मोतिए का फूल – ख़ूबसूरत खुशबूदार कहानी

फातिमा थकन न से बेहाल घर लौटी तों नूरी आई हुई थी। नूरी उसकी बचपन की सहेली थी। दोनों में बहुत मुहब्बत थी।

“कैसी हो नूरी ?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा। “मैं तो ठीक हूं, तुम सुनाओ?” “बस क्‍या बताऊं बहुत थक जाती हूं, बच्चे नाक में दम कर देते हैं।”

वह नूरी के करीब बैठते हुए थकन भरे लहजे में बोली। बीए, बीएड करने के बाद वह गांव के स्कूल में टीचिंग के लिए लग गई थी।

फातिमा बहुत जहीन थी। उसका शुमार गांव की चन्द पढ़ी लिखी, तमीज़दार और सुलझी हुई लड़कियों में होता था।

“तो छोड़ दो नौकरी, क्‍यों दिमाग खपाती हो और वैसे भी शादी के बाद साकिब तुम्हें शहर ले जाएगा। उसकी नौकरी शहर में है।”

नूरी का लहजा आखिर में शरारती सा हो गया था। साकिब उसका कजिन था और अब मंगेतर भी। उसकी बात पर फातिमा सिर्फ मुस्कुरा दी, लेकिन उसकी मुस्कुराहट फीकी थी।

“सच कहती हूं फातिमा! तुम बहुत खुशनसीब हो, आज में तुम्हारी खाला के घर भी गई थी। इतने खुश थे वह लोग कि जैसे किसी शहजादी को बियाहना है।”

नूरी के लहजे में दोस्त के लिए खुशी थी। फातिमा सर हिलातें हुए उठ खड़ी हुईं।

नूरी मैं कपड़े बदल आऊं, तुम जाना नहीं आज मैं ने अम्मी से पालक गोश्त बनाने को कहा था। तुम्हें भी पसन्द है ना।

मैं आती हूं तो फिर मिलकर खाना खाते है। जल्दी जल्दी अपनी बात कहकर वह नूरी का जवाब सुने बगैर ही निकल आई।

“साकिब अजीम से जबसे उसकी मंगनी हुई थी उसे उसका ज़िक्र यूं ही तकलीफ में डाल देता था। वजह यह थी कि उसका दिल तो मुराद अली में लगा हुआ था।

कुछ माह पहले उसके नम्बर पर मुराद की काल आई थी। वह बहुत भला इन्सान था। तब ही तो फातिमा जैसी सुलझी हुई लड़की उससे मुहब्बत कर बैठी थी।

कपड़े बदलकर और मुन्ह पर ठन्डे पानी के छीटे मार कर जब वह वापस आई तो नूरी उसका इन्तिजार कर रही थी। उसने और नूरी ने मिलकर खाना खाया।ढेरों बातें की।

फातिमा बजाहिर मुस्कुरा रही थी, मगर उसकी मुस्कुराहट में शोखी नहीं थी जो होनी चाहिए थी।

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अगला दिन इतवार का था, फातिमा घर में अकेली थी। अम्मां मुहल्ले में खाला नज़ीरां के घर उनके इकलौते बेटे की शादी की मुबारकबाद देने गई थीं।

शादी तो खैर नहीं थी क्योंकि लड़की अपने घर से भागकर आई थी। मुहल्ले वाले खूब बुरा भला कह रहे थे, लेकिन पीठ पीछे। बजाहिर तो सब ही मुबारकबाद देने गए थे। सों अम्मा भी चली गई थीं।

काफी मैले कपड़े जमा हो गए थे, अम्मां के घर से निकलते ही फातिमा ने मशीन लगा ली कपड़े धोते हुए वक्‍त गुजरने का पता ही न चला।

कपड़े धोने के बाद फातिमा मशीन धो रही थी जब दरवाजे पर खटका हुआ। फातिमा ने चौंक कर देखा तो नूरी थी।

अन्दर आने वाले दरवाजे के आगे थोड़ी सी गीली जगह थी जब भी बारिश होती या मशीन लगाई जाती तो वहां पानी जमा होकर कीचड़ सा बना देता था।

अपने धयान में अन्दर आती नूरी का पहला कदम कीचड़ पर पड़ा था। वह फिसली और धड़ाम से नीचे। बरआमदे में खड़ी फातिमा का एक दम कहकहा निकल गया। उसके क़हक़ह पर नूरी ने उसे घूर कर देखा। 

“अच्छा तरीका है मेहमानों के इस्तकबाल (Welcome) का।” “मेहमान! तुम भी अपना शुमार मेहमानों में करती हो।” उसने हैरत से आंखें पटपटाई।

फिर करीब आकर उसे सहारा देकर खड़े होने में मदद दी। “सिर्फ मेहमान नहीं मैं अपना शुमार बिन बुलाए मेहमान में करती हूं।” नूरी ने खड़े होते हुए कहा, तो फिर वह दोनों हंस पड़ीं।

नूरी के कपड़ों पर काफी कीचड लग गई थी, फातिमा को देखकर उलझन हुई। “नूरी तुम मेरे कपड़े पहन लो और अपने कपड़े मुझे दे दो मैं धो देती हूं।” नूरी ने इनकार किया, लेकिन फिर फातिमा के बार बार कहने पर मान गई।  

“वैसे साकिब भी बहुत खुशनसीब है। तुम खूबसूरत पढ़ी लिखी होने के साथ साथ सुघड़ भी हो।” नूरी ने कहा तो उसका मूड आफ हो गया। 

“हर बात में उसका जिक्र जरूरी है क्या?” “बिल्कुल जरूरी है, क्योंकि वह सिर्फ कजिन ही नहीं मंगेतर और फिर होने वाला शौहर भी है।”

फातिमा ने सर झटका नूरी से बात शेयर करने के बावुजूद वह मुराद वाली बात छुपा गई थी। “अच्छा छोड़ तुम आमना की सुनाओ।” फातिमा ने अचानक टापिक पलटा।

“कौन आमना? ” नूरी न समझी। “अरे भई खाला नजीरां की नई नवेली बहू जो हफ्ता भर पहले ही हमारे मुहल्ले में आई है।”

“ओ अच्छा।” नूरी सर हिलाया- “हां परसों मैं भी गई थी, खुशी से चहक रही थी। वह मुझे तो एक आंख न भाई।”

नूरी ने मुन्ह बनाकर बताया तो फातिमा चौंकी। “क्यों? तुम्हें उसकी खुशी से क्या तकलीफ है।”

“मुझे तकलीफ नहीं है, लेकिन उसके पीछे तो किसी को होगी ना। अपने इश्क की खातिर अपने घर वालों की इज्जत को खाक में मिला आई है।”

वह दोनों सेहन में बैठी थीं चारपाई बिछाकर, इस तरह के फातिमा के लगाए हुए मोतिए के बेशुमार पौदे उनके पीछे थे। नूरी ने गहरी सांस लेकर मोतिए की खुशबू अपने अन्दर उतारी।

फातिमा को मोतिया बहुत पसन्द था। तभी तो सेहन में हर जगह मोतिए के पौदे लगा रखे थे। उसकी बात पर फातिमा ने नागवारी से उसे देखा।

“तो उसे इस काम के लिए भी तो उसके घरवालों ने ही मजबूर किया ना।” अगर वह खुशी से उसकी शादी रहीम से कर देते तो वह क्‍यों ऐसे कदम उठाती।

“एक तो मुझे तुम बड़े लोगों की यह बात बहुत बुरी लगती है गलत बात पर भी हार नहीं मानते हो। उलटा बहस किए जाते हो।” नूरी ने फातिमा की बात पर अफसोस से कहा।

“ग़लत बात क्‍यों अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी गुजारने का तो उसका हक है।” फातिमा अब भी अपनी बात पर कायम थी।

“लेकिन उसने अपने इस हक को बहुत गलत तरीके से इस्तिमाल किया है” यकीन न उसके पास ओर कोई रास्ता बचा नहीं होगा फातिमा को ख़ुद भी मालूम नहीं था कि वह आमना की वकालत क्यों किए जा रही है।

नूरी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया और हाथ आगे बढ़ाकर मोतिए के फूल तोडने लगी। “मत तोड़ो नूरी! इनसे ही सारा आंगन महकता है।”

नूरी ने अजीब सी निगाहों से उसे देखा और फिर तोड़े हुए फूल कीचड़ में फेंक दिए जहां वह कुछ देर पहले गिरी थी, फिर बोली-

“इन मोतियों के फुलों से अंगन महकता था ना तुम्हारा, लेकिन अब कीचड़ में पड़ने के बाद यह अपनी वक़अत खो चुके हैं।

तुम इन्हें यहां से नहीं उठाओगी, क्योंकि अब यह गिलाजत से भर चुके हैं, यह यहीं पड़े रहेंगे और कल सड जाएंगे या फिर किसी के कदमों तले आकर रौदे जाएंगे और यह सजा शाख से टूटने की है।

बस इतनी सी बात है फातिमा! लड़कियों की मिसाल भी ऐसे ही है। वह भी अपने मां बाप के आंगन में लगा मोतिए का फूल होती हैं अपनी खुशबू से अपने आंगन को महकाती हैं,

लेकिन फिर खुद ही अपनी शाख से अपना नाता तोड़ लें और खुद को गिलाजतों और पसतियों में गिरा लें तो फिर वह किसी के लिए भी मुहब्बत, कशिश और इज्जत की हकदार नहीं होतीं।

उनका अंजाम भी यही होता है। सड़े हुए फूलों जैसा।” नूरी की बातों पर फातिमा सकते में थी। उसे मैट्रिक पास नूरी से इतनी समझदारी की उम्मीद नहीं थी।

फिर अचान कही वह जोर से हंस पड़ी। उसकी बेमौके हंसी पर नूरी ने उसे घूरा। “हां तो क्या जिनके पास Degree होती है अकलमन्द सिर्फ वही होते हैं अनपढ़ लोग अंकल से पैदल होते हैं।”

“बस करो नूरी! आज तो तुम मुझे हैरान करने पर तुली हो।” फातिमा ने उसे और बोलने से रोक दिया।

तो वह लब भीच गई “अच्छा बताओ तुमने क्या सोचा है अपने सूट पर किस रंग के धागे से कढ़ाई करोगी?”

फातिमा के टापिक बदलने पर नूरी फिर से नार्मल होकर उसे अपने कपड़ों के बारे में बताने लगी। वह दोनों इन्ही बातों में लगी हुई थीं कि अम्मां आ गईं।

उन्हें भी कीचड से गुज़र के आना था, लेकिन चूंकि वह इसी घर की थीं इस लिए दिमागी तौर पर तय्यार भी थीं कि कीचड से गुजरना पड़ेगा।

वह संभल संभल कर कदम रखते हुए मोतिए के फूल भी उनके कदमों की जद में आ गए। कितना सही तजरिबा था नूरी का। फातिमा ने होन्ट भीच लिए।

उनके करीब आने पर नूरी ने सलाम किया। जबकि फातिमा बोली- “अम्मा! कैसी थी रहीम की दुल्हन।” उसके लहजे में शौक था। 

“अच्छी थी, खूबसूरत है, लेकिन क्या फाइदा है घर से भागी हुई की इज्जत तो खाक भी नहीं।” अम्मां की बातों पर नूरी ने फौरन उनकी हां में हां मिलाई।

“बिल्कुल ठीक खाला जो लड़की अपने घर वालों की इज्जत मिट्टी में मिला दे, उसकी इज्जत किसने करनी है।” फातिमा ने घूर कर नूरी को देखा, लेकिन वह उसकी तरफ नहीं देख रही थी।

वह खामोशी से किचन में चली आई। उसे पता था कि अम्मां और नूरी उस लड़की के बखिए उधेड़ेंगी। उसने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा।

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फातिमा ने जल्दी में चादर ओढ़ी बैग उठाया और बाहर की तरफ लपकी। आज वह स्कूल से लेट हो गई थी  वह गली में निकली तो गली सुनसान थी सिर्फ खाला नजीरा के घर के आगे एक खूबसूरत सी लड़की झाड़ू लगा रही थी।

फातिमा को उसको पहचानने में मुश्किल न हुई। वह यकीनन आमना थी, खाला की बहू  करीब आने पर उसने फातिमा को देखा और मुस्कुरा दी।

बहुत दोस्ताना सी मुस्कुराहट थी। अब फातिमा के लिए सलाम करना जरूरी हो गया। “मेरा नाम फातिमा है।” सलाम के बाद उसने अपना तआरूफ (Introduction) करवाया तो आमना ने सर हिला दिया।

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“हां उस दिन तुम्हारी अम्मी आई थीं और तुम्हारा ज़िक्र किया था। तुम टीचिंग करती हो ना में भी पहले करती थी।”

“अरे यह तो बहुत अच्छी बात है, अगर आप चाहें तो मैं आपके लिए अपने स्कूल में बात करु। जगह निकल आएगी।” उसे यह जान कर कि वह पढ़ी लिखी है खुशी हुई थी। 

“अच्छा फिर मैं रहीम से पूछ कर बताऊंगी।” रहीम के नाम पर उसके चेहरे पर शर्माहट फैली। अबकी फातिमा ने उसे बहुत गौर से देखा वह खूबसूरत तो थी, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं।

हां उसमें कशिश बहुत थी, खास तौर पर उसकी आंखें तो सितारों को भी मात देती थीं। शायद यह चमक खुशियों की है। जाहिर है मनपसन्द शौहर हो तो उससे बढ़कर और क्या खुशनसीबी होती है।

फातिमा के दिल में एक हूक सी उठी फिर वह बोल उठी- “इजाजत दें फिर मुलाकात होगी। मैं आज स्कूल से वैसे भी लेट हूं।”

आमना के सर हिलाने पर वह मुस्कुराते हुए अपने रस्ते पर चल पडी, लेकिन उसका दिमाग सोचता रहा।

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काफी दिन हो गए थे, नूरी ने चक्‍कर नहीं लागया था, वर्ना तो वह रोज ही आ जाती थी। फातिमा अलबत्ता अपनी मसरूफियात की वजह से कम ही जाती थी।

फारिग थी तो सोचा नूरी के घर का ही चक्कर लगा ले अम्मा को बताने आई तो उन्होंने इजाजत के साथ ही ताकीद कर दी- “जल्दी आना हंडिया भी चढ़ानी है फिर।”

वह सर हिलाते हुए बाहर निकल गई। वह अपने ध्यान में गुम जा रही थी कि अचानक उसे सामने से भैंस आती दिखाई दी।

“हाय अल्लाह!” फातिमा की भैंसौ से जान जाती थी, वह बिना सोचे समझे जिस घर के दरवाजे के साथ खड़ी थी, धकेल के अन्दर चली गई अपने पीछे दरवाजा बन्द करते भी उसका दिल घड़क रहा था।

“अरे फातिमा!” मानूस (जानी पहचानी ) सी आवाज थी। फातिमा ने चौंक कर देखा और फिर गहरी सांस भरी। उसके सामने आमना थी। वह बिना सोचे समझे उनके घर घुस आई थी।

“मुझे यकीन नहीं आ रहा कि तुम आई हो हमारे घर मुझसे मिलने।” आमना की आवाज़ में बहुत खुशी थी, उसने आगे बढ़कर फातिमा को गले लगा लिया और वह जो उसकी गलत फहमी दूर करने का सोच ही रही थी।

इस बात पर आगे से यह कहना कि वह डर कर आई है मुनासिब न लगा। उसने मुस्कुराहट होंटो पर सजाई। “इसमें हैरत की क्या बात है चन्द कदम दूर ही तो मेरा घर है। फारिग थी तो सोचा कि मिल आऊं।”

“बहुत अच्छा किया आओ अन्दर बैठते हैं।” वह उसे अन्दर ले आई। कमरा बहुत सादगी से सजा था। मामूली सा फर्नीचर, लेकिन सब बहुत साफ सुथरा था।

फातिमा मसहरी पर जाकर बैठ गई। आमना भी उसके साथ ही बैठी बातें कर रही थी। हंसी बात बे बात उसके लबों से फुटती थी।

“आप बहुत पुरकशिश हैं।” फातिमा बिला इरादा कह उठी। उसकी बात पर आमना जोर से हंस पडी।

“मुझे रहीम की मुहब्बतों ने खूबसूरत बना दिया है फातिमा! रहीम की मुहब्बत उसका साथ अगर मुझे नसीब न होता तो शायद तुम्हें मुझसे ज्यादा बदसूरत कोई न लगता।”

“लेकिन मुहब्बत का साथ भी तो नसीब से मिलता है।” फातिमा ने कहा तो वह बोल उठी- 

“नहीं फातिमा कभी कभी नसीब से जंग करके अपने हिस्से की खुशियां छीनना पडती हैं।” फातिमा उसकी बात का मुनासिब सा जवाब देने ही लगी थी कि उसकी नजर घड़ी पर पड गई।

“अरे इतनी देर हो गई बातों में पता ही नहीं चला।” वह फौरन ही उठ खड़ी हुई अम्मां की ताकीद याद आई। आमना दरवाजे तक छोड़ने आई तो उसे अचानक याद आया-

“आपने रहीम भाई से बात की थी, जाब के लिए” “हां की थी, लेकिन वह कहते हैं कि तुम खुद पर जिम्मेदारियां मत डालो घर के काम भी होते हैं।” फातिमा ने सर हिलाया और बाहर निकल आई।

घर आई तो अम्मां का मिजाज बिगाड़ा हुआ था अम्मां ने उसे तीखी निगाहों से घुरा तो वह घबरा कर अन्दर आई। कुछ लम्हों बाद अम्मां भी पीछे थीं।

“कहां से आ रही हो तुम?” “अम्मा… वह….।” उसने कुछ कहना चाहा कि अम्मां ने टोक दिया। “नूरी  का नाम मत लेना, वह तुम्हारे जाने के बाद आई थी यहां। मुझसे झूट बोल कर तू कहां गई थी।

तुझे आजादी दी थी पढ़ाया लिखाया उसका यह मतलब तो नहीं की तू अब…” “अम्मां खुदा के लिए….।” फातिमा ने परीशान होकर उनकी बात काटी।

“मेरी बात भी सुन लें आप!” फिर उसने सारी बात बताई अम्मां ने अजीब निगाहों से उसे देखा कुछ देर बाद फिर बोलीं- “अच्छा ठीक है, लेकिन उस लड़की से ज्यादा मेल जोल बढ़ाने की जरूरत नहीं।

अच्छे आमाल (कर्म) नहीं हैं उसके। अगर वह इज्जतदार होती तो यह न करती।” “अच्छा मैं अब नहीं बोलूंगी उससे अब खुश।” फातिमा ने हाथ जोड़े तो वह कमरे से निकल गईं। पीछे फातिमा ने गहरी सांस ली।

“बताए बगैर मुहल्ले के एक घर में चली गई तो यह हाल है मुराद का नाम भी लिया तो क़यामत बरपा कर देगी अम्मा!” फातिमा ने सोचा।

डेढ़ साल गुजर गया। फातिमा अब तक कोई फैसला न कर पाई थी मुराद के बारे में। वह सोचती और इरादा तोड़ देती, उसे यकीन था कि अम्मां या कोई भी इस मुआमले में उसका साथ नहीं देगा।

उस दिन वाले वाकेए के बाद फातिमा आमना से नहीं मिली थी। कुछ अम्मां का खौफ और कुछ शायद वह अन्दर से भी घबराई हुई थी।

मुहल्ले में अब आमना की बीमारी का चर्चा था, सुना था कि अब वह बिस्तर से भी हिलने के काबिल नहीं रही।

अम्मां उसको देखने गई थीं। वापस आई तो फातिमा से कहने लगी- “तुम्हें बहुत पूछ रही थी। बीमार है जाकर मिल आओ।”

“सोच लें।” फातिमा ने तन्ज़ से उन्हें देखा तो वह नजरे चुरा गई। “हां जाओ भी शाम होने वाली है।”

अम्मां के कहने पर फातिमा उठ खड़ी हुई। दिल तो उसका अपना भी चाह रहा था आमना से मिलने को।

वह आमना के पास पहुंची तो उसकी चारपाई से चन्द क़दम के फासले पर रुक गई।

चारपाई पर एक बहुत ही कमज़ोर वुजूद पड़ा था, जिसका चेहरा और जिस्म पीप भरे दानों से भरा पड़ा था। एक मैली सी चादर उसके ऊपर थी जिस पर मक्खियां भिनभिना रही थीं।

यह वह आमना तो नहीं थी, जिससे वह एक साल पहले मिली थी। तब उसकी आंखों में सितारे दमकते थे और आज उनमें कब्रस्तिन की सी वीरानी थी।

उसे देखकर कराहियत (घिन) का भरा एहसास उभरता था। वह खस्ता हाली और बर्बादी का मुन्ह बोलता सुबूत थी।

अल्लाह जाने उसे क्‍या बीमारी थी। शायद उसका इलाज भी नहीं हो रहा था। वर्ना आज कल ना काबिल इलाज कोई बीमारी नही। वह भी किसी के आंगन में लगा मोतिए का कूल थी जो अब गल सड रहा था।

अपनी गलती से गिलाज़त मे लिथड चुका था। क्या खुशियों की उम्र इतनी कम होती है उसने दुखे दिल से सोचा। वह नहीं जानती थी कि ऐसी खुशियों की उम्र कम ही होती है।

जिनके लिए दुआए नहीं, बल्कि आहें और बददुआएं हों। किसी की बर्बादी पर बन्दा अपनी खुशियों की बुनियाद रखे तो वह खुशियां हवा का एक आवारा झोंका साबित होती हैं।

फातिमा को देखकर उसकी वीरान आंखों में शनासाई (जान पहचान) की रमक उतरी वह बर वक्‍त मुस्कुराई।

“कैसी हैं आप?” “देख लो तुम्हारे सामने ही हूं। इबरत (वह काम जिससे सबक हासिल हो ) का मुन्ह बोलता सुबूत।” वह बहुत आहिस्ता आहिस्ता बोल रही थी। 

“ऐसा मत कहें।” कुछ भी था फातिमा को उसे इस हाल में देखकर बहुत तकलीफ हो रही थी। मुझे मेरी मां बहुत याद आती हैं फातिमा! मुझे यकीन है अगर वह मेरे पास होती तो उन्हें मुझसे घिन महसूस न होती।

उसकी आवाज कांप रही थी। “आप अपनी अम्मी से मुआफी मांग लें।” “उन सबके लिए तो मैं एक साल पहले ही मर गई हूं।” फातिमा ने दुख से निचल होन्ट दान्तों तले दबाया।

“रहीम भाई आपका ख्याल नहीं रखते। आपका इलाज भी हो रहा है के नहीं?” फातिसा कब से मचलते सवाल को जबान तक ले आई।

उसका मुनासिब इलाज और देखभाल होती तो वह इतनी बुरी हालत में हरगिज न होती।

“एक मसले हुए फूल से किसी को क्या दिलचस्पी फातिमा! वह मेरे साथ वही सुलूक करते हैं जिसकी मैं हकदार हूं।” उसने साफ़ तौर से जवाब नहीं दिया था, लेकिन फातिमा समझ गई थी।

“कितने प्यारे रिश्ते मैं छोड़ आई फातिमा! कोई ऐसे भी करता है भला” वह तड़प रही थी, बिलक रही थी।

फातिमा ने उसका हाथ थाम कर तसल्ली दी और उसके बाद वह  घर आई तो उसका दिल बहुत बोझल था।

घर वापस आकर उसने सबसे पहले अपना मोबाइल उठाया उसकी सिम निकाली और दूर फेंक दी, एक कशमकश का खात्मा हो गया था।

“जिस गांव नहीं जाना उसके कोस क्या गिनना।” उसकी मंजिल मुराद नहीं साकिब था और उसे उसी के रास्ते पर चलना था।

वह वुज़ू करने के लिए बाथरूम में चली गई। उसे अपने रब का शुक्र अदा करना था। जिसने आमना के अंजाम से इबरत (सबक ) दिलाकर उसे भटकने से बचा लिया था और उसे सारी भटकी हुई लड़कियों के सही रास्ते पर आने की दुआ करनी थी।

उसने जान लिया था कि मोतिए के फूल आंगन में ही अच्छे लगते हैं कीचड़ में नहीं।

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