Saare Jahaan ka Dard – Madhu Sethi-Mahakta Aanchal 2020 Stories in Hindi

कल्पना के जाने के बाद वह अजीब सी उलझन का शिकार हो गई- “क्या करूं, क्या न करूं?” एक ऐसी अजीयत का शिकार थी जो बयान नहीं की जा सकती थी।

किसी काम में उसका दिल नहीं लग रहा था। काम निपटाने भी थे। उसने बेदिली से जरूरी केस की फाइलें निपटायी फिर कुर्सी की पुश्त से सर टिका दिया ।

चारों तरफ आवाजों का शोर था। हर आवाज़ में एक सवाल था, एक पुकार थी, इल्तिजा थी | उसके बस में न था कि हर सवाल को पूरा कर सकती |

मगर सवाल रद करने की अज़ीयतनाक कोफ्त ने उसे बुरी तरह से उलझा कर रख दिया था | अभी कुछ देर पहले उसकी कुलीग सुनीता उसके पास आधा घन्टा बैठ कर गई थी ।

जितनी देर बैठी रही अपनी पड़ोसन गीता की बातें करती रही। “कल्पना! मैं कल गीता के घर गई थी तो उसके घर के हालात देख कर मेरी आंखों में आंसू आ गए थे।” सुनीता बहुत पुरखुलूस और हमदर्द लड़की थी।

दूसरों के दुखों पर वह बेचेन हो जाती थी। “क्यों? खैरियत ? ‘” उसे गीता के हालात का पता था फिर भी उसके मुंह से निकल गया। “क्या बताऊं, मैं रात को उसके घर गई थी। वह और उसके बच्चे सुबह से भूके बैठे थे।

छोटा बच्चा जो एक साल का था वह तो भूक से रो रहा था।”’ उसके दिल में एक फांस सी चुभी । वह गीता को अच्छी तरह जानती थी । गीता के तीन बच्चे थे ।

साल भर पहले उसके पति की एक दुर्घटना में मौत हो गयी थी । बड़ा बेटा आठ साल का था । उससे छोटी बेटी थी। फिर एक साल का छोटा बेटा था।

ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी। कोई नौकरी भी नहीं कर सकती थी । बहुत कम उम्र में शादी हो गई थी । मायके वाले ज्यादा खुशहाल न थे मगर वही उसकी मदद-करते रहते थे ।

सुनीता की सुसराल गीता के पड़ोस में थी। वह लोग भी गीता की मदद करते रहते थे मगर कोई कब तक और कितनी मदद कर सकता है। खुद सुनीता की पांच नन्दे थीं और किसी की शादी नहीं हुई थी।

सुनीता दफ्तर में अक्सर उससे गीता का जिक्र करती | वह भी गीता की मदद कर देती थी। मगर बढ़ती महंगाई और इस माह कुछ खर्चों ने उसका हाथ भी तंग कर दिया था। खानदान में शादियां थीं।

आज सुबह से उसका दिल बोझल था । अखबार में बढती महंगाई और माली तंगी से तंग आकर एक औरत ने अपने तीन बच्चों को जहर खिला कर खुद भी ज़हर खाकर खुदकुशी कर ली थी ।

इस खबर ने उसे हिला कर रख दिया था। “कल्पना! तुम क्या सोचने लगीं?” वह सुनीता से बातें करते-करते जाने कहां पहुंच गई थी।

सारे-जहां-का-दर्द-ख़ास-अफसाना-मधु-सेठी-mahakt-aanchal-story

“अच्छा मैं चलती हूं ।” सुनीता जाने के लिए उठी तो वह चौंक गई- “लो सुनीता! यह हजार रुपये गीता को दे देना । घर का राशन डलवा ले। फिर कुछ और मदद करूंगी ।”

“कल्पना! हो सके तो उसके बच्चों के कपड़ों के लिए कुछ मदद और कर देना। होली आने वाली है । इस बार मेरा हाथ तंग है वर्ना में ही कर देती ।” जाते जाते सुनीता उस पर एक और बोझ डाल गई ।

सुनीता को गए कुछ देर हुई थी कि दफ्तर का चपरासी नानक राम आ गया- “मैडम! आपसे एक बात कहना है ।”

उसका लहजा काफी इल्तिजा भरा था। “कहो ।” वैसे वह समझ गई थी क्या कहना चाहता है। “मैडम! कुछ रुपये चाहिए। उधार दे दें । छोटे बच्चे की तबीअत खराब है । उसे दिखाना है” वह सच कह रहा था ।

महीने का आखिर था और उसे सिर्फ चार हजार तनख्वाह मिलती थी। उसने पर्स देखा | पांच सौ का एक नोट पड़ा था।

उसने वही निकाल कर नानक राम को दे दिया | वह जानती थी यह उधार वह कभी वापस नहीं कर सकेगा। “कल्पना के यहां दोनों पति,पत्नी के मिला कर लगभग बीस हजार रुपये आते थे। लेकिन इसके बावुजूद वह कोई ऐश की जिन्दगी नहीं गुज़ार रहे थे ।

उससे ज्यादा उनके खर्चे ये । तीनों बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे थे । तीन हजार तो उनकी फीस चली जाती थी।

गाडी थी । एक हजार का पेट्रोल खर्च हो जाता था । बैंक से लोन लेकर घर बनवाया था। पांच हजार कर्ज की किस्त चली जाती थी।

और अचानक होने वाले खर्च थे। वह घर आई । खाना बना रही थी कि उसकी छोटी बहन सरिता का फोन आ गया । सरिता का पति गारमेन्ट का कारोबार करता था ।

इसी लिए उसे कपड़ों का क्रेज था। “दीदी! मैंने कल एक बहुत ख़ूबसूरत सूट देखा है। आप वह सूट जरूर ले लें।”

“अच्छा, कितने का है?” वह जानती थी सरिता पांच सात हजार से कम का सूट पसन्द नहीं करती थी।

“कीमत तो ज्यादा है मगर सूट ऐसा है कि बस नजरें नहीं हटती।” “फिर भी . . . काफी महंगा होगा?”

“दीदी! आप इतनी कन्जूसी न किया करें | खुद भी कमाती हैं । जीजाजी भी अफसर हैं । फिर भी ढंग के कपड़े नहीं खरीद सकतीं ।” सरिता को हमेशा शिकायत रहती कि वह अपने स्टेटस के मुताबिक नहीं पहनती ।

“अच्छा देखूंगी। इस महीने तो बिल्कुल गुन्जाइश नहीं है । आज सुनीता आई थी । गीता के बच्चों के कपड़ों के लिए. कह रही थी।” सरिता गीता को जानती थी मगर वह कल्पना के जरीये उसकी मदद से चिड़ाती थी-

“दीदी! यह औरतें आपको बेवकूफ बनाती हैं | आपकी इस आदत की वजह से हर वक्‍त कुछ न कुछ आपसे लेती रहती हैं।”

“नहीं सरिता! गीता वाकई जरूरत मन्द है |” “छोड़ें आप । वह सूट जरूर ले लें । मैंने भी उसी तरह के दो सूट खरीदे हैं

“ठीक है, अगर हजार बारह सौ का हुआ तो देखूंगी।” “अरे दीदी! हज़ार बारह सौ का सूट आप पहनेंगी? वह सूट पांच हज़ार का है ।” वह चुप रही और फोन रख दिया । पांच हज़ार . . . पांच हज़ार का सूट

गीता और उसके बच्चे सुबह से भूके थे । उनके पास होली पर पहनने के लिए मामूली किस्म के कपड़े भी नहीं थे । चपरासी का बेटा बुखार में जल रहा था

वह उसका इलाज नहीं करा सकता । एक औरत ने माली परीशानी से तंग आकर खुद और अपने बच्चों को जहर खिला कर आत्महत्या कर ली।

Mahakta Aanchal 2020

“मामा! शनिवार को पापा आ रहे हैं ।” राकेश दो माह के लिए दफ्तर के काम से बाहर गए थे। छोटे बेटे के मोबाइल पर फोन आया था।

“अच्छा ।” दिल पर इतना बोझ बाकि कोई खुशी महसूस न हुई । सब खुश थे मगर वह उदास थी।

“कैसी पत्नी है, पति के आने की ख़बर पर भी खुश नहीं होती ।” सास ने कुढ कर सोचा । “मॉम! बड़े मामा का फोन है।” मनोज ने फोन उसे थमाया।

“जी भय्या! कैसे हैं?” “ठीक हूँ। तुम कैसी हो? वह मैंने तुमसे रुपयों के लिए कहा था। कुछ हुआ?” उसके पास बैंक में कुल दस हजार रुपये थे ।

भाई दस हजार रुपये उधार मांग रहे थे। उसके पास क्या बचता। अभी महीने में एक हफ्ता बाकी था । होली का त्योहार भी करीब था।

“देखिए कोशिश करूंगी।” कह कर उसने उन्हें टाला। उसके पास हजार हजार के दो नोट थे | उसे बेटी के लिए एक सूट खरीदना था

उसे जो सूट पसन्द आया था वह नौ सौ का था। सूट खरीद कर वह ज्वेलरी के लिए ज़िद करने लगी। उसकी बर्थ डे पर उसे पांच हजार रपये मिले थे

वह उसने अपने पास रख लिए थे। उसमें से भी तीन हजार खर्च हो गए। वह उसकी जिद पर ज्वेलरी शाप में चली गई।

यह आर्टिफिशल ज्वेलरी की महंगी शाप थी जहां एक क्लिप इयरिंग भी दो सौ रुपये का मिलता था। ज्वेलरी खरीद कर निकली तो बच्चे आइसक्रीम के लिए जिद करने लगे ।

वह आइसक्रीम का आर्डर दे रही थी कि एक बच्चा आकर खड़ा हो गया- “बेगम साहब! एक बर्गर दिला दो । सुबह से भूका हूँ ।” आइसक्रीम और बर्गर दो सौ रुपये के आए।

वह गाड़ी में बैठ रही थी कि इलास्टिक बेचने वाला लड़का करीब आकर बोला- “खरीद लें , सुबह से कुछ नहीं बिका है ।” उसने देखा पर्स में सिर्फ चार सौ रुपये बचे थे।

सौ रुपये का इलास्टिक खरीद लिया। “मामा! आप भी कमाल करती हैं । हर बार यह इलास्टिक का पैकिट खरीद लेती हैं ।

घर में कितने ही जमा हो चुके हैं । फुजूल पैसा बर्बाद करती हैं ।” उसके बेटे ने मुंह बनाया। वह कहता था इस तरह वह उनकी मदद करके उनकी भीक मांगने की आदत को बढ़ावा देती है ।

मगर वह सोचती आज मैं इन्हें झिड़क दूंगी, कल कोई हमें भी झिड़क सकता है | मगर बच्चे क्या समझें । रास्ते में गाड़ी में गैस डलवानी थी ।

गैस डलवा कर कुछ ही आगे चली थी कि लाल बत्ती हो गई । बड़े बेटे ने गाडी रोक दी । “अगर आपके सफर में भी चलते चलते लाल बत्ती हो गई तो ?” उसे कुछ खौफ सा महसूस हुआ।

एक हाथ से महरूम बूढी औरत सामने आ गई- “भगवान बच्चे सलामत रखे | सुहागन रहो। इस अपाहिज की मदद करो। उसने पर्स खोला । बीस का नोट बुढ़िया को दिया

हरी बत्ती हो-चुकी थी । गाड़ी रींगती हुई आगे बढ़ने लगी कि एक बच्चा वाइपर लिए गाडी के शीशे साफ करने लगा। “अब मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसे मना कर दो।

उसने ड्राइव करते बेटे से कहा | बच्चा शीशे साफ करके उम्मीद भरी नजरों से देखने लगा । गाड़ियां हार्न दे रही थीं । वह रुक नहीं सकते थे, रुके भी नहीं, आगे बढ़ गए।

अगर भगवान के यहां भी मेरा हिसाब इस पर्स की तरह खाली हुआ और ऐसा ही कोई बच्चा लाल बत्ती पर मेरे सामने आ गया तो क्या मैं वहां भी आगे बढ़ सकूंगी ? वह यही सोचती रह गई।

“कल अनुपम की विदाई थी । उसकी सुसराल से जो शादी का जोड़ा आया वह एक लाख का था । जेवरात पांच लाख के थे।”

सरिता अपनी नन्द की बेटी की शादी के बारे में बता रही थी- “ खाना इतना शानदार और इतनी वेराइटी थी कि समझ में नहीं आता था क्या खाएं क्या न खाएं । शहर का सबसे महंगा मेरिज होम बुक किया था।

लाइटिंग की सजावट बहुत शानदार थी। पता है दीदी! उसका किराया ही रात भर का पचास हजार था। मैंने तो इतना खा लिया कि उलटी होने लगी।”

वह कह रही भी और उसके जहन मे अखबार की खबरें घूम रही थीं- “एक औरत ने भूक से तंग आकर बच्चों के साथ खुदकुशी कर ली । एक बाप ने गरीबी से तंग आकर बच्चों को बेच दिया ।”

मामा ने उसके पति के आने पर पार्टी दी थी | सब मामा के घर थे । खूब रौनक, चहल पहल थी । बच्चे खूबसूरत लिबासों में थे । लेडीज भी कीमती और महंगे लिबासों में इतराती फिर रही थीं ।

मगर वह उदास और चुपचुप सी थी। “तुम चुप क्यों हो ?” किसी ने पूछा। “पता नहीं ।” “खुश रहा करो।” ”कैसे खुश रहा करू?” आंखों से आंसू बहने लगे। “तुम्हें हुआ क्या है? तुम रो क्‍यों रही हो?” सब जमा हो गए।

“तुम लोग क्यों नहीं रोते?” उसने सबसे पूछा । “हम क्यों रोएं?” सबने हैरत से पूछा- “हमें क्या ग़म है?” सब खिलखिलाए। “फिर मैं क्यों रो रही हूं?” “इसलिए कि तुम पागल हो।

तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है।किसी साइकाट्रिस्ट को दिखाओ ।” बड़ी भाभी ने हमदर्दी से उसे मशवरा दिया।

“क्या वाकई मैं पागल हो गई हूँ?” उसने खुद से सवाल किया। फिर वह फूट फूट कर रोने लगी। सब उसे हैरत और अफसोस से देखने लगे।

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