Mahakta Aanchal Shayari and Ghazal – Hindi/Urdu Shayari

Mahakta Aanchal Shayari – महकता आँचल शायरी

सारे जग में वो सबसे धनी हो गए
जो गरीबों के लब की हंसी हो गए

तितलियां भी नहीं निकहतें भी नहीं
फूल गुलशन के क्या कागज़ी हो गए

यह हवा भी चली और मैं भी चला
सब दिए राह के जादुई हो गए

आपकी बात में है बहुत ही मिठास
आप तो मीर की शाइरी हो गए

सर्द पड़ जाएंगे सब के जज्बात फिर
आप गर धूप से चांदनी हो गए

सख्त जानी थी जिनकी सिफुत दोस्तो
अब वही फूल की पंखुड़ी हो गए

इस सियासी सखावत पे कुर्बान मैं
एक सिक्का दिया और सखी हो गए

नफ़्स पर अपने कदगन लगाया करें
जब्त वाले खुदा के वली हो गए

क्‍या यही हौसला लेके निकले थे आप
एक ठोकर लगी और दुखी हो गए
– ताजीर बस्तवी –


मुझे दिल में छुपाना चाहता है
जमाने से बचाना चाहता है

मुझे मुझ से अलग करना है उनको
मुझे मुझ से चुरना चाहता है

मैं उसके पास जाना चाहती हूं
वह मेरे पास आना चाहता है

उसे अपनी पड़ी है मुझ से पहले
मुझे वह क्या बताना चाहता है

हवा भी नाचती है साथ मेरे
दिया भी गुनगुनाना चाहता है

वही रिश्ता जो पहले तोड़ डाला
वही रिश्ता निभाना चाहता है

ग़मों को अलविदा कहना पड़ेगा
कोई दिल में ठिकाना चाहता है

उसे मुझ से मुहब्बत हो गई है
मुझे दिल से लगाना चाहता है
– जेबुन निसा ‘ज़ेबी’ –


तेरे ख्याल ही से थीं मेरी तमाम राहतें
मैं ने तो इस ख्याल को तुझ पे तमाम कर दिया

खुश हम न रह सके कभी तेरे बगैर ऐ सनम
हमने तो इस जुनून को आला मक़ाम कर दिया

क्या जाने कब सहर हुई कैसे गुजर गई वो शब्
हमने तो सुबह ओ शाम को तेरे ही नाम कर दिया

हाथों में हाथ डाल के, मंज़िल भी तय न कर सके
तूने तो रास्ते में ही किस्सा तमाम कर दिया

तेरी खुशी के वास्ते हमने तो सी लिए थे लब
इतने दिनों का राज क्यों अब तूने आम कर दिया

अपने वतन में आके भी सदमा ए बेघरी रहा
टूटा हुआ किसी का घर क्यों मेरे नाम कर दिया
– रुख़सार अमरोही –

Best Ghazal Collection

आई होंठों पे हंसी ग़म से बगावत करके
खिल गया फूल खिजाओं में भी हिम्मत करके

जिन्दगी तू तो सदा करती रही हम से मज़ाक
हम भी देखेंगे ज़रा तुझ से शरारत करके

दे तो देते तेरी इन तन्जिया बातों का ज़वाब
क्या करें रह गये एहसासे मुरव्वत करके

हो सका गुल किसी सूरत न मेरे फन का चराग
आन्धियां रह गयी खुद वक़्त की हैरत करके

न मिले जोहरी कोई तो यह किस्मत ‘नरजिस’
हम ने गौहर तो तराशे बड़ी मेहनत करके
– सय्यद नरजिस जैदी –


बुए गुल बन के मुहब्बत के नगर से गुज़रे
हम हर इक बार तेरी राह गुज़र से गुज़रे

फिर तेरी ज़ुल्फ़ के सायं में मिले दिल को सुकूं
फिर तेरी याद का सूरज मेरे सर से गुज़रे

शहर खुशूब में यही सोच के हम आएं हैं
कोई तो साहिब-ए-किरदार नजर से गुज़रे

देर-ओ-कअबा नहीं राह रसन-ओ-दार भी है
देखना है तेरा दीवाना किधर से गुज़रे

वादी-ए-लाल-ओ-गुल में भी किया तुझको तलाश
जुस्तजू में तेरी हम शम्स-ओ-कमर से गुज़रे

उनसे पूछे कोई एहसास की दुनिया क्या है
जो मुहब्बत के हसीं शाम-ओ-सहर से गुज़रे

उनके जलवों का जो तालिब है ज़माने में ‘अदीब’
पहले वह अपने मकामात-ए-नज़र से गुज़रे
– शमशाद अदीब –

Mahakta Aanchal Ghazal

खफ़ा हो न जाए तेरी दिल्लगी से
संभल जा मेरे ना समझ दिल अभी से

मुहब्बत की राहें कठिन दूर मंजिल
क़दम रोक लो मान जाओ अभी से

मिलेगी न ग़म से शबो रोज फुर्सत
न बहलेगा दिल उनकी झूठी हंसी से

यहां पर सुनेगा न फ़रियाद कोई
कि हासिल नहीं कुछ भी कहना किसी से

भरोसा है जिस पर तुझे इतना ‘आज़र’
न रुख़ मोड़ ले वो तेरी जिन्दगी से
– रंजन ‘आज़र’ –


तमाम जीस्त अंधेरा ही मुस्कुराएगा
हमारे घर में उजाला कहां से आएगा

तुम अपने दौर के सारे चराग़ गुल कर दो
नया उजाला नई दास्तां सुनाएगा

कभी तो लौट कर आएगा वो मुसाफिर भी
कभी तो रात का सन्नाटा गुनगुनाएगा

बहुत अजीब हैं यारो शिकायतें उसकी
कभी हंसाएग़ा हमको कभी रुलायेगा

अधूरे ख्वाब की मंजिल यहां तलाश न कर
हमारी आंख में झांका तो कांप जाएगा
– मुनीर हमदम –

अकेला देख कर सहमा हुआ है
मेरा साया भी मुझ से डर रहा है

मैं अपने आप में गुम हो चुका हूं
जमाना क्‍यों मुझे अब ढूंढता है

गुनाहों की तपिश से जल रहा हू
सवा नेजे पे सूरज आ गया है

भरी दुनिया में तन्हा जी रहा हूं
यह ना करदा गुनाहों की सज़ा है

ढ़ला है नूर के सांचे में गोया
वह इन्सानों में कोई देवता है

इन्हें पहचान लो कातिल यही हैं
जनाजा जिनके कंधो पर धरा है

‘नसीम’ उस बेवफा को कुछ न कहिए
वह मेरा है बूरा है या भला है
– नसीम सहारनपुरी –


Hindi mein Ghazal

अब वह नजर बचा के इधर से गुजर गये
तन्हायों के तीर जिगर में उतर गये

सहमे चमन मे ऐसी चली ग़म की आन्धियां
पत्तों के साथ फूल भी सारे बिखर गये

अच्छा हुआ कि रह गई जोशे जुनूं की लाज
वहशत के हाथ अपने गिरेबान पर गये

चौराहे पर हयात के यह सोचता हूं मैं
था जिनपे मुझ को नाज़ वह साथी किधर गये

तुमको तो रास आ गई फूलों की अंजुमन
कांटे मेरा नमीव थे दामन में भर गये

‘वाहिद’ हुनर को मौत नहीं है कभी मगर
अपनी खुदी को बेच के फंन्कार मर गये
– वाहिद सहारनपुरी –

उलटी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आखिर काम तमाम किया

अहदे जवानी रो रो काटा, पीरी में लीं आंखें मून्द
यानि रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

नाहक हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया

सरजद हम से वेअदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उसकी ओर गए पर सजदा हर रह गाम किया

किसका क़िबला, कैसा काबा, कौन हरम है, क्‍या अहराम
कूचे के उसके बाशिन्दों ने सबको यहीं से सलाम किया

‘मीर’ के दीन-ओ-मजहब को क्‍या पूछते हो भई उनने तो
क़श्क़ा खिंचा, दैर में बैठा, कबका तर्क इस्लाम किया
मीर तकी मीर


वैसे तो है तन्हा कौन
लेकिन किसका अपना कौन

दुनिया पानी पानी है
कौन समन्दर दरिया कौन

रोया करता है मुझ में
मेरे अन्दर बैठा कौन

किसे पता है मन्जिल का
किसे दिखाये रस्ता कौन

बात न स॑च्चीं कही गई
सब से पहले कहता कौन

कल शब भर सन्नाटों में
रह रह कर था चीखा कौन

मैं ही लोगों में हूँ मगर
सोच में हूं कि वह था कौन
– सौमेंदु वर्धन मालवी वाराणसी –

नइम सबा

सुख भरी रूत लिए जब आया बरसता बादल
ज़र्द को सब्ज़ बनाता गया काला बादल

तपते लम्हात जवां पलकों पे भारी थे बहुत
खुशकियां कर गया सैराब सुहाना बादल

पहले हौले से हुयीं दस्तकें दरवाजे पर
फिर मेरे कमरे में चुप के से दर आया बादल

झूम कर छाया कभी छा के बिखरने भी लगा
रंग में डूबा हुआ मस्त नशीला बादल

होते ही सुबह फुसूं टूट गया ख़्वाबों का
रात बाहों में मेरी डोल रहा था बादल

पहले भागा तो बहुत बाद में वह मान गया
देर में जाके हुआ राम हटीला बादल
– नइम सबा –

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