करता था। सानिया एक सुलझी हुईं समझदार और पढ़ी लिखी लड़की थी।

मेहरुन्निसा के शौहर गवर्नमेन्ट सर्वेन्ट थे इसलिए उम्र भर की जमा पून्‍जी से सर छुपाने के लिए सर्विस के दौरान अपना घर बना लिया था।

चूंकि मेहरुन्निसा ने बड़े सलीके से घर का इन्तिजाम संभाला हुआ था इसलिए आज सर पर अपनी छत मौजूद थी।

बहू सानिया भी उन्हीं के नक्शे क़दम पर चलती घर को अच्छी तरह से चला रही थी। लेकिन कभी कभार मेहरुन्निसा शौहर की पेन्शन से मिलने वाले पैसे भी घर के खर्चे में दे

दिया करती थीं क्योंकि सारिम ने खुद ही कहा था कि मेहरून्निसा पेन्शन के पैसे अपने ही पास रखें क्योंकि उस पर हक सिर्फ उन्हीं का है।

इसलिए घरदारी और किचन के इन्तिजाम की जिम्मेदारी मेहरुन्निसा ने खुद ही सानिया की खीर पकाई की रस्म पर ही उसके हवाले कर दी थी ताकि वक्‍त गुजरने के साथ साथ वह धीरे धीरे घरदारी के इन्तिजाम में माहिर हो जाए।

इस तरह से उसे आगे जाकर किसी परीशानी का सामना न करना पड़े। वैसे भी सारिम उनका इकलौता बेटा था इसलिए कल को सानिया ने ही इस घर को संभालना था।

जिसे मेहरुन्निसा ने अपनी मुहब्बत, खुलूस से जन्नत का नमूना बना दिया था। लेकिन खुदा का शुक्र था सानिया गैर खानदान से होने के बावुजूद बहुत अच्छी और बात को मानने वाली बहू साबित हुई थी।

वह मेहरुन्निसा की बहुत इज्जत करती थी। घर से लेकर घरदारी तक हर छोटे बड़े मुआमलात में सास से मशवरा किया करती ताकि वह अपनी जात में हमेशा भरोसेमन्द रहें। 

उनके रिश्ते में सास बहू वाली उठा पटक न थी क्योंकि सानिया सास और शौहर के साथ साथ इकलौती नन्द और उसके शौहर, बच्चों का भी उतना ही ख्याल रखती थी।

किसी को शिकायत का मौका न देती थी। वैसे भी ताली दोनों हाथों से बजती है।तब ही घर की दीवारों और रिश्तों में दराड़ें नहीं पड़ती हैं।

चूंकि सानिया ने छोटी व बडी दोनों ईद के मौके पर बड़ी समझदारी से निभाया था इसलिए इस ईद पर भी सबा को जाने वाली मैके की तरफ से ईदी के हवाले से मेहरून्निसा को कोई परीशानी न थी।

वह जानती थीं कि सानिया उनके बिना कहे ही इकलौती नन्द की सुसराल को जाने वाली ईदी का इन्तिज़ाम खुद ही अच्छी तरह कर देगी जैसा कि बरसों से होता आ रहा है।

मगर इस बार वह बेटी की ईदी और ईद की खुशियों में होने वाले इन्तिजाम को भूल कर बेटे की देखभाल में जी जान से लगी थी।

पिछले हफ्ते सारिम की बाइक का बुरी तरह एक्सीडेन्ट हुआ था उसकी दाएं टांग में फ्रेक्चर आया था। बाजू  पर भी गहरी चोट आई थी।

सो रमजान क़ा पहला हफ्ता हास्पिटल की भागदौड़ में गुजरा था। मेहरून्निसा तो इस अचानक मुसीबत पर बुरी तरह घबरा गई थीं।

सानिया ने भी हौसले और समझदारी से काम लेते हुए सब कुछ संभालते हुए बहादुरी का सुबूत दिया। क्योंकि उसे ही सब कुछ करना था।

उसके मैके में भी एक भाई भावज और मां के सिवा कोई नहीं था जो उस मुश्किल घड़ी में उसका सहारा होता। क्योंकि भाई रोजगार के लिए बाहर मुल्क में रहता था।

जबकि बाप की डैथ हो चुकी थी। लेकिन सबा और उसके शौहर अयाज़ ने भी इस मौके पर रिश्तेदारी का पूरा हक अदा किया था।

वह दोनों रोजाना ही शाम को सारिम को देखने हास्पिटल आ जाया करते थे। फिर जब हफ्ते भर हास्पिस्टल में रहने के बाद वह डिस्चार्ज होकर घर आया तो वह दोनों छुट्टी वाले दिन आने लगे।

यू भी रमजान की वजह से रोजाना आना मुमकिन नहीं था। मगर सबा जब भी मैके आती थी भाई के लिए कुछ न कुछ स्पेशल डिश बना कर लाती थी।

डाक्टर ने सरिमा की टांग पर प्लास्टर चढ़ा कर डेढ़ माह बेड रेस्ट का मशवरा दिया था। यूं सानिया और मेहरून्निसा सारिम की देखभाल में उन दिनों बिजी थीं चूंकि सारिम के 

इलाज पर काफी पैसे खर्च हो गए थे इसलिए अब ईद की तय्यारियों के हवाले मे सानिया कुछ परीशान नजर आ रही थी।

लेकिन उसने सारिम से इस बारे में कुछ न कहा था। यहां तक कि सास पर भी फिक्रमन्दी जाहिर होने न दी। वह दोनों में से किसी को भी परीशान नहीं करना चाहती थी।

मगर जब सारिम ने हद से ज्यादा उसे सुस्त और फिक्रमन्द देखा, चेहरे पर फैली फिक्र की लकीरों को पढ़ लिया तो खुद ही पूछा तब सानिया को उससे बात करनी पड़ी।

हर साल की तरह इस साल भी सबा के सुसराल उसकी ईदी भिजवानी थी जिसका इन्तिजाम इस बार सानिया को मुश्किल नज़र आ रहा था।

“मैं जानता हूं सानिया! पिछले दिनों मेरी बीमारी की वजह से तुम ओर अम्मी बहुत परीशान रहे हो मेरे लिए। और रमजान के आने से तुम्हारे काम भी पहले से बढ़ गए।

लेकिन तुम्हारे चेहरे पर जो परीशानी चमक रही है वह सिर्फ थकन की वजह से नहीं है, कोई और बात है। प्लीज मुझसे कुछ भी छुपाने की कोशिश मत करना।” सारिम ने सामने बेड पर करीब बैठी सानिया के हाथ थामते हुए कहा।

“ऐसी कोई बात नहीं है सारिम बस मेरी नीन्द पूरी नहीं हो रही इसलिए ही थकन महसूस हो रही है। आप परीशान मत हों।” सानिया ने सारिम के पूछने पर बात को टाला था। 

मसअला इतना बड़ा नहीं था कि वह सारिम से शेयर करके उसे परीशान करती। उसने खुद ही इस मसअले का कोई हल निकाल लेना था।

बल्कि उसने किसी हद तक मसअले का हल सोच भी लिया था। मगर सारिम जो सात साल के साथ में सानिया के मिजाज के साथ साथ सानिया के चेहरे के उतार चढ़ाव और

एक्सप्रेशन भी अच्छी तरह समझने लगा था इसलिए सानिया की बात सुन कर उसे तसल्ली नहीं हुई थी। 

“मुझे पता है सानिया! तुम्हारे अन्दर इतना हौसला और सलाहियत है कि तुम हर मसअले का हल किसी को परीशान किए बगैर खुद ही निकाल लेती हो।

लेकिन मैं तुम्हारी जिन्दगी ही नहीं जिन्दगी के सुख दुख का भी साथी हूं। तुम अपनी प्राब्लम्ज मुझसे शेयर नहीं करोगी तो किससे करोगी। और कुछ न सही शेयर करने से कम से कम दिल का बोझ ही हल्का हो जाता है।”

और सारिम क़े इतने नर्म अन्दाज से ढारस देते हुए लहजे ने सानिया को मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया था, सरिम उसे बहुत अच्छी तरह समझने लगा था।

“आप तो वाकई मुझे बहुत अच्छी तरह समझने लगे हैं।” सानिया ने बेसाख्ता मुस्कुराते  हुए कहा।

“हमारा रिश्ता ही ऐसा है सानी! अगर इस रिश्ते में अन्डर स्टेन्डिंग एक दूसरे पर भरोसा न हो तो यह नाजुक रिश्ता कमजोर ही नहीं होता बल्कि जिन्दगी भी मुश्किल हो जाती है।”

सारिम ने गम्भीर लहजे में कहा तो सानिया को लगा कि उसे सारिम को असल बात बता देनी चाहिए- “कोई फिक्र की बात नहीं है सारिम! बस मैं ईद पर सबा के सुसराल भेजी जाने वाली ईदी की तय्यारी के हवाले से सोच रही थी।

मेरी जो भी सेविंग्ज थीं वह तो सब हास्पिटल में खर्च हो चुकी हैं। सोच रही थी कि अब सबा की ईदी और बच्चों के साथ अम्मी के ईद के कपड़ों वगैरह का क्‍या होगा।

बच्चों को तो ईंद पर उनके दो दो सूटों के साथ साथ मैचिंग चीजों की भी फरमाइश होती है। अब इन सब चीजों का इन्तिजाम कहां से होगा।

सबा की ईदी तो जरूरी भेजनी होगी। उसकी सुसराल का मुआमला है।” सानिया की बात सुन कर सारिम के माथे पर भी फिक्र की लकीरें उभर आई थीं।

तो दूसरी तरफ मेहरून्निसा जिन्होंने सारिम के लिए अपने हाथों से गर्म गर्म सूप तय्यार किया था उसके लिए लेकर आ रही थीं तब ही दरवाजे के पार सारिम और सानिया की बातें सुन कर उनके कदम कमरे के बाहर ही रुक गए थे।

क्योंकि बात सबा की ईदी की हो रही थी। हालांकि मेहरून्निसा उन सासों में से नहीं थीं जो छुप कर बेटे बहू की बातें सुना करती हैं।

वह तो बस फितरी सस्पेन्स के हाथों मजबूर होकर वहां ठहर गई थीं। “वाकई परीशानी की बात है तो मुझे अन्दाजा है मेरे इलाज पर काफी पैसे ख़र्च हो गए हैं।

लेकिन तुम फिक्र मत करो। मै अपने किसी दोस्त से उधार ले लूंगा, हर साल की तरह इस साल भी सबा की ईदी मैके से उसी इन्तिजाम से भेजी जाएगी जैसे हर साल भेजी जाती है।

एक ही तो मेरी बहन है और मैं अच्छी तरह जानता हूं बहन बेटियों को अपने मैके में बड़ा अरमान होता है जिस पर सुसराल में उनकी भी कद्र दानी हो।

और अब्बू के बाद अब मेरे दम से ही सबा के मैके का मान है। मैं अपनी बहन का यह मान कभी नहीं तोड़ूंगा।

और सारिम की बातें सुन कर मेहरून्निसा की आंखों में खुशी के आंसू भर आए। उन्हें अपनी तरबियत और औलाद की मुहव्बत पर यूं ही तो मान नहीं था।

सारिम उनसे और सबा से बहुत मुहब्वत करता था। जिसका अन्दाजा उन्हें अब हो रहा था। “वह तो ठीक है सारिम! मगर मेरे पास इस मसअले का एक और भी हल है।

आपको उधार लेने की ज़रूरत नहीं है। मैंने सोचा है इस बार मैं ईद पर अपने मैके से आने वाली ईदी सबा को भेज दूंगी।

इस तरह सबा का मान भी कायम रहेगा और हमारा भरम भी। इस तरह आपको किसी का उधार भी लेना नहीं पड़ेगा। मेरे पास तो अभी पिछली ईदी के जोड़े ही रखे हैं।”

और सानिया की अगली बात ने मेहरून्निसा को सन्‍जीदगी से सोचने पर मजबूर कर दिया था। उसकी सुसराल वालों के लिए मुहब्बत और अपनाइयत की तो मेहरून्निसा पहले ही कायल थीं।

सानिया ने हमेशा उनका भरम रखा था। वह भी कब चाहती थीं उनका बीमार बेटा किसी से उधार ले। सानिया ने भी सोच कर इस मसअले का हल पेश किया था।

वह अपने मैके से अपने लिए आई हुई ईदी को सबा को देने की बात कर रही थी। उसूल के तौर पर तो मेहरून्निसा को इस बात पर गुस्सा आना चाहिए था मगर वह सानिया के

मिजाज ही नहीं उसकी सच्चाई को भी अच्छी तरह समझती थीं इसलिए उस वक्‍त खामोश रहने में ही बेहतरी समझते हुए सूप के प्याले की ट्रे वापस लेकर मुड़ गयी।

वैसे भी उस वक्‍त सूप काफी गर्म था। कुछ देर किचन में रख कर ठन्डा हो जाता तो सानिया खुद आकर सारिम के लिए ले जाती।

क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि वह उस वक्‍त सारिम के कमरे में जाए तो सारिम और सानिया को शक हो जाए कि उन्होंने उन दोनों के बीच होने वाली बातें सुन ली हैं।

इसलिए वह खामोशी से वापस अपने कमरे में आ गयी।

जबकि सारिम को सानिया की यह बात ठीक नहीं लगी। जिसको उसने फौरन ही जाहिर कर दिया- “नहीं सानिया! यह मुनासिब नहीं रहेगा।

अम्मी को सबा का पता चल गया तो उन्हें बुरा लगेगा। वैसे भी अपने घर वालों की तरफ से अपनी ईदी का सामान तुम्हें अम्मी को सबा को भी दिखाना होगा।

इस सूरत में ऐसा करना बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा। और फिर तुम्हारे घर वालों को पता चलेगा तो वह क्या सोचेंगे।”

सारिम की बात सानिया को भी ठीक लगी। सारिम ठीक कह रहा था। मगर परीशानी में सानिया को फिलहाल यही हल इस मसअले का सूझा था।

“तो फिर मैं ऐसा करती हूं कि अपनी शादी की ज्वेलरी में से कोई ज्वेलरी बेच देती हूं जाकर। कम से कम सबा और अम्मी की ईदी की तय्यारी का इन्तिजामं तो हो ही जाएगा।

बच्चे अम्मी की तरफ से आए ईदी के कपड़ों में से कुछ भी पहन लेंगे। मेरे और आपके जोड़े भी अम्मी की तरफ से आ जाएंगे। क्या ख्याल है आपका?”

सारिम के चेहरे पर सानिया की दूसरी बात सुन कर फिक्र की जगह शर्मिन्दगी के एहसास ने ले ली थी। वह जरूरत पड़ने पर सानिया का जेवर बेचने के हक में नहीं था।

लेकिन फिलहाल और कोई रास्ता भी नजर नही आ रहा था। इसलिए उसने जवाब में खामोश रहने में ही अपना भरम रखना चाहा था। 

“ठीक है, मै कल ही बाजार चली जाती हूं। आप बैठें, मै आपके लिए सूप लेकर आती हूं। अम्मी ने कहा था आज वह खुद आपके लिए आपका फेवरेट सूप बनाएंगी।”

वह इफ्तार के बाद फ्री होकर सारिम के पास कुछ देर के लिए आ बैठी थी मगर अब पुर सुकून होकर उठी थी। उसने अपनी परीशानी का हल तलाश कर लिया था।

यह देखे बगैर सारिम उसके फैसले से खुश और मुतमइन नहीं था। और सानिया के कमरे से बाहर जाने के बाद सारिम सोच रहा था शायद उसने जरूर कोई नेकी की होगी जो उसे सानिया जैसीं समझदार मुहब्बत करने वाली बीवी मिली।

वह सही मअनी में सारिम की सुख दुख की साथी थी। दूसरी तरफ मेहरून्निसा अपने रूम में आकर सोच रही थीं कि सारिम और सानिया ने उन्हें कभी भी किसी भी मुआमले में मायूस नहीं किया था।

इसलिए अब इस मुश्किल वक्‍त में वह बेटे बहू पर बोझ नहीं डालना चाहती थीं। बल्कि उन्होंने उनका साथ देने  का फैसला किया था। 

घर के हालात उनके सामने थे। यह तो सारिम की अच्छाई थी कि वह अपने बाप की पेन्शन के पैसे से कोई मतलब नहीं रखता था

मेहरून्निसा हर महीने मिलने वाली पेन्शन के पैसे को अपने पास रखती थीं जो किसी न किसी मुनासिब मौके पर काम आ जाती थी।

और अब उन्होंने सोच लिया था कि वह सारिम को कर्ज का बोझ उठाने हरगिज नहीं देंगी। वैसे भी वह ईद त्योहार पर जरूरत से ज़्यादा खर्च को पसन्द नहीं करती थीं।

सारिम हर साल छोटी बड़ी ईद पर बीवी बच्चों के साथ मेहरून्निसा और सबा के लिए भी ईद के नए कपड़े, जूते, चप्पल खरीदता था।

और मेहरून्निसा के पास अभी पिछली ईद के जोड़े रखे थे क्योंकि सानिया के मैके से उसकी ईदी में मेहरून्निसा का भी ईद का जोड़ा, चप्पल होता था।

इसलिए फिलहाल उन्हें किसी चीज़ की जरूरत नहीं थी।रमजान का मुबारक महीना तो वैसे भी मुसलमानों का नफ्स पर काबू का सबक देता है।

बेवजह खर्च को मना किया गया है। जिन्दगी की तरह जिन्दगी के मुआमले में भी बेलेन्स होना जरूरी है। और सच्ची खुशी तो बस अल्लाह की रजा पाकर ही हासिल होती है।

इसलिए मेहरून्निसा को भी खुशी के किसी भी मौके पर बेवजह का खर्च पसन्द नहीं था। इसलिए उन्होंने फैसला किया था कि हर साल ईद पर जिस तरह सारिम और सबा के साथ

साथ बीवी बच्चे की ईद की तय्यारी करता था इस साल यह तय्यारी वह खुद करेंगी। क्योंकि शौहर की डैथ के बाद मां और बहन के साथ बीवी और बच्चों की जिम्मेदारी सारिम ने अच्छी तरह निभाई थी

वह नहीं चाहती थी कि खर्च की तंगी की वजह से इस बार सारिम को अपना भरम बाकी रखने के लिए उधार लेना पड़े

इसलिए उन्होंने अगले ही दिन सानिया को बगैर बताए बाज़ार जाकर पेन्शन से इक्टठा हुए पैसों से सब बच्चों के लिए ईद की शॉपिंग कर ली

वह सारिम ओर सानिया को सरप्राइज देना चाहती थीं इसलिए शापिंग का सामान किसी को नहीं दिखाया था।

वह सानिया और सारिम के फैसले से बेखबर थीं। इसलिए जब अगले दिन सानिया बाजार जाने के लिए उनसे इजाजत लेने आई तो मेहरून्निसा को उसे रोकना पड़ा।

वह तो सानिया के बाजार जाने का सुन कर परीशान हो गयीं कि जाने उन्होंने पैसों का इन्तिजाम कहां से किया होगा।

उन्हें कब मालूम था कि सानिया अपनी शादी के जेवर में से सलामी में मिलने वाली गोल्ड की रिंग बाजार में बेचने जा रही थी।

ताकि नन्द के सुसराल उसकी ईदी पूरी शान के साथ भेजी जा सके। क्योंकि बच्चे स्कूल की छुट्टियो की वजह से खाना खाकर सो रहे थे।

जबकि सारिम अपने कमरे में आराम कर रहा था। इसलिए सानिया के बाजार जाने के लिए यही मुनासिब वक्‍त था। इस वक्‍त आमतोर पर बाज़ारों में ज्यादा रश भी नहीं होते था

और जब मेहरून्निसा को उसके इरादे का पता चला तो उन्होंने उसे बाजार जाने से बिल्कुल मना कर दिया- “तुम्हें बाजार जाने की कोई जरूरत नहीं है।

सारा दिन रोजे में सारिम की देखभाल के साथ साथ घर के झमेलों में भी थकती रहती हो तुम। जाओ तुम भी जाकर आराम करो वैसे भी शाम की तय्यारी में अभी बहुत वक्‍त पड़ा है।”

मेहरून्निसा ने नर्मी से कहा तो उनके लहजे में अपने लिए मुहब्बत महसूस करके सानिया का दिल बड़ा हो गया। मगर उसे शापिंग के लिए तो जाना था।

उसे मेहरून्निसा के दिली इरादों की कब खबर थी। “लेकिन अम्मी! मैं तो सबा की ईदी भिजवाने के लिए शापिंग करने जा रही हूं।

आपको तो पता है इन दिनों बाजारों में कितना रश होता है। अब तो आधा रमजान भी खत्म हो चुका है। अगले हफ्ते तो सबा  को जरूरी ईदी भिजवानी होगी।

और इस बार मैंने सबके जोड़े रेडीमेड लेने का सोचा है। क्योंकि इस वक्‍त कोई टेलर टाइम पर कपड़े सिलाई करके नहीं देगा।”

सानिया ने नमी से कहा तो मजबूरन मेहरून्निसा को उसे असल बात बतानी पड़ी। उन्होंने बात करने से पहले सजीदगी से सानिया की तरफ देखा- “’मैंने उस रोज तुम्हारी और सारिम की बातें सुन ली थीं

इसलिए सबा को ईदी भिजवाने के लिए तुम लोगों की किसी से उधार लेने की कोई जरूरत नहीं है।”

और मेहरून्निसा की सन्जीदगी से कही बात को सुन कर जहां सानिया के चेहरे का रंग शर्मिन्दगी से पीला पड़ा था वहीं यह भी सोचने लगी कि मेहरून्निसा को जाने कितना बुरा लगा होगा।

“मुझे ग़लत मत समझना बेटा! मैंने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया। सारिम के लिए उस रोज सूप लेकर आ रही थी जब सबा की ईदी के हवाले से तुम लोगों की परीशानी का अन्दाज़ा हुआ कि में तो कोई गैर नहीं थी जो तुम लोगों ने मुझसे इस बात को शेयर नहीं किया।

और मेहरून्निसा की अगली बात सुन कर जहां सानिया के चेहरे पर शर्मिन्दगी का असर खत्म हो चुका था वहीं उनकी गलत फुहमी पर भी रुहांसी हुई थी-

“ऐसी कोई बात नहीं है अम्मी! हम आपको परीशान नहीं करना चाहते थे।”

सानिया ने सफाई पेश करते हुए रुहांसे लहजे में कहा तो बेगम को बेसाख्ता सानिया पर प्यार आ गया- बेटा! तुम्हें भी इस बारे में परीशान होने की जरूरत नहीं है।

मुझे घर के हालात का अच्छी तरह पता है और यह भी कि सारिम के एक्सीडेन्ट के बाद हास्पिटल का खर्चा और दवाओं पर कितने पैसे खर्च हो चुके हैं।

इसलिए इस ईद पर हम कोई फालतू खर्च करने के बजाए सादगी से मनाएंगे। ईद का दिन तो अल्लाह की तरफ से अपने बन्दों के लिए खुशी का इनआम होता है।

और ईद की खुशी सिर्फ नए कपड़े, जूते पहनने से नहीं मिलती बल्कि अल्लाह की रज़ा से हासिल होती है।

मेहरून्निसा की बातें सुन कर सानिया इतमीनान से हुई थी- “वह तो ठीक है अम्मी! लेकिन शादी के बाद लडकियों के लिए मैके का मान बड़ी अहमियत रखता है।

और यह मान हमेशा सलामत रहना चाहिए। मै और सारिम भी सबा के इस मान को हमेशा कायम रखना चाहते हैं।

जो सबा को अपने रिश्तो पर है। उसकी ईदी भिजवाना बहुत जरूरी है।” और सानिया के अपनी नन्द के लिए नेक ख्यालात जान कर मेहरून्निसा को खूब खुशी मिली थी- “तुम ठीक कह रही हो बेटा! अल्लाह मेरे सारिम को सेहत दे

मुझे पता है वह अपनी जिम्मेदारी से कभी पीछे नहीं और मुझे तुम पर भी पूरा भरोसा है। तुम मेरे बाद भी सबा के अपने मैके पर मान और भरम को कभी टूटने नहीं दोगी।

क्योंकि मैं जानती हूं बेटियां मां बाप की इज्जत फख को हमेशा कायम रखती हैं। तुमने अपनी मुहब्बत और कुर्बानी से साबित कर दिया कि तुम मेंरी बहू नहीं बेटी हो।

और मैंने भी तुम्हे अपनी दूसरी बेटी समझा है। वर्ना पता नहीं लोगों ने सास बहू के खूबसूरत रिश्तो को इतना खराब क्‍यों बना दिया है।

आखिर बेटी विदा होकर अपने सुसराल जाती है तो बहू रुख्सत होकर उस बेटी की खाली जगह पुर करने के लिए आती है।

बात सिर्फ एहसास करने की है। अगर सास बहू को बेटी समझ और बहू सास की मां मकाम दे तो सास बहू का झगड़ा पैदा ही नहीं होगा।”

मेहर्नन्निसा के इतने खूबसूरत जुमले पर सानिया को लगा था उसके सात बरसों की मेहनत बेकार नहीं जाएगी। वह सात साल पहले सारिम के साथ ब्याह कर इस घर में आई थी।

उसकी शादी खानदान से बाहर गेरों में हुई थी और उन गैरों से जिन्दगी के सबसे मजबूत रिश्ते में बन्धने के बाद उसने अपनी मुहब्बत से उन गैर खूनी रिश्तो को अपना बनाने की पूरी कोशिश की थी।

आज उसे पता चला था कि वह अपनी कोशिश में कामयाब हुई। “बेटा! सबा की ईदी के साथ साथ मैंने तुम्हारे और सारिम के साथ साथ बच्चों ईद की खरीदारी भी कर ली है।

बस दो दिन में तुम लोगों को बताने वाली थी। सारिम के अब्बू के पेन्शन के पैसें जमा करके रखे थे मैंने। तुम्हारे और सारिम की परीशानी देख कर मुझसे रहा नहीं गया और अगले दिन मुझे उस पैसे को खर्च करने का सही मौका मिल गया।

बस मुझे अपने बच्चों की खुशी चाहिए। मैं इन्हें कभी भी मायूस और उदास नहीं देख सकती।” मेहरून्निसा अपनी मुहब्बत का इजहार कर रही थीं और सानिया की आंखों में शुक्र के आंसू झिलमिला रहे थे।

वह बेइस्तियार सामने खड़ी मेहरून्निसा से लिपट गई जहां उसे मां की मुहब्बत भरी नर्म गर्म गोद में सुकून मिल रहा था। 

वाकई बात सिर्फ एहसास की होती है। अगर उसने सुसराल वालों को अपना समझ कर मुहब्बत जाहिर की थी तो बदले में उसे भी सच्चे रिश्तों का प्यार मिला था।

और अब सास के रूप में सगी मां हमदर्द मां जैसा साथ और प्यार मिल रहा था। वह खुश नसीब थी मुहब्बतों के बदले मुहब्बतों का यह सौदा बुरा नहीं था क्योंकि उसका मानना था कि रिश्ते सिर्फ खून से ही नहीं बनते।

एहसास और खुलूस से भी बनते हैं। वह रिश्ते जो हम खुद बनाते हैं अक्सर टिकाऊ साबित नहीं होते।

लेकिन अगर नीयत खुलूस और मुहब्बत की सच्चाई शामिल हो तो हम अपने बनाए हुए उन रिश्तों की मजबूत और देर तक रख सकते हैं।

शर्त सिर्फ नीयतों के ऊपर है। आपका क्या ख्याल है?

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