आइडियल – एक सबक देती कहानी – सायमा हैदर

“अरे हुमा! अभी तक मैली कचैली घूम रही हो। हम तो समझे थे तुम तैयार बैठी होगी।” “क्यों, क्या बात है आज?” “अरे बडी आपा की भांजी शाहिदा की मंगनी है।”

“वह किसके गले पड गई भई। किससे हुआ उसका रिश्ता? वह तो मुम्बई वाले किसी शहज़ादे का सपना देख रही थी।”

“उसकी मुरादें पूरी हो गयी हुमा! वह जैसा चाहती थी वैसा ही हुआ। उसके लिए मुम्बई से ही एक शहजादा आया। वह बड़ी किस्मत वाली है।”

“बड़ी आपा ने भी तो उसको शहजादियों की तरह रखा है। अभी तक चूल्हे के पास से भी गुजरने नहीं देती। दूसरा काम काज . .. खैर छोड़ो इन बातों को।”

“तुम जल्दी नहा धोकर तैयार हो जाओ। हम यहां तुम्हारा इन्तिजार करते है।” “यार! किस्मत हो तो ऐसी। क्‍यों राबी?”

“बुशरा! मुझे तो जलन हो रही है इस शादू की बच्ची से।” रानो ने दिल पर हाथ रख कर ठन्डी, लम्बी सांस छोडी।

“जाने अल्लाह मियां को कब तरस आएग़ा हम पर। हमने तो न सोना मांगा न हीरे मोती, न मुम्बई वाला, न मद्रासी। बस जल्दी से बना दे हमें भी किसी की घर वाली। क्यों राबी! ऐसे ही निकल जाए यह जवानी। फिर न मिलेगा पूने न दिल्‍ली।”

“रानो की बच्ची! तुम शाइर कबसे बन गयीं? और हां उसका क्‍या बना? यार! वही जिसके साथ तुम फिल्म देखने गई थीं। 

रास्ते में उसके साथ आइसक्रीम खाते हुए इकबाल भाई ने देखा फिर रात तुम्हारी पिटाई हुई थी। उस वक्‍त तो सारी शाइरी भूल गई थीं।

अब भी याद करो अपने रब को। उसी से कोई अच्छा रिश्ता भेजने की दुआ करो। जवानी निकल जाती है तो निकल जाने दो।

“लो भई मैं आ गई। ज्यादा देर तो नहीं लगाई मैंने?” अरे नहीं मेरी जान ऐसे मौकों पर तुम तो फटाफट तैयार हो जाती हो।” कहते रानो ने हुमा का मुंह चूम लिया।

“घंटा, डेट घन्टा भी कोई देर होती है भला। जरा ऊपर वाले को देखो। बीस सालों से बहार को बहारें दिखा रहा है मगर इसकी जिन्दगी में अभी तक कोई बहार नहीं ला रहा।

बहार! मेरी मान, किसी को पकड़ ले वर्ना दुसरो की बहारे देखती रह जाएगी।” “अरे अरे राबी! इस रानो की बच्ची को संभाल। यह तो निकली जा रही है।

रानो! तू तो आपे से बाहर हो रही है। इतनी बेखबरी भी क्या। वक्‍त आने पर सब ठीक हो जाएगा। अगर जवानी संभाली नहीं जाती तो भाग जा अपने वाले के साथ।”

“इकबाल अच्छा लड़का है। फिर तुम्हारी फुष्फो भी तुमको बहुत चाहती है।” “बस शुरू हो गए ताने देने। ताने ही देती रहना।

क्या हुआ यार अगर एक बार बाले के साथ फिल्म देखने गई। उसके साथ भागी तो नहीं?” “तो अब भाग ले। अब भी वक्‍त है।”

“भागें मेरे दुश्मन। तुम जैसी सड़ी सूरत लड़कियां अम्मां का पल्लू थामें  मां बाप के घर गल सड़ रही हैं तो मैं क्यों भागूं।

बस जरा देर इसलिए है कि अल्लाह मियां की समझ में नहीं आ रहा है कि वह मुझ जैसी खूबसूरत को किससे जोड़े।

तुम लोगों को तो पता है रिश्ते ऊपर ही जुड़ते हैं। देखो बहार! तुम्हारी सूरत शक्ल अच्छी नहीं है तो बातें ही अच्छी किया करो।

क्या पता तुम्हारी कोई बात अल्लाह मियां को पसन्द आए और तुम्हारे लिए कोई अन्धा, काना या लंगड़ा ही भेज दे। समझी मेरी प्यारी बहारो!”

“तुम लोग यहाँ पहेलियाँ ही बुजाहते रहोगी या जाओगी भी शाहिदा के पास। बेचारी की मंगनी है। व बेचैनी से दोस्तों इन्तिजार कर रही होगी।”

“सच बताओ भाभी! बहुत बेचेनी हो रही थी ना?” “रानो की बच्ची! कुछ छोटे बड़ों का भी ख्याल किया करो। हर वक़्त मजाक, हर वक्‍त मजाक।”

भाभी ने प्यार से झूटी डांट पिलाई। “हाय मैं मर जावां इस शर्म वाली मुस्कुराहट और मीठी मीठी डांट पर। पर भाभी! एक बात बताओ क्या शादी होने पर लड़की अपनी सहेलियों में बड़ी हो जाती है?”

“मुझे नहीं मालूम। मेरी समझ में नहीं आती तेरी उल्टी सीधी बातें। चल छोड़ मेरा दुपट्टा।” ओर भाभी चली गयीं।

“देखो रानो! तुम्हें यही सब करना है? वहां मसखरा पन बिल्कुल नहीं। अरे सोचो जरा वह मुम्बई वाले पढ़े लिखे लोग हैं। उनके सामने तुम्हारा मसखरा पन अच्छा लगेगा भला।” बहार ने आंखें निकाली।

नूरां ने झट खाली प्लेट उसकी आंखों के सामने कर दी। “यह क्या कर रही हो नूरां?” देखती नहीं बहार ने दीदे कितनी निकाले हैं। नीचे गिरेंगे तो मिट्टी लग जाएगी इसलिए मैंने प्लेट लगा दी है।”

“छोड़ बहार! यह तो नहीं मानेगी। चलो देर हो गई है। शादू भी नाराज होगी और बड़ी आपा भी तुम तो जानती हो उनको। पता नहीं कबसे हमारा इन्तिजार करती होंगी।

कितने काम रखे होंगे हमारे लिए। आखिर मंगनी का घर है। मुम्बई से मेहमान आने वाले हैं। क्‍या क्‍या इन्तिजाम करने हैं। हम ही तो बताएंगे ना बड़ी आपा को।

वह नहीं चाहती कि अपने भाई या उनके साथ आने वाले लोग किसी बद इन्तिजामी का शिकार हों।”

बड़ी आपा के खानदान के कुछ लोग मुम्बई चले गए, कुछ लोग दिल्‍ली ही में आबाद हुए। बड़ी आपा के ससुराल वाले खेती बाड़ी करते थे।

यहां भी उन लोगों ने खेती बाड़ी को अपनाया। उनके शौहर ने होटल का काम शुरू किया। उस वक़्त उनके कोई औलाद नहीं थी।

धीरे धीरे यह लोग जम गए। कारोबार ठीक ठाक। अल्लाह तआला ने उन्हें बच्चे जैसी नेअमत से भी नवाजा था। पहले दो लड़के फिर एक लड़की जिसका नाम बड़ी आपा ने शाहिदा रखा था।

सब प्यार में शादू  कहते थे। एक ही बेटी थी इसलिए आपा को बहुत प्यारी थी। आपा बहुत मुहब्बत करती थीं अपनी बेटी से।

और अब उसकी शादी का वक्‍त  आया। फिर भी उसको चूल्हे हान्डी के करीब जाने नहीं दिया। बिरादरी वालों ने उसका नाम फूला रोनी रखा था।

इस फूहड़ लड़की से बिरादरी में कोई शादी करने को तैयार नहीं था।

शादू बड़ी हंसमुख, हाजिर जवाब लड़की थी। हर छोटे बड़े मसअले का हल वह मिनटों में निकालती थी। बड़ी आपा तो उसकी राय के बगैर कोई काम नहीं करती थीं इसलिए वह कुछ बेअदब हो गई थी।

वह अपने आप को बहुत अक्लमन्द और होशियार समझती थी। हर वक्‍त घूमना फिरना, सैर सपाटे, फिल्म, स्टेज, ड्रामे में मगन रहती।

बिरादरीं की बड़ी बूढ़ियों ने शाहिदा और उसकी मां को समझाया कि अब वह सयानी हो गई है इसको हांडी  चूल्ह में लगा दो।

आज इसकी शादी होगी तो कल शौहर के घर जाना है। मगर उसको फिक्र थी न उसकी मां को। मां बाप को मालूम था कि वह अपने मामू के घर ही तो जाएगी। मामू के दो बेटे, एक बेटी।

दो तीन आदमियों का क्या पकाना खाना। सब इसी तरह हो जाएगा। देखे भाले लोग हैं। कोई दूसरे या गैर होते तो बात थी।

मामू के एक लड़के ने तो लिख पढ़ लिया था। दूसरे ने लिखने पढ़ने से बगावत कर दी। मां ने बहुत चाहा कि वह भी कुछ लिख पढ़ ले मगर किस्मत ने साथ न दिया और वह उसी आरजू में चल बसीं।

मां के मरने के बाद बेटी ने घर संभाला। बाप, भाइयों का ख्याल करती। आने जाने वालों की मेहमान नवाजी, हान्डी चूल्हा, झाड़ू पोंछा बर्तन सब कुछ उसी को करना पड़ता।

फिर आने जाने वाले उल्टा सीधा उसको पढ़ाया करते। यह सब देखते हुए शाहिदा के मामू ने बहन के घर बेटे का रिश्ता पक्का कर दिया।

भाई बहन खुश थे कि आपस में रिश्ता हो गया, मुहब्बतें और बढ़ेंगी। शाहिदा की खुशियों का तो कोई ठिकाना ही नहीं था।

सब कुछ वैसा ही चल रहा था जैसा वह चाहती थी। उसकी सहेलियां तो जलने लगी थीं। शाहिदा अपने रिश्ते के नशे में सरशार थी।

जब उसको मोहल्ले और बिरादरी की बड़ी बूढ़ियों की बातें और नसीहतें याद आती तो वह उनको नफरत से एक झंटके से झटक देती।

आज तो शाहिदा बहुत ही खुश थी। उसके पांव जमीन पर न टिकते थे क्योंकि आज उसकी ससुराल वाले उसकी मंगनी के लिए मुम्बई से आने वाले थे।

उसने तसब्वुर में कई बार फोटो में अपने फूफा, अपने शौहर और नन्द को देखा। उनको गले लगाया, ससुर को गले लगा कर फुप्फो की याद में फूट फूट कर रोई। 

फुप्फो एक ही थीं। वह अपनी भतीजी को दिल व जान से चाहती थीं। टप टप आंसू शाहिदा की आंखों से उसके हाथों पर गिर रहे थे।

वह फोटो में वह सब कुछ देख रही थी जो उसकी फुप्फो चाहत में उसके साथ करती थीं। उसको यकीन था कि फुप्फो के घर जाकर उनके घर को जन्नत बना देगी।

घर के मर्द मेहमानों को लेने स्टेशन गए हुए थे। बिरादरी की औरतें मंगनी की तैयारी में लगी हुई थीं। लड़कियां बालियां ढोल पीट पीट कर, गला फाड़ फाड़ कर मंगनी के गीत गा रही थीं।

हुमा, अनवर और राबी दुल्हन को सजाने संवारने में लगी थीं। शादू का हाथ राबी के घुटनों पर रखा था। राबी उसके हाथ पर मेहन्दी लगा रही थी।

बहार दुल्हन के बालों की सेटिंग में लगी थी। रानो ने दुल्हन के कपड़े पर प्रेस करके अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी थी और अब तक ताक झांक में लगी हुई थी कि कोई मेहमान उसको देख ले।

उसका दिल ऐसा सोच सोच कर जोर जोर से धड़कने लगा। फिर वह शर्माई। “राबी! अभी तक मेहमान नहीं आए? आ जाएंगे, तू क्‍यों मरी जा रही है।”

बहार रानो को देख कर मुस्कुराती हुई बोली- “फिक्र न कर। आसमानों पर तेरा जोड़ा अभी नहीं बना। मगर दर्जी ने जमीन पर तेरा जोडा सी दिया है।”

राबी भी हंस दी। रानो को इस तरह बेचैन देख कर शाहिदा भी चुप न रह सकी- रानो! अगर तू चाहे तो आज मैं मामू से अपने देवर के लिए तेरे बारे में बात करू? कितना अच्छा रहेगा न। 

बहार हंसने लगी “राबी! जरा देख तो इन देवरानी जिठानी को।” “मेहमान आ गए। मेहमान आ गए।” बच्चों ने शोर मचा दिया।

रानो तो ऐसे भागी मेहमानों का इस्तकबाल करने जैसे कोई बच्चा भूत से डर कर भागता है। मेहमानों में मामू, उनकी बेटी और दो बेटों के अलावा कोई नहीं था।

होता भी कैसे। मामू बेचारे मुम्बई में अकेले थे। सारी बिरादरी तो दिल्ली में थी। मेहमानों को देख कर रानो को बहुत मायूसी हुई।

उसके अरमानों पर पानी फिर गया। किसी खास मेहमान की मेहमान नवाजी के क्या क्या तरीके सोच रखे थे उसने। सब के सब धरे रह गए। 

मेहमानों को राबी के घर ठहराया गया जबकि उसूलन रानो के घर ठहरना था। हक़ बात भी यही थी क्योंकि रानो शादू की खाला थी।

पता नहीं अनपढ़, खूसट लोगों के दिमागों में किस किस्म का भूसा भरा हुआ था। रानो ने बुरा सा मुंह बना कर बड़बड़ाया।

शाम तक लोगों का आना जाना रहा। मुबारक खैर मुबारक होती रही। खानों और फूलों से मेहमानों की मेजबानी होती रही।

रानो तो सिद्दीका के आगे बिछी जा रही थी। शायद शादू की देवरानी बनने के ख्वाब देख रही थी। सिद्दीका मामू की इकलोती बेटी थी और दूल्हे मियां की बहन थी।

उसकी अभी शादी नहीं हुई थी। सूरत शक्ल से भी गंवार थी। हाथ पांव की मजबूत मगर नकचढ़ी नहीं थी। उसने भी रानो के इरादों को भांप लिया था।

कोई मौका या बात रानो पर तन्ज़ करने या जुमले बाजी का हाथ से जाने नहीं देती थी। उसकी खुश मिजाजी ओर शोखी ने सबको अपना दीवाना बना लिया था। 

शाम को शाहिदा और उसके होने वाले मियां ने एक दूसरे को अंगूठी पहनाई। खूब ढोल बजे। लड़के लड़कियों ने रूवांग भरे। ख़ूब धूम धड़ाका हुआ।

रात को खाने के बाद लड़कियों को शरारत सूझी। दूल्हा मियां को बन्द कर दिया। उस कमरे में शादू पहले ही मौजूद थी।

फिर तेज आवाज में रिकार्ड बजाने लगे ताकि उन दोनों की चीख पुकार कोई न सुन सके। रानो को यह सब अच्छा नहीं लगा।

वह सोच रही थी- “अगर किसी ने शादू को इस तरह कमरे में बन्द देखा तो कयामत आ जाएगी। हो सकता है मंगनी टूट भी जाए। बेचारी शादू बदनाम हो जाएगी।

फिर उसको कौन अपनाएगा। नहीं नहीं, ऐसा नहीं। यह बहुत गलत है। शादू आखिर मेरी बहन है। परवेज भी मेरा भाई है।

मैं यह सब होने नहीं दूंगी।” रानो बहारो की अम्मी के पास गई और सारा माजरा सुना दिया। बहारो की अम्मी दौडी दौड़ी बहारो और राबी को कान से पकड़ कर लायीं और कमरा खुलवा कर दोनों को बाहर निकाला।

शादू को गले लगा कर ख़ूब प्यार किया परवेज की बलाएं लेती रहीं। उसको जबान बन्द रखने की हिदायतें करती रहीं। रिश्तों का वास्ता देती रहीं-

“यह भी तुम्हारी बहनें ही हैं। इनका ख्याल करो। चुप ही रहो। वैसे यह बात इतनी बुरी भी नहीं। ऐसे मौकों पर शरारतें होती रहती हैं।

मगर आज बहुत से मेहमान हैं। दस अच्छे दस बुरे। कौन जाने दोस्त कौन है और कौन दुश्मन। बेटा! हम किसी के दिल का क्या जाने मैं हाथ जोड़ती हूं अपने बाप और बहन से कुछ न बताना”

दूसरे दिन रात को सब बड़े बूढ़े शादी की तारीख फिक्स करने बैठे। औरतों और मर्दों की राय सें सात अक्तूबर फिक्स की गई। यानी छह माह बाद शादी तय पाई।

मुम्बई आकर सिद्दीका, उसके अब्बू और भाई शादी की तैयारियों में लग गए। जहां कोई बात आती मोहल्ले वालों से मशवरा कर लेते।

कपड़ा, जेवर दुल्हन के और उसके घर वालों के बड़ों का सामान खरीदा गया। दुपट्टों पर बेल, गोटा, जरी का काम अच्छी से अच्छी जगह करवाया गया।

कुछ जोड़े मुम्बई के फैशन के हिंसाब से, कुछ जोड़े दिल्‍ली के फैशन के हिसाब से तैयार करवाए गए। 

आज दिल्ली में फिर मुम्बई के मेहमानों का इन्तिज़ार था क्योंकि आज चार अक्तूबर थी और सात तारीख को शाहिदा की शादी थी।

मेहमानों को एक ही बार रानो के घर ठहराया गया रानो खुशी से फूली जा रही थी। उसके पांव जमीन पर न टिकते थे।

कभी यह उठा कभी वह उठा। मेहमानों से भरे घर में कभी चीज़ें एक जगह नहीं रहतीं। रानो चीजें उठाती, समेटती इधर उधर घूम रही थी कि उसके कानों में एक मसहूर कुन आवाज पड़ी।

बड़ी आपा रानो की अम्मा से कह रही थीं “लो भई फातिमा! बहुत फिक्र थी तुम्हें रानो का  जोड़ा भी आ गया बाहर से।”

यह सुन कर रानो शर्मा कर कमरे में भाग गई। खालू, भाभी, फुप्फो ने आवाजें दीं मगर रानो कमरे से बाहर न आई।

“बहार! जा ज़रा रानो को ले आ। उसको दिखाना है।” रानो और सिमट कर एक कोने में दुबक गई। बहारो और राबी ने खींच कर निकाला।

“देखो भई रानो! नाशुक्रापन न करो। अल्लाह मियां ने मुम्बई से भेजा है तुम्हारा जोड़ा। कहां तूने अल्लाह मियां को परीशान कर रखा था जोड़े के लिए दुआएं कर करके। और अब जब अल्लाह मियां ने सुन ली है तो नंखरे हो रहे हैं।”

“जा राबी! अम्मां से कहना रानो तो नहीं आ रही है। शायद उसको पसन्द नहीं। मुझे दिखा दें। मैं पसन्द कर लूंगी। चाहे केसा भी हो।”

रानो एकदम उछल पडी- “दिखा राबी! बहारो को। यह हमेशा मेरी काट में लगी रहती है। “अच्छा अच्छा तू अब चल छोड़ बहारो को।

यह तेरा क्या कभी किसी का भला देख नहीं सकती। बहारो! तुम रूठ न जाना। तू मेरी सबसे अच्छी सहेली है। बता अब में क्या करूं? घूंघट करू कि ऐसे ही चलूं?”

“चल हट, सब बेशर्म कहेंगे बगैर घून्घट के। लड़की की हया तो घून्घट ही है। क्‍यों बहारो!” बहारो ने रानो का दुपट्टा सर से उसके चेहरे पर डाला राबी और बहारो दोनों बाजुओं से पकड़ कर बड़े अदब से धीरे धीरे चलाते हुए सब औरतों के सामने ले आयी।

हंसी की आवाजों से पूरा हाल गून्ज उठा जो रुकने का नाम न ले रहा था। रानो घबरा गई। घून्घट उठा कर देखा तो सब औरतें उसका मजाक उड़ा रही थीं।

बस फिर क्‍या था उसने चप्पल हाथ में ली और बहारो पर लपकी। बहारो जैसी लड़की उसकी पहुंच में कहां आने वाली थी। यह जा वह जा।

 

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“अरी रानो! जाने दे। थूक दे गुस्सा। देख साली का जोड़ा तेरे लिए आया है। उन दोनों की तो आदत है मजाक की। फिर तू क्यों हलकान हो रही है। ले यह जोड़ा पकड़। सबको सलाम कर और मेरे पास बैठ।”

बाहर शामियाने में मर्द बैठे काजी साहब का इन्तिज़ार कर रहे थे। बच्चे शोर मचा रहे थे। अन्दर लड़कियां शादी के गीत गाने और ढोल बजाने में लगी थीं।

बहारो और राबी नाच रही थीं। रानो ने सिद्दीका का हाथ पकड़ कर खींचा- तू है दूल्हे की बहन। जरा नच कर दिखा।

सिद्दीका को नाच वगैरह का कोई पता नहीं था। बच्चों का शोर मचा- “काजी साहब आ गए। काजी साहब आ गए।”

सब लड़कियां शामियाने में पर्दे के पीछे खड़ी निकाह होते देख रही थीं। काजी साहब ने शादू के वकील और गवाहों की गवाही  के बाद निकाह पढ़ा। छुहारे बांटे गए।

मुबारक मुबारक के शोर में दुल्हन को संवारा गया। शादी के जोड़े में शादू कुछ और ही लग रही थी। उसके हुसन में चार चान्द लग गए थे।

दूल्हा मियां को जनान खाने में भेजा गया। और जब दूल्हा मियां सास सालियों से मिलने के बाद वापस आए तो खाना शुरू हुआ।

सब खाने में लगे हुए थे। बुशरा और उसकी बहन ने सिद्दीका को एक तरफ ले  जाकर खूब कान भरे। जितनी बुराइयां कर सकती थीं कर दीं।

क्योंकि परवेज उनका भी आइडियल था। यह दोनों बहनें उस पर मरती थीं। अब उन्हें यकीन था शादू और सिद्दीका में बहुत जल्द मन मुटाव, लड़ाई झगड़ा शुरू होगा-और शादू अपने मां बाप के पास वापस आ जाएगी।

इसके बाद परवेज को उनसे कोई नहीं छीन सकता। सिद्दीका पर तो उन्होंने पहले ही जाद कर दिया था। वह अपने बाप और भाइयों की बहुत लाडली थी। उसकी बात को पत्थर की लकीर समझते थे।

बुशस और रज़िया सिद्दीक़ी के मामू की बेटी थीं। अच्छे खाते पीते लोग थे। दोनों बहनों को कुछ लिखाया पढ़ा भी था।

उन्हें घमन्ड था कि वह बिरादरी में पढ़ी लिखी लड़कियां हैं। उन्हें जिद भी थी कि वह अपने आइडियल से ही शादी करेंगी।

इसी जिद में कई अच्छे रिश्ते छोड़ दिए। मां बाप के घर बैठे बैठे उनकी उम्र भी ज्यादा हो गई थी। अब उनके रिश्ते आना भी बन्द हो गए थे और दोनों बहनें साजिशों और जोड़ तोड़ में लगी रहती थीं।

शादू मामू के घर बहू, बीवी और भाभी बन कर आ गई। चार छह महीने शादी की दावतों और मेहमानों के आने जानें में गुंज़र गए।

शादू अभी दुल्हन थी और उसको कोई काम काज नहीं करना पड़ता था, वह किसी के घर मेहमान रहती या अपने कमरे में सोती रहती।

उसको परवा नहीं थी कि कौन आया और कौन गया। सारा काम बेचारी सिद्दीका पर पड़ा था। और यह बात सिद्दीका के बाप और भाइयों को ख़टकने लगी।

एक दिन शाम के खाने के बाद सिद्दीका के बाप ने बहू को बड़े प्यार से समझाया- “देखो शादू! शादी को छह महीने हो गए।

अब सुबह से हान्डी चूल्हा संभाल लो। वैसे भी तुम इस घर की बड़ी हो और सारी जिम्मेदारी भी तुम ही को संभालना है।”

“मामू! मैं खुद भी खाने और सोने से बेजार हूं। चाहती हूं कुछ काम में सिद्दीक़ी बाजी का हाथ बटाऊं। मगर बाजी कुछ करने ही नहीं देती कहती हैं, भाभी! आप अभी दुल्हन हैं। कर लेना काम भी।

सारी उम्र ही तो करना है। आप सिद्दीका बाजी को समझाइए वह मुझे भी अपने साथ लगा लें। तो सिद्दीका बाजी! यह तय हुआ कि सुबह से मैं काम करूंगी तुम्हारे साथ और तुम मुझे नहीं रोकोगी।” 

सुबह नाश्ता शादू ने बनाया। जले हुए पराठे और उबले हुए अन्डे चाय के साथ रख दिए सबके सामने। परवेज ने जले हुए पराठे के साथ उबले हुए अन्डे नाएते में कभी नहीं खाए थे।

वह दिल ही दिल में कुढ़ता रहा। मगर उसके भाई अहमद ने अपनी भाभी से शोख अन्दाज में पूछा- “भाभी! पराठा जले हुए भी हैं और सख्त भी।”

“वह अहमद! दरअसल बात यह है कि यहां गैस बहुत कम हो ग़ई थी इसलिए आमलेट भी नहीं बना। क्या आप लोग नाश्ते में आमलेट लेते हैं? मुझे मालूम नहीं था।

सिद्दीका ने बताया नहीं और मैंने उसे नीन्द से जगाना ठीक नहीं समझा। “कोई  बात नहीं। धीरे धीरे सब मालूम हो जाएगा”

शादू को मामू की सपोर्ट मिल गई। शाम का खाना सिद्दीका ने तैयार किया। दूसरे दिन डबल रोटी और चाय नाश्ते में देखकर परवेज ने आवाज लगाई-

“अरे भाई अन्डे खत्म हो गए हैं क्या?” “नहीं परवेज! जरा मेरी तबीअत खराब है इसलिए मैंने चाय डबलरोटी रख दी।”

“शाहिदा बेटी! तुमने बताया नहीं तुम्हारी तबीअत खराब है?” “मामू! आप परीशान न हों। थोड़ा सर में दर्द और हल्का बुखार था।

“अब तो ठीक है ना बेटा? सेहत की तरफ से लापरवाई बिल्कुल नहीं। समझी ना?

“ऐसा वह कब तक बहाने बनाती। आज नहीं तो कल पोल खुल ही जाएगी। इसलिए उसने परवेज को बता दिया- “मैं खाना पकाना नहीं जानती।

अम्मां ने मुझे कुछ सिखाया ही नहीं। सारा काम वह खुद ही करती थीं या फिर अब्बा के होटल से खाना आ जाता। अब बताओ परवेज! मैं क्या करूं?”

“ऐसा करों कि एक दो महीनों के लिए दिल्ली चली जाओ। सारा खाना पकाना, घर का काम काज सीख कर आ जाना।”

“हां परवेज! मैं भी यही सोच रही थी या फिर हम इन लोगों से अलग हो जाएं।”

“क्या… क्या कहा तुमने? दोबारा कभी मैं ऐसी बात न सुनूं, समझी।”

“तो इतना गुस्सा होने की क्या बात है” “हम तुमको घर में सजाने के लिए नहीं लाए हैं। घर को संभालने, घर बसाने लाए हैं।”

“तो में कौन सा उजाड़ रही हूं।” “बस ज्यादा बकवास नहीं। यह अपने मामू को सुनाना सारे दुखड़े। मुझे तो बीवी चाहिए जो घर संभाले।” 

अब परवेज़ देर से घर आने लगा। रात गए आता, खाना खाता और अपने बाप, भाई के साथ सो जाता। आज इतवार का दिन था। छुट्टी थी।

सब ही देर से जागते थे। शाहिदा नाश्ते पर नहीं आई तो मामू को तशवीश हुई। “शादू … शादू बेटा!” “वह नहीं आएगी अब्बा! आप नाश्ता करें।” 

“यह क्या हो रहा है परवेज! में तीन चार दिनों से देख रहा हूं।” “अब्बू! बकवास बहुत करने लगी है। मुझे डांट भी रही है। कहती है आप लोगों से अलग रहेंगे।”

“मगर ऐसा क्यों?” “यह तो आप पूछिए अपनी लाडली से। बडा शौक था बहन की बेटी लाने का। जबकि हम सब लोगों ने मना किया था मगर आप किसी की सुनें तब ना”

“क्या बात है शादू! क्या तकलीफ है यहां? तुमसे किसी ने कुछ कहा है क्या?” “बस मामू! मुझे गाड़ी में बिठा दें।

नहीं रहूंगी यहां। बहुत शौक था मेरे मां बाप को इस जहन्नम में डालने का।” “कैसी बातें करती हो शाहिदा! इस जहन्नम में तो तुम आना चाहती थीं।”

“बस गलती हो गई, मुआफ कर दें। मुझे गाड़ी में बिठा दो वर्ना मैं ख़ुद चली जाऊंगी।”

“शाहिदा! इस वक्‍त तुम गुस्से में हो। गुस्सा ठन्डा हो जाए तो अच्छी तरह सोच लेना। मियां बीवी में ऐसा होता ही रहता है।

छोटी छोटी बातों पर ऐसा नहीं होना चाहिए। आप दोनों में कुछ भी हुआ हो हम में से तो किसी ने कुछ नहीं किया।अभी अभी शादी हुई और यह तमाशा।

लोग क्या कहेंगे। हमारी इज्जत का नहीं तो अपने मां बाप की इज्जत का ही ख्याल करो।

“नहीं सिद्दीका! मै यहां नहीं रहूंगी। तुम लोग मुझे गाड़ी में सवार करा दो। नहीं तो मैं खुद भी जा सकती हूं।”

दो तीन महीनों बाद शाहिदा के मां बांप मुम्बई अपनी बेटी के ससुराल वालों सें बात करने आए-” हमने कितने अरमानों से रिश्ता किया था।

फिर ऐसी क्या बात हुई कि आप लोगों ने अपनी इज्जत को घर से निकाल दिया। कोई इस तरह घर से निकालता है भला।” 

“नहीं बहन! ऐसा न कहो। हमने नहीं निकाला शाहिदा को। वह खुद ही यहां रहना नहीं चाहती। किस घर में मियां बीवी में नाराजगी नहीं होती।

हमें तो न शाहिदा ने कुछ बताया न तुम्हारे दामाद ने। हमारे घर में वह भूकी प्यासी रहे यह हमसे देखा न गया इसलिए हमने उसकी जिद पूरी कर दी।”

“अब आप लोगों के क्या इरादे हैं? तीन महीनों में आप लोगों ने एक फोन कर खैरियत भी मालूम नहीं की। सारी बिरादरी हम पर थूक रही है। हम क्या जवाब दें?”

“देखो बहन! इसमें हमारी कोई गलती नहीं। वह न रहना चाहे तो हम क्या कर सकते हैँ।”

“उसको तो बड़ा चाव था। वह परवेज को बहुत चाहती है। फिर वह ऐसा क्‍यों करेगी!

“देखो बहन! बात को जितनी लम्बी करोगी लम्बी ही होती जाएगी। अगर शादू यहां रहना चाहती है तो रहे। यह उसका घर है।

इसको बनाए, बसाए यह हमारी खुशी और ख्वाहिश है। बाकी उसकी मर्ज़ी”

“नहीं भाई! ऐसे नहीं। उसको लेने आप लोगों को दिल्‍ली आना होगा। बिरादरी के आगे मुआफी मांगनी होगी।”

“मुआफी किस बात की बहन! यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटने वाली बात है।”

“फिर तो ठीक है। वह भी गिरी पड़ी, लावारिस नहीं है। हम तो चाहते थे घर की बात घर में रहे। कोर्ट कचहरी न हो तो अच्छा है।” 

“जो तुम लोगों की मज़ी में आए करो। हमें तो खुशी होगी कि हमारी बहू हमारे घर आ जाए। जैसे खुद गई है वैसे खुद आ जाए।

तुम लोग कचहरी का शौक भी पूरा कर लो” दो सालों तक कोर्ट के चक्कर काटने के बाद शाहिदा ने तलाक मांगी। परवेज ने तलाक दे दी।

साथ ही मेहर की रकम और तीन साल का गुजारा भी अदा कर दिया। “तूने यह क्या किया शादू! अच्छा खासा घर छोड़ कर दुनिया वालों के ताने सुन रही है। परवेज तो तेरा आइडियल था।

“मुआफ करो बहारो! मुझे मुआफ करो। मेरा आइडियल गया। मैंने अपनी फुप्फो का नहीं अपना भी घर उजाड़ा है। जिसकी सजा भुगत रही हूं।

ऐ मेरे अल्लाह! मुआफ कर दे मुझे। उन लड़कियों को भी मुआफी कर दे जो मेरी तरह आइडियल के चक्कर में हैं।

साथ मेरी मां जैसी औरतों को भी अक्लदे कि वह अपनी बेटियों को कलेजे से लगा कर ही न बिठाएं।

उन्हें काम धन्धा भी सिखाएं ताकि फिर कोई शादू अपनी मां के कन्धे पर सर रख कर न रोती रहे।

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This Post Has 3 Comments

  1. Pappu khan

    Ideal page 6 why not open

    1. Admin

      Pappu Bhai, ये पेज Lock है आप दो ऑप्शन में से कोई भी एक option सेलेक्ट करके इसे unlock कर सकते है, या तो आप इसे Twitter पे share कर सकतें है या हमारा Facebook page like कर सकते है

  2. Pappu khan

    Replay replay k liye thanks ho sake to thodi jayada story post kare

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