इज़्ज़त – असरदार अफसाना – फ़ोजिया एहसान

इज़्ज़त – असरदार अफसाना (Izzat – Mahakta Anchal Story)

“तुम अरसलान के पास क्‍यों खड़ी थीं।” वह कड़े तेवरों से आंखें सुकेड़ कर पूछ रहा था । “कब?” मायरा ने उल्टा उसी से पूछ डाला।

“कैमेस्ट्री के पीर्यड के बाद वह अब तक गुस्से में था, उसके अन्दाज ही में सख्ती नहीं थी, बल्कि उसका चेहरा भी गुस्से से दहक रहा था । मायरा सोच भरे अन्दाज में माथे पर अपनी उंगली रखकर सोच में गुम हो गई।

“ओह हां याद आया, बस हाल चाल पूछ रहा था और स्टडी कैसी जा रही है यह बस।” “वह कौन होता है तुम्हारी खैर खबर पूछने वाला?” वह पूरी ताकत से दहाड़ा, गुस्से से उसकी मुट्ठियां भिंच गईं।

बेचैनी की हालत में वह सांस अन्दर बाहर करने लगा। “अज़लान क्या हो जाता है तुम्हें, क्लास फैलो है हमारा अरसलान और हाल चाल पूछ लेने से क्या हो जाता है, इतना गुस्सा क्यों करते हो।” मायरा ने सहम कर अपने चारों तरफ देखा, वैसे सब स्टूडेन्टस जा रहे थे ।

छुट्टी का वक्त था सब खुश गप्पियों में मगन गेट की तरफ बढ़ रहे थे । कोई भी उनकी तरफ देख नहीं रहा था, मगर मायरा डर रही थी अगर कोई भी अज़लान की गुस्से से भरी दहाड़ सुन लेता तो फालतू में तमाशा बन जाता ।

बीसियों सवाल उठ खडे होते और मायरा ऐसा नहीं चाहती थी, जबकि अज़लान? “ठीक है आज के बाद तुम मुझ से बात नहीं करना, सिर्फ अरसलान से बात करना ।” उस वक्‍त वह दोनों कालिज कोरीडोर से गुज़र रहे थे ।

जब अज़लान ने दो टूक कह दिया और तेज कदमों से मायरा को वहीं छोड़कर आगे बढ़ गया । “अज़लान रुको प्लीज!” वह भी कुछ लम्हे के बाद उसके पीछे भाग उठी और उसका बाजू पकड़ लिया ।

“छोड़ो मेरा हाथ, मुझे कोई बात नहीं करनी ।” अज़लान ने बेरहमी से मायरा का हाथ झटक कर अपना बाजू छुड़ाया। “क्या हो गया है आखिर! इतनी मामूली सी बात पर झगड़ा कर रहे हो तुम मुझ से । ऐसी कौन सी कयामत टूट पड़ी है ।”

मायरा रो देने वाली हो रही थी अज़लान का रवय्या और उसकी बेपरवाई मायरा बरदाश्त कर ही नहीं सकती थी।

अब तो वह बहुत ही पत्थर दिली का मुजाहिरा (प्रदर्शन ) कर रहा था। “यह मामूली बात है तुम्हारी नजर में, बताओ मुझे। सामने खड़ा हो गया गुस्से से भरी नजरें, खूंखार लबो लहजा, मायरा बस चुप हो गई।

इस वक्‍त उसे खामोश रहना ही मुनासिब लगा था अज़लान गुस्से में था और अगर वह भी हर बात का जवाब देती तो झगड़ा तूल पकड जाता ।

“अच्छा रिलेक्स हो जाओ आइन्दा ख्याल रखूंगी अरसलान के सलाम का जवाब भी नहीं दूगी बस अपना मूड ठीक करो प्लीज।” मायरा गुजारिश के लहजे में बोली।

मायरा ने देखा कि अज़लान के तने हुए तेवर ढीले पड गए, दोनों साथ चलते कालिज गेट तक आए, अज़लान अपनी गाडी का फ्रन्ट डोर खोलने लगा ।

अज़लान रोज मायरा को उसके घर ड्राप करता था। “बात करो ना, कहा ना आइन्दा ख्याल रखूगी, एहतियात बरतूंगी।” मायरा ने यकीन दिलाया । “यह मत भूला करो कि तुम सय्यद अज़लान शाह की मुहब्बत हो ।” अज़लान के लहजे में गुरूर सा भरा था, वह हमेशा अपना नाम जमा जमा कर अदा किया करता था।

उसे शाहों का बेटा होने पर घमन्ड था वह जब भी अपना नाम आप लेता तो एक घमंड का एहसास उसके बदन में सरिये फिट कर देता, यह घमन्ड की हद थी।

“मुझे नहीं पसन्द कि तुम्हें कभी हवा भी छुए, या कोई मर्द तुम से बात करे तुम्हें नज़र भरकर देखे खून खौलता है मेरा, तुम सिर्फ मेरी हो, मेरे लिए हो ध्यान में रखा करो या बात ।” मायरा बहुत कुछ कहना चाहती थी मगर खामोश रही ।

मायरा मुंह में जबान रखती थी और जरूरत के वक्‍त अपनी जबान का इस्तेमाल करना भी जानती थी ।

मगर यह भी सच था कि वह सय्यद अज़लान शाह से मुहब्बत भी बहुत करती थी, इस लिए अज़लान की कड़वी कसीली और नागवार बातें भी हंस कर सह जाती थी।

मायरा का घर आ गया था अज़लान ने गाडी रोकी ।

“आ जाओ खाना खा के चले जाना ।” मायरा ने कहा तो अज़लान हंस पड़ा, वह ऐसा ही था पल में तोला पल में माशा अपनी मनवाने वाला, अपनी चलाने वाला, अब उसका गुस्सा उतर चुका था, इस लिए मूड भी ठीक हो गया था।

“सच में आ जाऊं।” अज़लान ने मुस्कुराती हुई मायरा को नजरों के घेरे में लेकर पूछा मायरा फ्रन्ट डोर खोल कर उतरी और अध खुले पट पर हाथ रख कर अज़लान को देखने लगी देखती रही।

“अभी नहीं, पहले मैं मुनासिब वक्‍त देखकर अपनी अम्मी से तुम्हारा जिक्र करूंगी और फिर तुम्हें अपनी अम्मी से मिलावऊंगी अब जाओ । दोनों एक साथ हंसे।

“बाय।” अज़लान ने गाड़ी दोबारा स्टार्ट की। “बाय।” मायरा ने जवाबी ज़रा सा हाथ बलन्द करके कहा और घर के अन्दर चली गई।

सय्यद अरमुग़ान शाह का अज़लान शाह इकलौता बेटा था। तीन बेटियां थीं । उनके यहां लड़कियों को ज्यादा पढ़ने की इजाजत नहीं थी।

खानदान की कुछ एक लड़कियां ही ऐसी थीं जो कालिज तक पहुंची थीं, वर्ना तो मैट्रिक या उससे भी कम तालीम दिलवाने के बाद लड़कियों को घरों में कैद कर लिया जाता ।

हां! उनके खानदान के लड़के ज़रूर कालिज, यूनीवर्सिटीज में पढ़ रहे थे । जमीनदार लोग थे । खुशहाली नस्ल दर नस्ल आगे बढ़ रही थी।

हर लड़के को एक शादी तो लाजमी (जरूरी) खानदान में करना होती थी, क्योंकि इतनी लम्बी चौड़ी जमीनें खानदान से बाहर जाने का खतरा मोल लेना पड़ता अगर खानदान की लड़कियां बाहर बियाही जातीं तो ।

जो कि शाह खानदान को गवारा नहीं था कि बेटियां बाहर बियाहने की सूरत में गैर लोग उनके सामने सर उठाएं और जाइदाद में से अपने हिस्सों की डिमांड करें ।

जमीनों का बटवारा हो। औरतों को घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी अगर किसी मजबूरी की वजह से औरतों को घर से बाहर जाना भी पड़ता तो टोपी वाले पुरानी तर्ज के बुर्के ओढ़ कर घरों से निकलती थीं ।

बुर्को में औरतों की उम्र वगैरह का अन्दाजा लगाना बहुत मुश्किल होता, क्योंकि वह सर से पांव तक ढ़की छुपी होती। यहां तक की उनके हाथ भी दस्तानों में छुपे हुए होते।

सय्यद अज़लान शाह और मायरा निसार एक साथ कालिज में बी.एस.सी. कर रहे थे । मायरा के वालिद निसार अहमद दुबई में थे । मायरा का एक भाई शहर का जाना माना वकील था, जबकि दूसरा भाई डी.एस.पी. था।

मायरा का घराना खुशहाल भी था और रौशन ख्याल भी । मायरा और अज़लान शाह की दोस्ती कालिज में ही हुई थी और फिर दोस्ती धीरे धीरे मुहब्बत में बदल गई और अज़लान शाह वैसे तो खूबसूरत लड़का था और ज़हीन भी बहुत ज्यादा था ।

मगर उसकी जात की कमजोरी यह थी कि वह अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं था । हद से ज्यादा जिद्दी और घमन्ड…..जबकि मायरा बहुत सुलझी हुई तबीअत की मालिक लड़की थी।

जहानत, रख रखाव भी अच्छे थे और नर्म मिजाज की भी थी । इस लिए उसकी बहुत सारे मुआमलात में अज़लान शाह से नहीं बनती थी। ऐसी जगहों पर वही कम्प्रोमाइज कर लेती थी, बिला वजह भी झुक जाया करती थी।

कई बार उसे बहुत से एहसास होता कि वह ऐसी मुजरिम है जो बगैर जुर्म किए कटहरे में खड़ी है ।

अज़लान गुस्से की हालते में मायरा पर यूं बरस रहा होता कि मायरा को कभी कभी लगता बहुत हो गया अब और नहीं । उसे अपनी इज्जत दो कौड़ी की लगने लगती।

“सय्यद अज़लान शाह की तुम मुहब्बत ही नहीं इज्जत भी हो, किसी तौर मुझे गवार नहीं कि कोई तुम्हें देखे बात करें, जान निकल जाती है। तन बदन में आग लग जाती हैं जो मेरा रोम रोम झुलसा देती है।”

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