Mujrim by Farah Tahir – Mahakta Anchal Story (मुजरिम-फरह ताहिर)

“बच्चे बड़े हो जाएं तो मां बाप बूढ़े हो जाते हैं ।” हां मगर अब बूढ़ा और जवान होने की कहावत अब बदल चुकी है, अब तो यह बात समझ आई है कि….. “बच्चे मुन्ह जोर होने लगें तो मां बाप कमजोर पड़ने लगते हैं ।”

मां बाप की तरफ से मिलने वाली ढील, बेजा हिमायत, लाड प्यार ही बच्चों को मुन्ह जोर बनाता है, वर्ना बच्चे कभी भी मां बाप के सामने सर उठाने की हिम्मत नहीं कर सकते ।

उसने साफ लफ्जों में उन्हें कुसूरवार ठहराया था। जिस पर फाइरा बेगम ने तड़प कर कहा था।

“हां अभी तुम ऐसा कह सकती हो, अभी हमारे जितने तजरिबे तक नहीं पहुंच सकी हो, जब अम्मां के रुतबे तक पहुंचोगी तब पूछूंगी बच्चों के लिए ढील, लाड, प्यार कहां और कैसे

उमड़ आता है, किस तरह कदम कदम पर औलाद की देखभाल व परवरिश के दौरान औलाद ही की खातिर जाइज नाजाइज के लिए झुकना पड़ता है।

“क्या फाइदा ऐसे झुकने का अम्मी! जिसका हासिल कुछ न हो ।” उसने सर झटका ।

“इस रिश्ते में लेन देन का कौन सोचता है।” कुछ पल उन्होंने अजीब नजरों से उसकी तरफ देखा था, फिर जरा देर के बाद उन्होंने आगे कहा-

“अगर लेन देन का सोचने लगें तो मां बाप किस लिए कहलाएंगे ।” इस बार उन्हेंनि लाजवाब कर दिया था।

इसलिए उनकी बात का कोई भी जवाब दिए बिना उसने पहले से कहीं ज्यादा हटीले अन्दाज में कहा- “मैं कुछ नहीं जानती।

मैं ने आपको कहा है मैं ने जाब करनी है तो करनी है।” हद दर्जा ज़िद्दी अन्दाज में वह अपनी जिद पर अडी थी।

“तुम्हारे भाई किसी सूरत नहीं मानेंगे।” बेबसी देखने काबिल थी। “उनके मानने न मानने की मुझे कोई परवा नहीं है ।” उसने सर झटका और अपनी बात उन तक पहुंचाकर वहां से उठ गई ।

पीछे वह उसके जिद्दी अन्दाज को देखती गहरी सोंच में डूब चुकी थीं। “माहा जाब करना चाहती है।” रात का खाना खाने के बाद फहीम साहब ने माहा की तरफ देखते हुए बिना किसी से बात करते हुए कहा।

क्योंकि वह अच्छी तरह जानते थे, हारिस और फरहान में से इस मुआमले में किसी एक को मुखातिब (संबोधित ) करने का कोई फाइदा नहीं था, इस बात को सुनकर दोनों ने ही एक सा रिएक्शन देना था और फिर वैसा ही हुआ जैसा उन्होंने सोचा था ।

उनकी बात सुनकर फरहान और हारिस दोनों के माथे पर बल पड़ गए थे । जो इस बात के सुबूत थे कि उन्हें उसकी बात किसी तौर पसन्द नहीं आई है, मगर फरहान से पहले हारिस ने एक गुसीली निगाह माहा पर डाली ।

“क्यों क्या इसे खाने को नहीं मिल रहा? भूकी मर रही है? ” उसकी नापसन्दीदगी की लहर माहा तक पहुंची तो वह किलस कर रह गई, मगर वह चुप थी, फहीम साहव उसके फेवर में दुबारा बोले थे ।

“इसका शौक है ।” “इसके फुजूल शौक की खातिर हम अपनी नाक नहीं कटवा सकते ।”

इस बार फरहान ने हारिस से कहीं ज्यादा तेजी से उनकी बात को रद किया तो फहीम साहब के साथ साथ फाइरा बेगम ने माहा की तरफ कुछ इस अन्दाज से देखा जैसे उसे

अपने इरादे से बाज रखने की इल्तेजा (रिकवेस्ट )कर रहे हों । माहा ने उनकी इल्तेजा करती निगाहो को बस चन्द पल के लिए देखा, फिर सर झटक कर बोली थी-

“लाज्मी तो नहीं है भूक से मरता इन्सान ही जाब करे, आप दोनों भी तो जाब कर रहे हैं, हालांकि अब्ब की पेन्शन और दुकानों का किराया हमारे खर्च के लिए काफी है ।”

उसका मकसद उनसे जबान चलाने का हरगिज भी नहीं था, मगर इसके बावुज़ूद फरहान ने उसे डपट कर कहा था-

“ज्यादा जबान चलाने की जरूरत नहीं है, जब कह दिया कोई नौकरी नहीं करनी तो बस नहीं करनी ।”

“और हमारा मुकाबला करने की हरगिज कोशिश नहीं करो | कमा कर खाना मर्द की शान है ।” तेज नजर से उसकी तरफ देखता वह कह रहा था ।’

“तुम्हारी हर जरूरत पूरी हो रही है, फिर तुम्हें जाब करने की क्‍या ज़रूरत है? न जाने क्या ऊंठ पटांग बातें तुम्हारे दिमाग़ में आती रहती हैं।”

उसने सर झटक कर जैसे उसकी बात को फुजूल जानकर हवा में उड़ा दिया था।

“फिर से वही बात वही अन्दाज।” वह सर से पैर तक अनदेखी आग में झुलसी थी ।

पढ़ने लिखने के बावुज़ूद उनकी सोच इस कदर पुरानी थी, जिसका अन्दाज़ उसे आज अच्छी तरह हुआ था, मगर वह किसी ग़लत बात के लिए इजाजत नहीं मांग रही थी,

इसलिए वह भी अपनी बात पर डटी, फिर से कुछ बोलने को थी, मगर उससे पहले हारिस बोल पड़ा- “माहा! फुजूल की सोचो को दिमाग़ से झटक दो।

औरत हमेशा चार दीवारी में काम करती अच्छी लगती है। बाहर निकलने वाली औरत को कोई इज्जत की निगाह से नहीं देखता है तुम एक इज्जतदार घराने की बेटी हो इसलिए कुछ भी बोलने से पहले सोच लिया करो ।

पहले भी तुमने जिद की तो तुम्हें यूनीवर्सिटी तक पढ़ने के लिए भेज दिया, वर्ना तुम अच्छे से जानती हो आज तक हमारे खान्दान की कोई लड़की यूनीवर्सिटी तक पढ़ने नहीं गई है ।”

हारिस ने इस बार समझाने वाले अन्दाज में कहकर जैसे उसकी सोच को बदलने की कोशिश की, मगर उसके कहे हर हर लफ्ज (शब्द) पर पापा को एतराज़ था।

इस लिए वह फोरन बोली थी- “बिल्कुल गलत हारिस भाई आपसे यह किसने कह दिया कि घर से बाहर निकलने वाली औरत को इज्जत से कोई नहीं देखता अगर ऐसा होता तो आज स्कूल कालिज से लेकर हर सूबे में कोई और दिखाई न देती ।

अगर औरत अपने फर्ज को भूलकर आपकी तरह नाम की इज्जत का सोच कर सिर्फ घर में बैठी रह जाए तो सोचें क्या होगा?” एक बड़ा सवालिया निशान बनाकर वह बाकायदा बहस पर उतर आई थी।

“और में ने यूनीवर्सिटी तक जाकर इस लिए तालीम हासिल नहीं की कि में होल्डर कहलाऊं, बल्कि में अपनी डिग्री को किसी काम में लाना चाहती हूं।” उसने उनकी सोच दबलने की हल्की सी कोशिश की थी।

मगर हारिस और फरहान का शुमार उन मर्दे में होता था जो औरत को किसी गिनती में शुमार न करते हुए उसे किसी तीसरे दर्ज का इन्सान समझते थे, उनकी नजर में मर्द होता ही सब कुछ था।

इसलिए उसकी चलती जबान को नागवारी से सुनते हुए कब से खामोश बैठे फहीम साहब की तरफ देखा था।

“अब्बू हमारी बात शायद इसकी समझ में नहीं आ रही है। इसलिए लगातार टर टर किए जा रही है बेहतर होगा आप इसको अपने तरीके से समझा दें ।”

अपनी तरफ से बात खत्म करके वह जाने के लिए उठा था। तब वह दुबारा तेज़ी से बोली थी। “मैं जाब जरूर करुगी।”

बहन तो वह भी उन्ही की थी, अपनी बात से हटना तो वह भी नहीं जानती थी, इसलिए बिना डरे इस बार उसने हटधम्मी वाले अन्दाज में कहकर जैसे उसके तैश को और हवा दी थी।

हारिस एक दम गुस्से से उसकी तरफ बड़ा था मगर उसी वक़्त फ़ाइजा बेगम और फहीम साहब दोनों उसके सामने आ गए। “यह आप दोनों के उसे सर चढ़ाने का नतीजा है, जो आज यह इस तरह हमारे सामने बोल रही है।

बस एक मिनट लगेगा इसकी तबीअत ठीक करने में ।” गुस्से भरी निगाहों से वह लगातार उसे घूरे जा रहा था | “अगर यह जिद पर अडी है तो तुम भी मान जाओ हारिस!” फ़हीम साहब ने उसके कन्धे पर हाथ रखकर कहा ।

“आप मुझे मान जाने को कह रहे हैं अब्बू!” हद दर्जा हैरानी के साथ उसने बाप की तरफ देखा था।

“हां! तुम्हें कह रहा हूं, तुम भाई हो इसके । बहन भाइयो से जिद न करेगी तो फिर किस्से करेगी ।” बहुत ठन्डे और मीठे लहजे में बडी सहूलत के साथ उन्होंने उसके गुस्से को खत्म करने की कोशिश की थी।

फिर जरा देर के बाद दुबारा बोले थे। “और फिर यह कौन सा सारी उम्र जाब करने का कह रही है । कुछ वक्‍त तक करेगी शोक पूरा हो जाएगा तो छोड़ देगी ।”

“हर बार उसकी जिद को अहमियत मत दिया करें अम्मी! और वैसे भी इस बार उसकी जिद किसी सूरत में काबिले बर्दाश्त नहीं है।

आप खुद सोचें अगर हम उसे जाब की इजाजत दे भी दें तो लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे कि हम एक अकेली बहन का बोझ ना उठा सके, इसलिए उसे कमाने के लिए घर से निकाल दिया ।” बहन की फरमाइश से ज्यादा उसे लोगों के बोलने की फिक्र थी।

“हम इसे जाब करने की इजाजत नहीं देंगे अब्बु!” उसने साफ अन्दाज में इनकार कर दिया, तो फहीम साहब ने हाथ बढ़ाकर उसकी थोड़ी पकड़कर इस बार जैसे रिकवेस्ट की थी।

“अपने बाप की खातिर इसे जाब की इजाजत दे दो ।” बेबसी, लाचारी, इल्तेजा, आस न जाने क्‍या कुछ था, उनके अन्दाज़ में माहा एक दम तड़प कर कुछ बोलने को आगे बढ़ी थी,

जब फाइजा बेगम ने उसका हाथ पकड़ कर दबाते हुए उसे इशारे से कुछ भी बोलने से चुप रहने को कहा । वह लब भींच कर रह गई।

यही बात गुस्सा दिलाती थी कि आखिर बाप होकर भी वह उनसे इस तरह दबकर बात क्यों करते थे ।

फहीम साहब कह रहे थे- “अपनी बहन पर गुस्सा मत हुआ करो, अभी तो बाप भाइयो के घर पर है । इसलिए जिद और फरमाइश कर लेती है, यही सोच कर उसकी जिद पूरी कर दिया करो कि न जाने अगले घर जाकर क्या हालात हों ।

वहां उसकी बात को अहमियत दी जाए या न दी जाए।” शब्दों का जाल बिछाकर वह जज्बाती तरीके से उनके दिमाग को ठन्डा करना चाह रहे थे।

“आपकी लाडली है, आप शौक से इसकी जिद पूरी करें, मगर याद रखें अगर इसकी वजह से हमें किसी से भी कुछ भी सुनने को मिला तो हम आपका घर छोड़ कर चले जाएंगे, फिर आप रहना इस घर में अपनी कमाऊं बेटी के साथ ।”

अपनी नाराजगी को जाहिर करता, वह तेजी से वहां से निकल गया।

“माहा की किस्मत अच्छी थी जैसे ही उसने दो तीन जगहों पर एप्लाई किया, उससे अगले ही दिन ही उसे एक कालिज से काल आ गई।

पूरी तय्यारी के साथ वह इन्टरयू देने कालिज पहुंची, जहां उम्मीद से ज्यादा अच्छा इन्टरयू देने के बाद उसे दो दिन बाद वहां से अपाइन्टमैन्ट लेटर मिल गया तो उसने बहुत खुशी के साथ जाब की शुरूआत कर ली, कालिज का माहौल अच्छा होने की बदौलत वह वहां बहुत जल्द सैट हो गई।

हारिस और फरहान नाराज थे, मगर उसने उनकी नाराजगी को ज़्यादा महसूस नहीं किया था ।

उनकी नाराजगी का एहसास तो उसे उसी दिन हुआ, जब करीबी रिश्तेदारों में शादी का कार्ड मिलने पर खर्चे का टापिक छिड़ा तो अपने जहन के मुताबिक उसने मशवरा देने की कोशिश की।

“मायों, मेहन्दी, बारात इतने फंक्शन हैं अम्मी! मेरे ख्याल में हर ईवेन्ट पर अलग अलग रकम देना ठीक रहेगा ।”

इससे पहले कि फाइजा बेगम जवाब में कुछ बोलती फरहान तेजी से बोला । “अम्मी! इसको कहें यह अपनी उस्तानीगिरी को अपने पास रखे, हमें सबक पढ़ाने की कोशिश न करे । हमें इसके किसी मशवरे की जरूरत नहीं है ।

हम वह करेंगे जो हमारा दिल करेगा ।” वह उससे इस कदर खफा था कि उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं कर रहा था । उसने बेयकीनी से उसकी तरफ देखा जो चेहरे पर पूरी बेगानियत सजाए उसकी तरफ से अनजान बनने की कोशिश कर रहा था।

उसने बस कुछ पल ही उसकी तरफ देखा, फिर गहरा सांस भरती वहां से उठ गई । “क्या फाइदा था, वहां बैठे रहने का जहां उसके लिए गुन्जाइश ही बाकी नहीं रही थी ।” न्यू अपाइन्ट होने वाली टीचर के एजाज (आनर ) में कालिज इन्तिजामियां एक पार्टी दे रही थी जोकि एक होटल में होना थी।

इस पार्टी में उसका शरीक होना जरूरी था, मगर दावत मिलते ही वह सोच में पड़ गई थी, क्योंकि एक तो पार्टी शाम में थी। उसको इजाजत मिलनी मुश्किल थी।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या कह कर उन्हें इनकार करे । अपने इजाजत न मिलने की बात तो वह उन्हें हरगिज़ भी बताना नहीं चाहती थी।

इसलिए बहुत सोचने के बाद उसने पार्टी में शरीक न होने पर मुआफी मांग ली । उसका इनकार सुनने के बावुज़ूद उसकी कुलीगज़ उसके इनकार को खातिर में लाए बिना उसको पार्टी में आने के लिए कहती रहीं तो वह हलका सा रजामन्द होने लगी।

खुद वह तो पार्टी आना चाहती थी, मगर उसके घर वाले। जब सब का इसरार बढ़ा तो उसने बहुत सोचने के बाद फाइजा बेगम से पार्टी का जिक्र कर दिया, जिसे सुनकर उन्होंने फौरन कहा था। “अभी तक हारिस और फरहान तुम्हारी जाब को लेकर हमसे नाराज हैं ।

ऐसे में तुम पार्टी में जाने का कह कर हमें और किसी मुश्किल में मत डाल देना।” “अम्मी मैं जिद तो नहीं कर रही । बस आपसे इजाजत मांग रही हूं।” मरे मरे लहजे में उसने सफाई देना चाही थी।

“तुमने इजाजत मांगी? मैं ने इनकार कर दिया । अब तुम इस बात को यहीं खत्म कर दो और बहस करोगी तो मुझे डर है, तुम्हारे भाई इस बार हमारी भी नहीं सुनेंगे और तुम्हारी जाब खत्म करा देंगे, फिर अटेन्ड करती रहना पार्टियां । ” फाइजा बेगम रोज रोज की इन बातों से खासी परीशान दिखाई देर ही थीं।

माहा ने एक नजर झुझलाई हुई मजबूर मां को देखा, फिर खामोशी से उनके पास से उठ गई । जब दो दिन की छुट्टी के बाद वह बहुत मुरझाई सी कालिज पहुंची । एक तो पार्टी में शरीक न होने की शर्मिन्दगी ।

दूसरे अपने हालात के बारे में सोच सोच कर उसने खुद को थका डाला था। यही वजह थी गुजरे दिनों ने उसको निचोड़ कर रख दिया वह जानती थी उसे सामने देखकर हजार सवाल उठाए जाएंगे ।

इसलिए उनके जवाब देने के लिए खुद को तय्यार करती, वह उनके सामने थी, मगर वह सब उसे इस कदर मुरझाया देखकर बजाए सवाल जवाब करने के तशवीश (चिन्ता) में मुब्तला हो गई।

“माहा यह दो दिन में तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हारा तो रंग ही पीला पड गया है? कोई परीशानी है तो हमें बताओ?” जितने मुन्ह थे, उतने ही सवाल हो रहे थे वह उसकी अपनी नहीं थीं, मगर उसके लिए परीशान हो रही थीं।

उनकी अपनाइयत महसूस करके उसका दिल भर आया, मगर इससे पहले कि उसके दिल की भड़ास आंसू बनकर आंखों से छलकती उसने तेजी से पलकों को झपक कर आंसू अन्दर उतार कर मुस्कुरा कर उनकी तरफ देखा-

“ऐसा कुछ भी नहीं है, मैं बिल्कुल ठीक हूं, बस हलका सा बुखार हो गया था।” उसने मुस्कुराते हुए कहा । उसको मुस्कुराते देखकर वह भी मुस्कुराती हुई, उसके गिर्द घेरा बनाकर बैठी।

उसे पार्टी की बातें सुनाने लगी, उनका ध्यान अपनी तरफ से हटता देखकर उसने दिल ही दिल में खुदा का शुक्र अदा किया था।

जिसने हमदर्दी के किसी भी पल में उसे कमजोर होने से बचाकर उसका भरम रख लिया था। उसे जाब करते साल होने को आया था, अब उसने हालात से समझौता कर लिया था

हालांकि हारिस और फरहान अब भी उससे बात करना पसन्द नहीं करते थे और खुद वह भी उनको देखकर सामने से हट जाया करती थी ।

वह जानती थी कि अगर वह उनके सामने रही तो ज़रूर किसी न किसी बात पर उनसे ऐसी बहस का हो जाना मुमकिन था जिसका अन्जाम सिवाए झगड़े के कुछ नहीं निकलना था और फिर उसी झगडे के बाद उसके मां बाप को उसकी खातिर बहुत कुछ सुनकर बर्दाश्त करना पड़ना था

वह जानती थी सब कुछ सुनकर उसके मां बाप किस कदर तकलीफ में पड़ जाते थे, वह उनको तकलीफ देना नहीं चाहती थी, इसलिए उसने खामोशी इख्तियार कर रखी थी, मगर वह इन्सान थी जब कही उसकी बर्दाश्त ही हद खत्म होती तो वह बोल उठती-

जैसे उस दिन शाम की चाय पीने के बीच फरहान ने अचानक ही अपने बाहर जाने का बताकर धमाका किया। “अम्मी! परसों मैं अपनी कम्पनी के साथ बाहर जा रहा हूं ।” उसके अन्दाज में लफ्जों में कही इजाजत मांगने का कोई रंग नहीं था।

वह उनसे इजाजत मांग ही नहीं रहा था | वह तो बस उन्हें अपने जाने की खबर दे रहा था। माहा ने पहले उसकी तरफ देखा, फिर अपनी हैरत भरी निगाहें अपनी मां के चेहरे पर जमा दी जो उससे और कुछ पूछने के बजाए उसे दुआओं से नवाज रही थी।

“अच्छा बेटा खैर से जाकर जल्दी वापस आओ।” “इस बार हमारी कम्पनी को बहुत प्राफिट हुआ है अम्मी! इसीलिए हमारे बॉस ने खुश होकर ट्रिप का ऐलान किया है ।

पन्द्रह दिन का टूर है मई के आखिर तक वापस आ जाएंगें।” वह अपने ट्रिप को लेकर बहुत खुश था। इस लिए खुश होकर पूरी बात बता रहा था। फाइरा बेगम मुस्कुराती हुई, उसकी बातें सुन रही थीं ।

जबकि माहा कभी मां को तो कभी जोश से बोलते फरहान को देखे जा रही थी, फरहान के सेल की बेल बजी तो वह काल सुनने की खातिर वहां से उठता आगे बढ़ गया ।

फाइरा बेगम भी खाली कप टेबिल पर रखती उठने को थी, जब माहा ने अजीब सी हालत के जेरे असर उनको पुकार कर अपनी तरफ देखने पर मजबूर किया। “आपने फरहान को जाने से क्‍यों नहीं रोका।”

“मैं उसे जाने से क्यों रोकती ।” उन्होंने उलटा उसी से सवाल कर दिया। “उसने अब्बू और आपकी इजाजत लिए बिना ही सारा प्रोग्राम खुद ही बना लिया। आपने कोई एतराज ही नहीं उठाया ।”

वह इसी तरह के सवाल करके न जाने क्या सुनना चाह रही थी । “मैं मना क्‍यों करती?” उन्होंने उसकी तरफ देखकर कहा । “और मना तो जब करती, जब वह मुझसे पूछता, उसने तो बस अपने जाने के बारे में सिर्फ बताया । ऐसे में एतराज क्या करती ।”

“हां वही तो मैं कह रही हूं, जब उसने आपसे इजाजत ही नहीं ली तो आपको उसे फौरन मना कर देना चाहिए था, ताकि उसे अपनी गलती का एहसास होता ।” उसने उसकी तरफ देखते हुए कहा था।

“मैं ने आपसे घर के नज्दीक होटल में होने वाली पार्टी में जाने की इजाजत लेना चाही थी, मगर आपने फौरन इनकार कर दिया था फिर अब जबकि फरहान शहर से बाहर जा रहा है तो भी आपने कोई एतराज़ तक नहीं उठाया, क्‍यों?”

“क्योंकि वह मर्द है और तुम एक औरत । “मर्द और औरत में कुछ तो फर्क बनता है, तुम क्यों हर बार एतिराज उठाकर खड़ी हो जाती हो?” “अम्मी! यह आप लोगों के दिलों का वहम है कि मर्द और औरत में फर्क होता है, वर्ना हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है और….. ।”

अभी उसने बात पूरी नहीं की थी कि फाइरा बेगम ने हाथ उठाकर उसे टोक दिया । “मुझे तुमसे कोई बहस नहीं करनी है !” एक तेज नजर उस पर डाल कर उन्होंने कहा था।

“भाई के जाने पर शोर करने के बजाए | उसकी खैरियत से लौट आने की दुआ करो ।” माहा ने हैरत व दुख के साथ अपनी मां की तरफ देखा जो उसके हक पर होने के बावुजूद

उसे ग़लत ठहरा रही थीं, अपने भाइयो के साथ साथ आज उसे अपनी मां की तरफ से एक बड़ी गिरह अपने दिल में पड़ती महसूस हुई थी। “कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।”

मगर उसने तो एक जरा से शौक की खातिर अपना मान सम्मान सभी कुछ खो दिया था। जिस कदर जोश से उसने जाब की शुरूआत की थी,अब कदम कदम पर अपनी तौहीन होते देखकर उसके सारे शौक, सभी उमंगें मरती महसूस होने लगी थीं।

वह कब तक अकेली औरत इज्जत के लिए मर्द की मुखालफत का सामना कर सकती थी यही वजह थी रोज रोज की इस चख चख और कमाऊं बेटी होने के ताने सुनकर उसे

कदम पीछे हटाने जैसा सोचने पर मजबूर कर दिया था, पहले जिस तरह हर रोज एक नई उमंग महसूस करके वह फ्रेश सी कालिज जाया करती थी, अब उसके बिल्कुल उलट वह अपनी अना की सलामती का सोच कर लगे बंधे कालिज जाने पर मजबूर थी।

अब तो वह भी यह सोचने पर मजबूर थी की शायद ओरत कोई वुजूद ही नही है, बल्कि वह तो एक ऐसा रोबोट है, जिसका रिमोट कन्ट्रोल मर्द के साथ में होता है, जिसे मर्द जब जेसे चाहे इस्तिमाल करके औरत को अपने इशारों पर नचाने की ताकत रखता है नया

कारोबार शुरू करने की वजह से हारिस को रकम की जरूरत थी, बहुत हाथ पांव मारने के बाद उसके पास जितनी रकम की जरूरत थी, जमा नहीं हो सकी थी, उसको परीशान

देखकर उसने अपने पास जमा अपनी सारी तन्खाह उसे देना चाही तो उसने उसे बुरी तरह झिड़प कर कहा- “तुम्हारी कमाई के पैसे लेने से बेहतर है में भीक मांग कर पैसे जमा कर लूं।” यह कहते हुए उसने इस कदर सख्त नजरों से उसकी तरफ देखा कि उसका दिल चाहा, जमीनफटे और वह उसमें समा जाए

उसके कमाए पैसों की इस कदर बेइज्जती? आज तक वह हमेशा उनकी ज्यादती पर जब्त करके अपने आंसू अपने अन्दर उतारती आई थी।

मगर आज उसके हर जब्त का बन्द टूटा और वह बहती आंखों के साथ अपने कमरे में आ गई और जमीन पर बैठती बुरी तरह बिखरी थी। उसको उसी तरह बिखरना था।

क्योंकि वह एक औरत थी जिसका बोलना हमेशा जुर्म था उसके बावुजूद उसने आवाज बलन्द करने की कोशिश की तो हमेशा की तरह मुजरिम ठहरा दी गई थी।


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