New Mahakta आंचल 2020 Kahaniya

फातिमा थकन न से बेहाल घर लौटी तों नूरी आई हुई थी। नूरी उसकी बचपन की सहेली थी। दोनों में बहुत मुहब्बत थी।

“कैसी हो नूरी ?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा। “मैं तो ठीक हूं, तुम सुनाओ?” “बस क्‍या बताऊं बहुत थक जाती हूं, बच्चे नाक में दम कर देते हैं।”

वह नूरी के करीब बैठते हुए थकन भरे लहजे में बोली। बीए, बीएड करने के बाद वह गांव के स्कूल में टीचिंग के लिए लग गई थी।

फातिमा बहुत जहीन थी। उसका शुमार गांव की चन्द पढ़ी लिखी, तमीज़दार और सुलझी हुई लड़कियों में होता था।

“तो छोड़ दो नौकरी, क्‍यों दिमाग खपाती हो और वैसे भी शादी के बाद साकिब तुम्हें शहर ले जाएगा। उसकी नौकरी शहर में है।”

नूरी का लहजा आखिर में शरारती सा हो गया था। साकिब उसका कजिन था और अब मंगेतर भी। उसकी बात पर फातिमा सिर्फ मुस्कुरा दी, लेकिन उसकी मुस्कुराहट फीकी थी।

“सच कहती हूं फातिमा! तुम बहुत खुशनसीब हो, आज में तुम्हारी खाला के घर भी गई थी। इतने खुश थे वह लोग कि जैसे किसी शहजादी को बियाहना है।”

नूरी के लहजे में दोस्त के लिए खुशी थी। फातिमा सर हिलातें हुए उठ खड़ी हुईं।

नूरी मैं कपड़े बदल आऊं, तुम जाना नहीं आज मैं ने अम्मी से पालक गोश्त बनाने को कहा था। तुम्हें भी पसन्द है ना।

मैं आती हूं तो फिर मिलकर खाना खाते है। जल्दी जल्दी अपनी बात कहकर वह नूरी का जवाब सुने बगैर ही निकल आई।

“साकिब अजीम से जबसे उसकी मंगनी हुई थी उसे उसका ज़िक्र यूं ही तकलीफ में डाल देता था। वजह यह थी कि उसका दिल तो मुराद अली में लगा हुआ था।

कुछ माह पहले उसके नम्बर पर मुराद की काल आई थी। वह बहुत भला इन्सान था। तब ही तो फातिमा जैसी सुलझी हुई लड़की उससे मुहब्बत कर बैठी थी।

कपड़े बदलकर और मुन्ह पर ठन्डे पानी के छीटे मार कर जब वह वापस आई तो नूरी उसका इन्तिजार कर रही थी। उसने और नूरी ने मिलकर खाना खाया।ढेरों बातें की।

फातिमा बजाहिर मुस्कुरा रही थी, मगर उसकी मुस्कुराहट में शोखी नहीं थी जो होनी चाहिए थी।

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अगला दिन इतवार का था, फातिमा घर में अकेली थी। अम्मां मुहल्ले में खाला नज़ीरां के घर उनके इकलौते बेटे की शादी की मुबारकबाद देने गई थीं।

शादी तो खैर नहीं थी क्योंकि लड़की अपने घर से भागकर आई थी। मुहल्ले वाले खूब बुरा भला कह रहे थे, लेकिन पीठ पीछे। बजाहिर तो सब ही मुबारकबाद देने गए थे। सों अम्मा भी चली गई थीं।

काफी मैले कपड़े जमा हो गए थे, अम्मां के घर से निकलते ही फातिमा ने मशीन लगा ली कपड़े धोते हुए वक्‍त गुजरने का पता ही न चला।

कपड़े धोने के बाद फातिमा मशीन धो रही थी जब दरवाजे पर खटका हुआ। फातिमा ने चौंक कर देखा तो नूरी थी।

अन्दर आने वाले दरवाजे के आगे थोड़ी सी गीली जगह थी जब भी बारिश होती या मशीन लगाई जाती तो वहां पानी जमा होकर कीचड़ सा बना देता था।

अपने धयान में अन्दर आती नूरी का पहला कदम कीचड़ पर पड़ा था। वह फिसली और धड़ाम से नीचे। बरआमदे में खड़ी फातिमा का एक दम कहकहा निकल गया। उसके क़हक़ह पर नूरी ने उसे घूर कर देखा। 

“अच्छा तरीका है मेहमानों के इस्तकबाल (Welcome) का।” “मेहमान! तुम भी अपना शुमार मेहमानों में करती हो।” उसने हैरत से आंखें पटपटाई।

फिर करीब आकर उसे सहारा देकर खड़े होने में मदद दी। “सिर्फ मेहमान नहीं मैं अपना शुमार बिन बुलाए मेहमान में करती हूं।” नूरी ने खड़े होते हुए कहा, तो फिर वह दोनों हंस पड़ीं।

नूरी के कपड़ों पर काफी कीचड लग गई थी, फातिमा को देखकर उलझन हुई। “नूरी तुम मेरे कपड़े पहन लो और अपने कपड़े मुझे दे दो मैं धो देती हूं।” नूरी ने इनकार किया, लेकिन फिर फातिमा के बार बार कहने पर मान गई।  

“वैसे साकिब भी बहुत खुशनसीब है। तुम खूबसूरत पढ़ी लिखी होने के साथ साथ सुघड़ भी हो।” नूरी ने कहा तो उसका मूड आफ हो गया। 

“हर बात में उसका जिक्र जरूरी है क्या?” “बिल्कुल जरूरी है, क्योंकि वह सिर्फ कजिन ही नहीं मंगेतर और फिर होने वाला शौहर भी है।”

फातिमा ने सर झटका नूरी से बात शेयर करने के बावुजूद वह मुराद वाली बात छुपा गई थी। “अच्छा छोड़ तुम आमना की सुनाओ।” फातिमा ने अचानक टापिक पलटा।

“कौन आमना? ” नूरी न समझी। “अरे भई खाला नजीरां की नई नवेली बहू जो हफ्ता भर पहले ही हमारे मुहल्ले में आई है।”

“ओ अच्छा।” नूरी सर हिलाया- “हां परसों मैं भी गई थी, खुशी से चहक रही थी। वह मुझे तो एक आंख न भाई।”

नूरी ने मुन्ह बनाकर बताया तो फातिमा चौंकी। “क्यों? तुम्हें उसकी खुशी से क्या तकलीफ है।”

“मुझे तकलीफ नहीं है, लेकिन उसके पीछे तो किसी को होगी ना। अपने इश्क की खातिर अपने घर वालों की इज्जत को खाक में मिला आई है।”

वह दोनों सेहन में बैठी थीं चारपाई बिछाकर, इस तरह के फातिमा के लगाए हुए मोतिए के बेशुमार पौदे उनके पीछे थे। नूरी ने गहरी सांस लेकर मोतिए की खुशबू अपने अन्दर उतारी।

फातिमा को मोतिया बहुत पसन्द था। तभी तो सेहन में हर जगह मोतिए के पौदे लगा रखे थे। उसकी बात पर फातिमा ने नागवारी से उसे देखा।

“तो उसे इस काम के लिए भी तो उसके घरवालों ने ही मजबूर किया ना।” अगर वह खुशी से उसकी शादी रहीम से कर देते तो वह क्‍यों ऐसे कदम उठाती।

“एक तो मुझे तुम बड़े लोगों की यह बात बहुत बुरी लगती है गलत बात पर भी हार नहीं मानते हो। उलटा बहस किए जाते हो।” नूरी ने फातिमा की बात पर अफसोस से कहा।

“ग़लत बात क्‍यों अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी गुजारने का तो उसका हक है।” फातिमा अब भी अपनी बात पर कायम थी।

“लेकिन उसने अपने इस हक को बहुत गलत तरीके से इस्तिमाल किया है” यकीन न उसके पास ओर कोई रास्ता बचा नहीं होगा फातिमा को ख़ुद भी मालूम नहीं था कि वह आमना की वकालत क्यों किए जा रही है।

नूरी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया और हाथ आगे बढ़ाकर मोतिए के फूल तोडने लगी। “मत तोड़ो नूरी! इनसे ही सारा आंगन महकता है।”

नूरी ने अजीब सी निगाहों से उसे देखा और फिर तोड़े हुए फूल कीचड़ में फेंक दिए जहां वह कुछ देर पहले गिरी थी, फिर बोली-

“इन मोतियों के फुलों से अंगन महकता था ना तुम्हारा, लेकिन अब कीचड़ में पड़ने के बाद यह अपनी वक़अत खो चुके हैं।

तुम इन्हें यहां से नहीं उठाओगी, क्योंकि अब यह गिलाजत से भर चुके हैं, यह यहीं पड़े रहेंगे और कल सड जाएंगे या फिर किसी के कदमों तले आकर रौदे जाएंगे और यह सजा शाख से टूटने की है।

बस इतनी सी बात है फातिमा! लड़कियों की मिसाल भी ऐसे ही है। वह भी अपने मां बाप के आंगन में लगा मोतिए का फूल होती हैं अपनी खुशबू से अपने आंगन को महकाती हैं,

लेकिन फिर खुद ही अपनी शाख से अपना नाता तोड़ लें और खुद को गिलाजतों और पसतियों में गिरा लें तो फिर वह किसी के लिए भी मुहब्बत, कशिश और इज्जत की हकदार नहीं होतीं।

उनका अंजाम भी यही होता है। सड़े हुए फूलों जैसा।” नूरी की बातों पर फातिमा सकते में थी। उसे मैट्रिक पास नूरी से इतनी समझदारी की उम्मीद नहीं थी।

फिर अचान कही वह जोर से हंस पड़ी। उसकी बेमौके हंसी पर नूरी ने उसे घूरा। “हां तो क्या जिनके पास Degree होती है अकलमन्द सिर्फ वही होते हैं अनपढ़ लोग अंकल से पैदल होते हैं।”

“बस करो नूरी! आज तो तुम मुझे हैरान करने पर तुली हो।” फातिमा ने उसे और बोलने से रोक दिया।

तो वह लब भीच गई “अच्छा बताओ तुमने क्या सोचा है अपने सूट पर किस रंग के धागे से कढ़ाई करोगी?”

फातिमा के टापिक बदलने पर नूरी फिर से नार्मल होकर उसे अपने कपड़ों के बारे में बताने लगी। वह दोनों इन्ही बातों में लगी हुई थीं कि अम्मां आ गईं।

उन्हें भी कीचड से गुज़र के आना था, लेकिन चूंकि वह इसी घर की थीं इस लिए दिमागी तौर पर तय्यार भी थीं कि कीचड से गुजरना पड़ेगा।

वह संभल संभल कर कदम रखते हुए मोतिए के फूल भी उनके कदमों की जद में आ गए। कितना सही तजरिबा था नूरी का। फातिमा ने होन्ट भीच लिए।

उनके करीब आने पर नूरी ने सलाम किया। जबकि फातिमा बोली- “अम्मा! कैसी थी रहीम की दुल्हन।” उसके लहजे में शौक था। 

“अच्छी थी, खूबसूरत है, लेकिन क्या फाइदा है घर से भागी हुई की इज्जत तो खाक भी नहीं।” अम्मां की बातों पर नूरी ने फौरन उनकी हां में हां मिलाई।

“बिल्कुल ठीक खाला जो लड़की अपने घर वालों की इज्जत मिट्टी में मिला दे, उसकी इज्जत किसने करनी है।” फातिमा ने घूर कर नूरी को देखा, लेकिन वह उसकी तरफ नहीं देख रही थी।

वह खामोशी से किचन में चली आई। उसे पता था कि अम्मां और नूरी उस लड़की के बखिए उधेड़ेंगी। उसने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा।

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फातिमा ने जल्दी में चादर ओढ़ी बैग उठाया और बाहर की तरफ लपकी। आज वह स्कूल से लेट हो गई थी  वह गली में निकली तो गली सुनसान थी सिर्फ खाला नजीरा के घर के आगे एक खूबसूरत सी लड़की झाड़ू लगा रही थी।

फातिमा को उसको पहचानने में मुश्किल न हुई। वह यकीनन आमना थी, खाला की बहू  करीब आने पर उसने फातिमा को देखा और मुस्कुरा दी।

बहुत दोस्ताना सी मुस्कुराहट थी। अब फातिमा के लिए सलाम करना जरूरी हो गया। “मेरा नाम फातिमा है।” सलाम के बाद उसने अपना तआरूफ (Introduction) करवाया तो आमना ने सर हिला दिया।


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