इज़्ज़त – असरदार अफसाना – फ़ोजिया एहसान

“तुम अरसलान के पास क्‍यों खड़ी थीं।” वह कड़े तेवरों से आंखें सुकेड़ कर पूछ रहा था । “कब?” मायरा ने उल्टा उसी से पूछ डाला।

“कैमेस्ट्री के पीर्यड के बाद वह अब तक गुस्से में था, उसके अन्दाज ही में सख्ती नहीं थी, बल्कि उसका चेहरा भी गुस्से से दहक रहा था । मायरा सोच भरे अन्दाज में माथे पर अपनी उंगली रखकर सोच में गुम हो गई।

“ओह हां याद आया, बस हाल चाल पूछ रहा था और स्टडी कैसी जा रही है यह बस।” “वह कौन होता है तुम्हारी खैर खबर पूछने वाला?” वह पूरी ताकत से दहाड़ा, गुस्से से उसकी मुट्ठियां भिंच गईं।

बेचैनी की हालत में वह सांस अन्दर बाहर करने लगा। “अज़लान क्या हो जाता है तुम्हें, क्लास फैलो है हमारा अरसलान और हाल चाल पूछ लेने से क्या हो जाता है, इतना गुस्सा क्यों करते हो।” मायरा ने सहम कर अपने चारों तरफ देखा, वैसे सब स्टूडेन्टस जा रहे थे ।

छुट्टी का वक्त था सब खुश गप्पियों में मगन गेट की तरफ बढ़ रहे थे । कोई भी उनकी तरफ देख नहीं रहा था, मगर मायरा डर रही थी अगर कोई भी अज़लान की गुस्से से भरी दहाड़ सुन लेता तो फालतू में तमाशा बन जाता ।

बीसियों सवाल उठ खडे होते और मायरा ऐसा नहीं चाहती थी, जबकि अज़लान? “ठीक है आज के बाद तुम मुझ से बात नहीं करना, सिर्फ अरसलान से बात करना ।” उस वक्‍त वह दोनों कालिज कोरीडोर से गुज़र रहे थे ।

जब अज़लान ने दो टूक कह दिया और तेज कदमों से मायरा को वहीं छोड़कर आगे बढ़ गया । “अज़लान रुको प्लीज!” वह भी कुछ लम्हे के बाद उसके पीछे भाग उठी और उसका बाजू पकड़ लिया ।

“छोड़ो मेरा हाथ, मुझे कोई बात नहीं करनी ।” अज़लान ने बेरहमी से मायरा का हाथ झटक कर अपना बाजू छुड़ाया। “क्या हो गया है आखिर! इतनी मामूली सी बात पर झगड़ा कर रहे हो तुम मुझ से । ऐसी कौन सी कयामत टूट पड़ी है ।”

मायरा रो देने वाली हो रही थी अज़लान का रवय्या और उसकी बेपरवाई मायरा बरदाश्त कर ही नहीं सकती थी।

अब तो वह बहुत ही पत्थर दिली का मुजाहिरा (प्रदर्शन ) कर रहा था। “यह मामूली बात है तुम्हारी नजर में, बताओ मुझे। सामने खड़ा हो गया गुस्से से भरी नजरें, खूंखार लबो लहजा, मायरा बस चुप हो गई।

इस वक्‍त उसे खामोश रहना ही मुनासिब लगा था अज़लान गुस्से में था और अगर वह भी हर बात का जवाब देती तो झगड़ा तूल पकड जाता ।

“अच्छा रिलेक्स हो जाओ आइन्दा ख्याल रखूंगी अरसलान के सलाम का जवाब भी नहीं दूगी बस अपना मूड ठीक करो प्लीज।” मायरा गुजारिश के लहजे में बोली।

मायरा ने देखा कि अज़लान के तने हुए तेवर ढीले पड गए, दोनों साथ चलते कालिज गेट तक आए, अज़लान अपनी गाडी का फ्रन्ट डोर खोलने लगा ।

अज़लान रोज मायरा को उसके घर ड्राप करता था। “बात करो ना, कहा ना आइन्दा ख्याल रखूगी, एहतियात बरतूंगी।” मायरा ने यकीन दिलाया । “यह मत भूला करो कि तुम सय्यद अज़लान शाह की मुहब्बत हो ।” अज़लान के लहजे में गुरूर सा भरा था, वह हमेशा अपना नाम जमा जमा कर अदा किया करता था।

उसे शाहों का बेटा होने पर घमन्ड था वह जब भी अपना नाम आप लेता तो एक घमंड का एहसास उसके बदन में सरिये फिट कर देता, यह घमन्ड की हद थी।

“मुझे नहीं पसन्द कि तुम्हें कभी हवा भी छुए, या कोई मर्द तुम से बात करे तुम्हें नज़र भरकर देखे खून खौलता है मेरा, तुम सिर्फ मेरी हो, मेरे लिए हो ध्यान में रखा करो या बात ।” मायरा बहुत कुछ कहना चाहती थी मगर खामोश रही ।

मायरा मुंह में जबान रखती थी और जरूरत के वक्‍त अपनी जबान का इस्तेमाल करना भी जानती थी ।

मगर यह भी सच था कि वह सय्यद अज़लान शाह से मुहब्बत भी बहुत करती थी, इस लिए अज़लान की कड़वी कसीली और नागवार बातें भी हंस कर सह जाती थी।

मायरा का घर आ गया था अज़लान ने गाडी रोकी ।

“आ जाओ खाना खा के चले जाना ।” मायरा ने कहा तो अज़लान हंस पड़ा, वह ऐसा ही था पल में तोला पल में माशा अपनी मनवाने वाला, अपनी चलाने वाला, अब उसका गुस्सा उतर चुका था, इस लिए मूड भी ठीक हो गया था।

“सच में आ जाऊं।” अज़लान ने मुस्कुराती हुई मायरा को नजरों के घेरे में लेकर पूछा मायरा फ्रन्ट डोर खोल कर उतरी और अध खुले पट पर हाथ रख कर अज़लान को देखने लगी देखती रही।

“अभी नहीं, पहले मैं मुनासिब वक्‍त देखकर अपनी अम्मी से तुम्हारा जिक्र करूंगी और फिर तुम्हें अपनी अम्मी से मिलावऊंगी अब जाओ । दोनों एक साथ हंसे।

“बाय।” अज़लान ने गाड़ी दोबारा स्टार्ट की। “बाय।” मायरा ने जवाबी ज़रा सा हाथ बलन्द करके कहा और घर के अन्दर चली गई।

सय्यद अरमुग़ान शाह का अज़लान शाह इकलौता बेटा था। तीन बेटियां थीं । उनके यहां लड़कियों को ज्यादा पढ़ने की इजाजत नहीं थी।

खानदान की कुछ एक लड़कियां ही ऐसी थीं जो कालिज तक पहुंची थीं, वर्ना तो मैट्रिक या उससे भी कम तालीम दिलवाने के बाद लड़कियों को घरों में कैद कर लिया जाता ।

हां! उनके खानदान के लड़के ज़रूर कालिज, यूनीवर्सिटीज में पढ़ रहे थे । जमीनदार लोग थे । खुशहाली नस्ल दर नस्ल आगे बढ़ रही थी।

हर लड़के को एक शादी तो लाजमी (जरूरी) खानदान में करना होती थी, क्योंकि इतनी लम्बी चौड़ी जमीनें खानदान से बाहर जाने का खतरा मोल लेना पड़ता अगर खानदान की लड़कियां बाहर बियाही जातीं तो ।

जो कि शाह खानदान को गवारा नहीं था कि बेटियां बाहर बियाहने की सूरत में गैर लोग उनके सामने सर उठाएं और जाइदाद में से अपने हिस्सों की डिमांड करें ।

जमीनों का बटवारा हो। औरतों को घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी अगर किसी मजबूरी की वजह से औरतों को घर से बाहर जाना भी पड़ता तो टोपी वाले पुरानी तर्ज के बुर्के ओढ़ कर घरों से निकलती थीं ।

बुर्को में औरतों की उम्र वगैरह का अन्दाजा लगाना बहुत मुश्किल होता, क्योंकि वह सर से पांव तक ढ़की छुपी होती। यहां तक की उनके हाथ भी दस्तानों में छुपे हुए होते।

सय्यद अज़लान शाह और मायरा निसार एक साथ कालिज में बी.एस.सी. कर रहे थे । मायरा के वालिद निसार अहमद दुबई में थे । मायरा का एक भाई शहर का जाना माना वकील था, जबकि दूसरा भाई डी.एस.पी. था।

मायरा का घराना खुशहाल भी था और रौशन ख्याल भी । मायरा और अज़लान शाह की दोस्ती कालिज में ही हुई थी और फिर दोस्ती धीरे धीरे मुहब्बत में बदल गई और अज़लान शाह वैसे तो खूबसूरत लड़का था और ज़हीन भी बहुत ज्यादा था ।

मगर उसकी जात की कमजोरी यह थी कि वह अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं था । हद से ज्यादा जिद्दी और घमन्ड…..जबकि मायरा बहुत सुलझी हुई तबीअत की मालिक लड़की थी।

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जहानत, रख रखाव भी अच्छे थे और नर्म मिजाज की भी थी । इस लिए उसकी बहुत सारे मुआमलात में अज़लान शाह से नहीं बनती थी। ऐसी जगहों पर वही कम्प्रोमाइज कर लेती थी, बिला वजह भी झुक जाया करती थी।

कई बार उसे बहुत से एहसास होता कि वह ऐसी मुजरिम है जो बगैर जुर्म किए कटहरे में खड़ी है ।

अज़लान गुस्से की हालते में मायरा पर यूं बरस रहा होता कि मायरा को कभी कभी लगता बहुत हो गया अब और नहीं । उसे अपनी इज्जत दो कौड़ी की लगने लगती।

“सय्यद अज़लान शाह की तुम मुहब्बत ही नहीं इज्जत भी हो, किसी तौर मुझे गवार नहीं कि कोई तुम्हें देखे बात करें, जान निकल जाती है। तन बदन में आग लग जाती हैं जो मेरा रोम रोम झुलसा देती है।”

“अज़लान तुम्हें क्या डर है मुझे नहीं पता, मगर मुझे सिर्फ तुम्हारे रूठ जाने का और बिछड़ जाने का डर है, जो मेरी ज़बान पर ताले लगा देता है, वर्ना बुरा तो मुझे भी बुहत लगता है जब तुम मुझे बगैर किसी गलती के, किसी खता के इतनी बेदर्दी से बुरा भला कहते हो।”

वह यह सारी बातें कहना चाहती थी मगर कह देने की कोशिश में मायरा के नाजुक होन्ट सिर्फ कपकपा कर रह जाते और मुहब्बत हरबार मायरा का सर अपने फौलादी शिकजे में लेकर अपने कदमों में झुका देती और मायरा अपनी इज्जत का खून होता देखती रहती।

कमजोर पड़ती रहती और झुकती रहती। मायरा और अज़लान शाह फाइनल एजाम के बाद आज कल फ्री थे । कान्टेक्ट फोन पर ही होता था ।

अज़लान शाह अपनी अम्मी को मायरा के घर भेजने के लिए जिद कर रहा था मगर न जाने क्यों मायरा अपनी अम्मी से अज़लान का जिक्र नहीं कर पा रही थी।

उस दिन मायरा अपने कम्बल में लिपटी कोई किताब पढ़ रही थी जब दिल्‍ली से उसके मामूं कर्नल रियाज की काल आ गई।

मायरा ने लपक कर फोन उठाया और मामूं से बातें करने लगी। वह अपने मामूं की बहुत लाडंली थी। मामूं की कोई बेटी नहीं थी, सिर्फ दो बेटे ही थे इस लिए मामूं मायरा से सगी बेटी की ही तरह मुहब्बत करते थे।

“बेटा तुम्हारी अम्मी कहां हैं।” मामूं ने पूछा। “अपने कमरे में हैं।” “मौसम कैसा है इलाहाबाद का।” उन्होंने पूछा ।

“ठंड बढ़ गई है,जाती हुई ठन्ड अपना रगढ़ंग दिखा रही है ।” वह खिलाखिलाई। “हां बेटा वर्ना गर्मियों की आमद है, सर्दियों की कोई तुक नहीं बनती ।

इलाहाबाद में तो इन दिनों में नार्मल मौसम होता है, अच्छा बेटा अपनी अम्मी को तो फोन दो जरा, जरूरी बात करनी है, उनका नम्बर बन्द जा रहा है।”

“जी मामूं मैं देती हूं।” मायरा फुर्ती से बेड से उतरी और पांव में चप्पलें पहन कर कमरे से निकली वह तेजी से सीढ़ियां उतर रही थी जब ही मायरा के नम्बर पर अज़लान शाह की काल आने लगी ।

मायरा के हंसते मुस्कुराते होन्ट पल में सुकड़ गए थे और दिल जोर जोर से धड़कने लगा। “अम्मी जी मामूं का फोन ।” मायरा हलकी सी दस्तक देकर अन्दर जाकर बोली और फोन उनको पकड़ा कर खुद सोफे पर बैठ गई ।

वह दोनों बहन भाई बातों में गुम हो चुके थे और मायरा रंग उड़े चेहरे के साथ अपनी अम्मी की चहकती खुशियों से भरपूर आवाज सुनती रही।

आंखों से झलकती खुशी की रौशनी देखती रही, ख्यालों में, अपनों का मान, रिश्तों का फख्र इन्सान के अन्दर कैसी ताकत भर देता है।

“बेटा किसी की काल लगातार बीच बीच में आ रही है।” मिसेज निसार ने कान से सेल फोन हटा कर स्क्रीन को अपनी आंखों के सामने किया तो मायरा का दिल धक से रह गया।

“कोई अज़लान शाह है, क्लास फैलो होगा ना।” “जी अम्मी” मायरा ने अपने सूखे होंठो पर जबान फेरी ।

“मैं भाई को अपने नम्बर से काल कर लेती हूं, आप बात कर लो बेटा अच्छा नहीं लगता ऐसे ।” उन्होंने कर्नल साहब की काल काट कर सेल फोन मायरा को थमा दिया और कर्नल साहब को अपने नम्बर से काल कर ली।

वह बातों में फिर से गुम हो चुकी थीं मगर मायरा शर्मिन्दा सी सेल फोन हाथों में थामे वहीं खड़ी थी। फिर कुछ ख्याल आने पर देखा तो दस मिनट के अन्दर अन्दर अज़लान शाह की पन्द्रह मिस्ड काल्ज आई हुई थीं।

मायरा का दिल परीशान होने लगा वह टूटे बिखरे कदमों से कमरे से निकली और सीढ़ियां चढ़ने लगी, तभी उसकी फिर काल आने लगी ।

मायरा ने ठन्डी आह भर कर उकताहट से काल काट दी । मायरा अपने कमरे में आकर टहलने लगी वह गुस्से से तिलमिला रही थी तब ही फिर काल आने लगी।

“हां बोलो ।” मायरा तल्खी से बोली। “किसके साथ बात कर रही थी इतनी देर से?” वह चीखा आदत के मुताबिक।

“मामूं से।” मायरा ने खुद को कन्ट्रोल में रखकर सिर्फ इतना कहा । “बकवास बन्द कर घटिया लड़की, बताओ कौन था ।” वह फट पड़ा, अज़लान का बस नहीं चल रहा था क्या कर डाले, उसकी फुंकारती हुई सांसें साफ सुनाई दे रही थीं।

“अपनी जबान संभाल कर बात करो मिस्टर अज़लान । तुम्हें कोई हक नहीं है मुझ से सवाल जवाब का और यह अपनी धौंस आज के बाद मुझ पर कभी मत जमाना।” मायरा भी आज उसे खरी खरी सुनाने पर तुल गई थी ।

अज़लान की कुछ देर के लिए आवाज बन्द हो गई। “मैं अब थक गई हूं तुम्हारे जैसे बीमार जहनीयत कें शख्स के साथ चलते चलते तुम से तअल्लुक बोझ बन गया है ।

तअलुक इन्सान को मजबूत बनाता है कमजोर नहीं मैं हर बार तुम से दबती रही अब और नहीं बहुत हो गया ।” मायरा भी तल्खी से बोलती चली गई।

“मुझे अच्छा नहीं लगता मायरा।” अज़लान इस काया पलट पर कुछ नर्मी से बोला।

“क्या अच्छा नहीं लगता, मै जीती जागती इन्सान हूं कोई चीज नहीं हूं जिस पर तुम्हारा कब्जा हो ।

मेरी अपनी सोच है, अपनी पसन्द हैं तुम मेरी जात पर हावी हो कर मेरी जात को खत्म कर देना चाहते हो। कैसी मुहब्बत है यह तुम्हारी जो हर वक्त मुझे डर और खौफ में मुब्तला रखती है।”

मायरा तो आज उसे खातिर में ही नहीं ला रही थी । वह कुछ कहना ही चाहता था कि मायरा ने फोन बन्द कर दिया। “ओह माई गाड! अम्मी क्या सोचती हांगी कि मेरी दोस्ती ऐसे लोगों से है जिनकी मैनर्ज का ही नहीं पता ।

काल पे काल किए जा रहा था, कोई रख रखाव नहीं, कोई तहजीब नहीं ।” मायरा को सही में आज अम्मी के सामने शर्मिन्दगी उठाना पड़ी थी।

अजीब सी शर्मिन्दगी ने मायरा को घेरे में ले रखा था। उसे रह रह कर अज़लान पर गुस्सा आ रहा था, दुखी हो रही थी। वह जलती भुनती कमरे में चक्कर काटती रही।

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मायरा ने दो दिन तक अज़लान शाह से बात नहीं की थी। हर बार गुस्सा, अज़लान शाह लड़ता था और मायरा सुनती थी, मनाती थी, मगर इस बार मुआमला उलटा हो गया था ।

अज़लान लगातार उसे काल्ज कर रहा था, बहुत सारे मुआफी के मैसेजेज भेजता रहा । मायरा का दिल पसीज गया उनकी सुलह हो गई।

अज़लान शाह उसे मनाने में कामयाब हो ही गया था। उसने अपनी तमाम गलतियों को मान लिया था। अब वह रोज उसे फोन करता वह दोनों घंटों बातों में मगन रहते आने वाले दिनों के सुहाने सपने बुनते रहते थे ।

उन्ही दिनों मायरा ने सुना कि अम्मी फोन पर अब्बू को बता रही थीं कि मामूं अपने बेटे डाक्टर हम्जा का रिश्ता मायरा से करने के ख्वाहिशमन्द हैं, वह बहुत ज्यादा खुश थीं।

मायरा परीशान थी उसने अज़लान को बताया । वह मिलने का प्रोग्राम बनाने लगे ताकि इतमिनान से बैठ कर बात कर सकें।

वह दोनों ही गुमसुम से हो गए यह बात सुन कर । आज कल उनका किसी भी बात पर झगड़ा नहीं था। दोनों खुश थे, सारी बदमजगी, सारी कडवी बातें दूर हो गई थीं।

मायरा पर अज़लान जी भर कर मुहब्बत लुटा रहा था उसकी हर बात मान रहा था शायद वह बदल गया था या बदल रहा था।

कम से कम मायरा को तो ऐसा ही लग रहा था या शायद मुहब्बत खुश गुमान होती है। खुश फहमियां पालना मुहब्बत का बरसों पुरानो तरीका रहा है।

मायरा आज अज़लान से मिलने के लिए जा रही थी । तय यह पाया था कि वह घर से निकलकर रोड पर आएगी वहां से अज़लान उसे पिक करेगा फिर दोनों किसी होटल में जाना खाएंगे और इस मसअले पर बात करेंगे।

मायरा घर से किसी दोस्त से मिलने का कह कर निकली थी। शाम का वक्‍त था सूरज अभी दूर आसमान के किनारों में अपनी लाली बिखेर रहा था।

मायरा घर से काफी दूर निकल आईं थी और अब वह एक अलग थगल सी जगह पर खड़ी हो गई ।

उसने अज़लान को बता दिया था कि वह घर से निकल आई है मगर अज़लान नहीं पहुंचा था।

सड़क पर गाड़ियों की भीड़ सी नजर आ रही थी । वह रोड वाली खास चहल पहल, शोर शराबा, आते जाते लोग, चुभती हुई ताडती हुई नजरें ।

“हम छोड़ आएं, कहां जाना है।” एक गाड़ी वाले ने बिल्कुल मायरा के पास गाडी रोक कर अजीब से लहजे में आंखें नचा कर कहा । मायरा की रंगत पल में फीकी पड़ गई ।

उसका दिल घबरा कर तेज धड़कने लगा फिर वह उसकी परीशान हालत से मजा लेता गाड़ी भगा ले गया ।

मायरा का चेहरा पल में शर्मिन्दा होकर चटखने लगा उसने चोर नजरों से इधर उधर देखकर अपने पर्स में से सेल फोन निकाल कर अज़लान शाह को दो मिनट की काल की थी।

उसने जल्दी पहुंचने का वादा करके इन्तिजार करने को कह दिया। आते जाते लोग रुक रुक कर जांचती टटोलती नजरों से मायरा को देख रहे थे ।

उसका सारा बदन कपकपा रहा था। वह घर से अकेली कभी नहीं निकली थी वैसे उस पर घर वालों की तरफ से कोई पाबन्दी नहीं थी मगर वह फिर भी कभी अकेले घूमने फिरने की शौकीन नहीं रही थी।

मायरा ने देखा उसके सामसे दो तीन लड़के आ कर खड़े हो गए थे और आपस में कानाफूसी करते हुए मायरा की तरफ गोल मोल से इशारे कर रहे थे।

मायरा को डर हुआ अगर बड़े भय्या ने देख लिया तो। उसने अपनी नाजुक सी कलाई पर बन्धी घड़ी पर उचटती सी नजर डाली उसे घंटे से ज्यादा वक्‍त हो गया था ।

उसके दिल में डर और खतरा सर उठाने लगे । दिल मलाल से भर गया न जाने अज़लान शाह कहां रह गया था।

“कोई तुम्हें नजर भर कर देखे मुझ से बरदाश्त नहीं होता, क्योंकि तुम मेरी इज्जत हो।” अज़लान शाह की आवाज़ मायरा के कानों में गूंज रही थी ।

आंसू पलकों से दामन छुड़ा कर आंचल में जज्ब हो रहे थे । सूरज डूब रहा था, शाम गहरी हो रही थी वह “तेजी से घर की तरफ भाग रही थी।

ऐसी बेइज्जती, इतनी इनसल्ट, क्या वह जान बूझ कर नहीं आया । खाक समझा उसने मायरा को अपनी इज्जत।”

“मायरा तुम ।” कोई करीब से पुकारा मायरा उछल पड़ी। सामने डी.एस.पी. आसिफ निसार फुल यूनीफार्म में अपनी जीप से सर निकाले पूछ रहा था।

मायरा बेइख्तियार खुल कर रो दी और भाग कर जीप में सवार हो गई । वह जैसे धूप से घनी छांव में आ गई थी होश बहाल होने लगे।

“मेरी जान, मेरा बेटा क्‍यों रो रही हो और इस वक्त घर से किस लिए निकलीं तुम । वह मायरा को साथ लगाए प्यार से पूछ रहा था ।

मायरा को शर्मिन्दगी सर उठाने नहीं दे रही थी । उसका भाई उसका मुहाफिज उसके साथ था फिर कौन था जो उसे नजर भर कर गलत जुमला उछाल सकता था वह इज्जत तो इस भाई की थी।

“वह भय्या पिज्जा खाने निकली थी फिर अन्धेरा छाने पर डर गई।” वह हिचकियों के बीच बोली। “पगली हो तुम, इसमें डरने और रोने की क्या बात है पुलिस वाले की बहन हो के डरती हो ।”

उसका सर सीने से लगाए कह रहा था। फिर रास्ते से पिज्जा लेकर वह घर आ गए थे । मायरा को अज़लान ने सोरी का मैसेज किया था वह नहीं आ सकता था घर में बिजी हो गया था।

मायरा ने अपना नम्बर चेन्ज कर लिया वह नहीं चाहती थी कि अज़लान कोई बहाना बनाकर दोबारा उसे मना ले।

भले देर से ही सही मगर वह जान गई थी अज़लान शाह वह शख्स नहीं है जिसके साथ मांयरा जिन्दगी की शुरूआत कर सके ।

किसी बाहर वाली लड़की को इज्जत कहना और बात है मगर समझना नामुमकिन है वर्ना अज़लान शाह यूं उसकी जात को बेमोल न करता ।

मायरा बहुत अच्छी तरह समझ चुकी थी कि अज़लान मायरा को अपनी मिलकियत समझता है । जिन्दगी दो दिन की बात तो नहीं उम्र भर का साथ है।

अज़लान शाह ने जैसे उसे बेसरो सामान सड़क पर तमाशा बनाया। उस दिन मायरा ने बिछड जाने के डर से हाथ छुड़ा लिया, इज्जत से बढ़ कर कुछ भी नहीं मुहब्बत भी नहीं।

मुहब्बत न मिले लडकियां जिन्दगी जी ही लेती है, मगर इज्जत न मिले तो लड़कियां जीते जी जिन्दा दफन हो जाती है। मामूं मायरा का हाथ मांगने आ रहे थे मायरा की अम्मी ने मायरा से पूछा तो उसने हां में सर हिला दिया ।

उसे पता था कि उसका पूरा खानदान खुश है तो वह भी आने वाले दिनों में जरूर ढ़ेरों मुहब्बतें और इज़्ज़त व मान पा कर खुश रहेगी।

-फ़ोजिया एहसान

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