सोच का दर – खूबसूरत कहानी – फरह ताहिर

“उफ़ क्या रुस्वा किया है चाचू जान ने ….इसीलिए तो गुस्से को हराम कहा गया है । पल भर के गस्से ने दो जिन्दगियों को केसें दो अलग अलग किनारों पर ला खडा किया। बीबी को तलाक देकर तनहा जिन्दगी गुजारने पर मजबूर हैं बेचारे चाचू जान!”

वह दुपट्टे पर लेस टांकटी हुई लगातार चाचू की शान में कसीदा खावानी कर रही थी। सतूत आरा मुस्कुराहट लबों में दबाए अफसोस के अन्दाज में बोलती भतीजी को देखे जा रही थीं।

“दादी जान इसी ख्वाहिश में कब्र में जा सोई कि किसी तरह मेरे सपूत की शादी हो जाए। यह भी बाकी भाइयों की तरह खुशगवार जिन्दगी गुजार सके मगर न जी! तलाक देने के

बाद दो साल तो वैसे ही तलाक के गम में गुजार दिए, फिर कही जाकर दूसरी शादी के लिए तय्यार हुए भी तो शर्त यह रखी कि लड़की कुआरी हो।

बेवह या तलाकशुदा भी चलेगी, मगर उसके साथ औलाद न हो । कुछ उनकी फरमाइश ने और कुछ हमारी पुरानी चाची जान और उनकी दुलारी बहन ने जो तलाक लेने के बाद भी

हमारी पसन्द की गई लड़की के घर पहुंच कर गलत ब्यानी कर डालती हैं और इतनी मेहनत से तलाश की गई लड़की झट से पराई बन जाती है।” लेस और दुपट्टा गोद में रखे वह सर पकड़ कर बैठ गई ।

उसके चेहरे पर उस वक्‍त अफसोस ही अफसोस था। “सच में यह तलाक देने की सजा मिल रही है चाचू को ।

पहले लड़की नहीं मिलती थी और अब मिली भी तो उसका कद इतना छोटा….कि हमें देखकर ही एतराज हुआ ।

हमारे आइडियल क़द के मालिक चाचू के साथ उसका मैच बिल्कुल भी नहीं सजेगा । मगर चाचू जान की कनाअत देखें, छोटे क़द की लड़की को भी इंकार नहीं कर रहे है फौरन मान गए।” वह जो दोबारा शुरू हो चुकी थी ।

अपनी बात के खत्म पर खुद ही क़हक़हा लगाकर हंस पड़ी । सतूत आरा भी खुल कर मुस्कुरा रही थीं। “कैसे कैंची की तरह जबान चल रही है इसकी और सतूत! आप भी बजाए मना करने के हंस कर इसकी और हिम्मत बढा रही हैं…..तंग आ गई हूं मैं इसकी इस तरह टर टर चलती जबान से…. ।”

मलका बेगम गस्से से बेटी को घूर रही थीं। “अम्मी! मैंने कुछ ग़लत तो नहीं कहा ।” उसने ऐतराज किया था। इससे पहले की मलका बेगम बोलें सतूत आरा बोल पड़ी।

“बेशक गुडिया! तुमने कुछ गलत नहीं कहा मगर जो गुजर गया उसे जाने दो ना और हम सब जानते हैं जो भी हुआ इसमें राशिद से ज्यादा शहनाज और उसके घर वालो की गलती थी । राशिद ने तलाक गुस्से में दी।”

“एक मिनट फूफी जान!” गुड़िया ने हाथ उटा कर उनकी बात बीच में रोक दी । वह गुस्सा नहीं था वह तो उन लोगों की ललकार का जवाब था। उन्होंने ललकारा ।

“मर्द हैं तो हमारी बेटी को अभी तलाक दें ।” फिर चाचू जान कैसे न अपनी मर्दानगी का सबूत पेश करते फट से “एक दो, तीन” कर दी….यह मर्दानगी नहीं थी उनकी, अस्ल

मर्दानगी यह थी वह बीवी का हाथ पकड कर कमरे में बन्द करते और उनके घर वालों को निकाल बाहर करते, अगर यह मर्दानगी दिखाई होती न तो यह चार साल का बनवास काटना पड़ता और ज्यादा नहीं तो दो तीन चयांव मयांव के अब्बा जी भी बन चके होते ।”

इसका जोर व शोर से जारी ब्यान न जाने और कहां तक पहुंचता कि मलका बेगम ने झुक कर पास पडी चप्पल उठाई और माहिर निशाने बाज की तरह उसकी कमर पर दाग दी…उसकी चलती जबान को एक दम ही ब्रेक लगे थे।

“अम्मी….” उसकी आंखों में फौरन नमी उतर आई थी। “कब से मना कर रही हूं, मगर मजाल है जो यह लड़की चुप हो जाए बस बहुत बोल लिया । लाओ दिखाओ कहां तक लेस टंकी है।

वह मुंह फूलाए खामोशी से उठी और दुपट्टा उनके हाथ में देकर दरवाजे की तरफ चली गई । बीच दरवाजे पर रुक कर पीछे मुड़ी थी।

“मगर मैं आखिरी बात कह कर ही जाऊंगी। खबरदार जो आप लोगों ने उस लड़की का हस्ब नस्ब या अता पता छोटे चाचू या और किसी को बताया तो….वर्ना जेसे ही उनको

लड़की का पता लगेगा छोटी चाची फौरन पहुंच जाएंगी और फिर वह होगा जो चार साल से होता आया है फिर हाथ मलते रह जाना आप लोग ।” अपनी बात मुकम्मल करके वह झपाक से बाह निकल गई ।

मलका बेगम और सतूत आरा दोनों ही हंस पड़ी थीं। अलीमुद्दीन की सात औलादें थीं, तीन बेटियां और चार बेटे ।

बड़े बेटे अकरम, दूसरे इफ्तिखार, तीसरे राशिद और छोटे वकार, अकरम और इफ्तिखार से छोटी सतूत आरा थीं । बाकी दो बेटियां वफात पा चुकी थीं।

अकरम और इफ्तिखार की शादियां अलग अलग घर में हुई थीं। दोनों ही अपनी फैमिली के साथ खुशगवार जिन्दगी बसर कर रहे थे ।

जबकि राशिद और वकार की शादी एक ही घर में हुई थी, शहनाज और जोया दोनों बहनें थी । जोया थोड़ी तेज मिजाज की लड़की थी, मगर फिर भी इसकी वकार के साथ बनती थी ।

वजह थी वकार का नेक और अच्छा अन्दाज। जैसे के शहनाज़ तेज मिजाज न थी, मगर फिर भी न जाने क्या वजह थी कि शुरू के दिनों के अलावा कभी उसकी और रशिद की आपस में नहीं बनती थी ।

शहनाज का ससुराल में दिल कम ही लगता था, इसलिए वह ज्यादातर अपने मायके में पाई जाती थी।

और कभी ससुराल में जलवागर हो भी जाती तो कुछ रोज से ज़्यादा उसका कयाम ससुराल में न होता, फिर किसी न किसी बात को बहाना बना कर नाराज होती और मायके जा बैठती ।

ऐसे हालात के बावजद उनकी शादी तीन साल रही और फिर शहनाज खुद ही तलाक की फरमाइश करके अलग हो गई । अलीमुद्दीन के तमाम बेटे, बाप के छोड़े घर में ज्वाइंट

फैमिली सिस्टम के तहत रिहाइंश पजीर थे, मगर शहनाज की तलाक के बाद उसकी बहन जोया ने इस घर में रहना पसन्द नहीं किया और अपने शौहर और बेटी के साथ अलग घर में जा बसी ।

बाकी तीनों भाई इसी घर में मौजद थे । अकरम और इफ्तिखार के पोरशन इसी तरह आबाद थे, मगर राशिद तन्हा जिन्दगी गजार रहा था।

मां की वफात के बाद बिल्कुल ही अकेला हो गया था । फिर भी इसकी दोनों भाभियां उसका अपने बेटे की तरह ख्याल रखती थीं।

उन ही की लगन का फल था कि तलाक के बाद उन्होंने बेशुमार लडकियां तलाश कीं, हर मर्तबा किसी न किसी बिना पर कभी उनकी तरफ से तो कभी लड़की वालों की तरफ से

रिश्तें से इन्कार हो जाता, फिर भी उन्होंने हिम्मत न हारी, यह इसी बात का नतीजा था एक बार फिर उन्होंने लड़की तलाश कर ही ली थी, जिसका उन्हें सौ फीसद यकीन था कि इस बार राशिद की शादी जंरूर ही हो जाएगी।

“बरी में किसी चीज की कमी तो नहीं है….?” नायला सतूत आरा से पूछ रही थी आज वह बरी का तमाम सामान फैलाए बैठी थी।

“कमी क्‍यों होगी नायला! माशा अल्लाह इतना कुछ तो जमा कर लिया है आप दोनों भाभियों ने पच्चीस रेशमी जोडे, मौसम के मुताबिक गर्मियों के सूट, मेकअप का पूरा

सामान, पांच तोले का सेट और यह जरूरियात जिन्दगी की पूरी छोटी मोटी चीजें सब कुछ तो है।” तमाम चीजों पर परखने वाली नजरें दौड़ाते हुए उन्होंने नायला को तसल्ली बख़श जवाब दिया ।

सतूत आरा का जवाब सुन कर मलका और नायला दोनों मुतमइन सी मुस्कुरा दी। “ज़नीरह…..” नायला बेगम ने सामने से गुजरती ज़नीरह को आवाज दी थी।

“जी अम्मी… “वह फौरन उनकी तरफ़ पलटी थी। “बेटा। जरा अपने चाचू को बोलो, इधर हम उनको बुला रहे हैं, फौरन आ जाएं।

“जी अम्मी! मै अभी चाचू को बोलती हूं।” इसके जाने के कुछ देर बाद राशिद उनके सामने मौजूद था। “भाभी! आपने बुलाया?” “हां राशिद! आओ बैठो….हमें तुमसे बात करना थी, तारीख के लिए किन किन को साथ लेकर जाना है?”

सवाल मलका बेगम ने किया था। “मै क्या बताऊं भाभी! जिनको आप चाहें साथ ले जाए।” उन्होंने नेक बख्ती से कहा।

“शादी तुम्हारी है, यह बात तुम ही तो करो और वैसे भी लड़की के कौन से मां बाप बैठे हैं, बेचारी बिल्कुल अकेली है ताया की बेटी शादी कर रही है । उन्होंने ज्यादा लोगों को बुलाने का नहीं कहा ।”

वह कहना कुछ चाह रही थीं, मगर कह न पा रही थीं। “मलका! यह सब छोड़े राशिद! तुम बताओं जोया को लेकर जाना है या नहीं?” सतुत आरा ने यह पूछ कर जैसे मलका की मुश्क़िल आसान कर दी।

“ज़ोया …हां बाजी उसे भी लेकर जाएं। अच्छा है सब मिल कर जाएं वह भी देख ले..।” राशिद ने कहा । “हमें उसे लेकर जाने में कोई एतिराज नहीं है राशिद! वह भी हमारी

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फैमिली का हिस्सा है, मगर तुम भूलो मत जोया ने पहले कितनी जगहों से तुम्हारी शादी रुकवाई है और इस बार हमने इस बात का खास ख्याल रखा है ।

जोया को पता न लगे लड़की कौन है, कहां की है, वर्ना यहां तक तुम्हारी बात न पहुंचती ।” “और उसे वहां ले भी जाते हैं तो क्या गारंटी है, वह कुछ नहीं कहेगी । वह जरूर भूस में चिंगारी वाला काम करेगी ।

तुम सोच समझ कर फैसला करना । अब बात काफी आगे बढ़ गई है । ऐसे में खुदा न करे कुछ होता है तो बदनामी बहुत होगी….।” नायला ने खदशा जाहिर किया, कुछ पल के लिए वह चारों खामोश बैठे रह गए। फिर कुछ देर बाद राशिद बोला ।

“आपकी बात भी सही है, मगर भाभी यह भी ठीक नहीं लगता, हम अगर जोया को न बुलाएं जोया ही क्या वकार भी बुरा मानेगा ।

ऐसा करते हैं हम उन्हें सरसरी सा बलावा दे देते हैं और मुझे नहीं लगता जोया जाने के लिए तय्यार होगी, वह खुद ही इन्कार कर देगी ।”

राशिद की बात में दम तो था….इसी लिए उन तीनों ने उसकी बात से इत्तिफाक किया था। “जी तो अब मैं जाऊं।” राशिद ने इजाज़त तलब निगाहों से उनकी तरफ देखा था।

“हां जाओ….।” राशिद सर हिलाता कमरे से जा चुका था, नायला और मलक़ा मिल कर सामान समेट रही थीं और साथ साथ सतूत आरा से बातें भी कर रही थी ।

उन लोगों के अन्दाजे के खिलाफ जोया उनके सरसरी बुलावे पर भी उनके साथ जाने को तय्यार हो गई थी । वह लोग अपनी बात में खुद फंस चुके थे।

मगर अब किया ही क्या जा सकता था तो न चाहते हुए भी तारीख तय करने वह जोया के साथ लड़की वालों के घर पहुंच चुके थे, जहां उनका इस्तिकबाल अच्छे अन्दाज में किया गया था।

उनके साथ आने वालों की तादाद ज्यादा न थी। बस घर के मर्द और औरतें शामिल थी लड़की के घर में भी ज्यादा भीड़ नहीं थी । उनके घर के लोग ही उनके इस्तिकबाल को मौजूद थे ।

सलाम दुआ के बाद सब बैठक में बैठे खुश गप्पों में मशगूल थे । “बेगानी की शादी में अब्दुल्लाह दीवाना । हम सब तो यहां बातों में लगे हुए है भई जिसकी शादी है जो इस महफिल की “चीफ गेस्ट” हैं उसे तो बुलाओ ।”

सतूत आरा ने खुशगवार अन्दाज में नसीम (होने वाली दुल्हन) को बुलाने को कहा। “बाजी वह तय्यार हो रही है, बस आती ही होगी।”

बेनीश, नसीम की तायाजाद बहन ने जवाब दिया । उसकी बात पर वे सर हिलाती वह सब दोबारा बातों में मसरूफ हो चकी थीं। जोयां खामोश नजरों से चारों तरफ देख रही थी।

कुछ देर बाद नसीम की आमद हुई… सतूत आरा, मलका और नायला ने उठ कर उसे प्यार किया और अपने साथ बिठा लिया ।

वह कुछ देर ही उनके साथ बैठी, फिर उठ कर अन्दर चली गई । खाना लगने की खबर पर वह सब बैठक से उठ कर डाइनिंग रूम में आ गए ।

मलका और नायला जो अब तक जोया पर नज़र रखे हुए थीं डाइनिंग रूम में आने के बाद जरा सी नजर उससे चूकी और वह अपना काम दिखा गई ।

वह सब खाने में मसरूफ थे जोया वाशरूम का बहाना करके वहां से हट गई और किचन में जा पहुंची, जहां बेनीश खाना डिशेज में निकालने में मसरूफ थी ।

“आपका वाशरूम किधर है?” वह बात करने का बहाना चाहती थी । “अरे आप ने बाहर किसी बच्चे को कहा होता वह आपको सीधा वाशरूम ले जाता ।” बेनीश बड़े अख्लाक से पेश आई थी।

“कोई बात नहीं….सब बिजी थे तो मैं खुद इधर चली आई ।” “वैसे आप नसीम की क्या लगती है ?” वाशरूम को भूले छानबीन का आगाज कर चुकी थी ।

“मैं नसीम की ताया की बेटी हूं, नसीम का भी कोई भाई बहन नहीं और मेरा भी कोई बहन भाई नहीं । नसीम के मां बाप की मौत हुई तो मैं उसे अपने पास ले आई थी ।” बेनीश ने तफ्सील से बताया।

“अच्छा… और अब आप उसकी शादी करके यह बोझ उतारना चाहती हैं ।” जोया ने चलाकी से पत्ता फेंका था ।

“बोझ…अरे नहीं, नहीं। नसीम मुझे अपनी बहन की तरह अजीज है। इसकी शादी की उम्र हो गई है। इस लिए शादी कर रहे है।” उसने ज़ोया की बात सही की थी ।

“आपकी बहन की तरह अजीज है, फिर भी अपनी कुआरी बहन की शादी तलाकशुदा आदमी से कर रही हैं। “जोया खुल कर सामने आई थी। बेनीश ने चौंक कर उसकी तरफ देखा।

“आप कौन है…?” जोया पहली मर्तबा उनके घर आई थी और आज तारीफ के दौरान भी बेनीश ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, इसीलिए उससे सवाल कर लिया।

“जोया हूं राशिद की साली भी और छोटी भाभी भी…. ।” ज़ोया ने अपनी नजरें उसके चेहरे पर गाड़ा रखी थीं।

“राशिद की पहली बीवी की बहन… ।” बेनीश का लहजा बहुत धीमा था। “जी ठीक पहचानी आप….।”

“आपकी बहन ने तलाक क्यों ली थी?” “मेरी बहन ने तलाक नहीं ली, राशिद ने खुद दी वह उसे साथ ही नहीं रखता था। शायद उसे औरत जात का साथ पसन्द नहीं है ।

जब भी मेरी बहन इसके साथ रहने आती वह बहुत लड़ता और मारपीट कर वापस अम्मी के घर भेज देते….और फिर खुद ही तलाक देकर फारिग कर दिया और अब आपकी तरह मेरी जेठानियां भी इसकी जिम्मेदारी उठाते उठाते थक गई हैं ।

जब ही उतावली हो रही हैं इसकी शादी करवाने को । जोया ने गलत बेयानी की इन्तिहाई कर दी थी।” “अच्छा मैं वाशरूम जाती हूं।” वह अपना काम कर चुकी थी, इसलिए शान बेनियाजी से बेनीश को खामोश छोड़ कर उसके बताए रास्ते की तरफ चल दी।

जब सब खाना खा चुके तो सतूत आरा ने तारीख तय करने को कहा। “मुआफ करना सतूत बहन! हमें ऐसा कहते हुए शर्मिन्दगी महसूस हो रही है, मगर अब यह शादी मुमकिन नहीं है।”

बेनीश ने ज़ैसे धमाका किया था । सबको जैसे सांप सूंघ गया । “आज ऐसे मौके पर इन्कार क्यों?” सबके लबों पर यही एक सवाल था।

“लेकिन क्यों…..क्यों बेनीश? घर बुला कर ऐसे इन्कार, यह हमारी बेइज्जती कर रही हो तुम ….. क्या हम इनकार की वजह जान सकते हैं?” मलका बेगम सरापा सवाल बनी खडी थीं ।

“इन्कार की वजह तो आप सब खुद भी जानते हैं । यह अलग बात है हम से छुपाया गया और हमने शराफत में राशिद के बारे में जरा सी भी छानबीन नहीं करवाई ।

यह तो भला हो जोया का जिसने ऐन वक्‍त पर यह हमें हकीकत से आगाह कर देती, इसीलिए आप लोग आज तक इसे अपने साथ नहीं लाए।” बेनीश वह बोल रही थी जो उसके कानों में डाला गया था ।

बदगुमानी की मोटी चादर उसकी अक्ल पर पड़ चुकी थी । वह कुछ भी सुनने और समझाने को तय्यार न थी। “ऐसा कुछ भी नहीं है बेनीश…..यह ज़ोया ।” सतूत आरा, जोया की तरफ पलटी।

“जोया! तुम बाज नहीं आई न अपनी फितरत से… क्यों हमेशा गलत ब्यानी करती हो तुम… तुम्हारी यह मजाल तुम ऐसे मौके पर अपने रंग दिखाओं ।

अभी और इसी वक्‍त हमारे सामने जो हकीकत है वह बताओ ।” सेतूत आरा के अन्दाज में जरा सी भी लचक न थी, मगर वह जोया ही क्या जो डर जाए, वह अपने निडर अन्दाज में फिर से जहर उगलने को तय्यार थी।

“मेंने कुछ गलत तो नहीं कहा । राशिद मेरी बहन से कितना लड़ता था, इससे नाराज होकर घर बैठा रहता था ।”

“छोटी मोटी लड़ाई हर घर में होती है जोया! और मियां बीवी के रिश्ते में भी लड़ाई होना कोई अनोखी बात नहीं है और राशिद नहीं, तुम्हारी बहन खुद अपनी मजी से अपनी मां के घर रहती थी, राशिद ने कभी ऐसा करने को नहीं कहा ।

“बेनीश! यह जो कुछ भी उसने कहा है, सब गलत है।” सतूत आरा बात को संभालने के चक्कर में थी मगर मुआमला हाथों से निकल चुका था।

“नहीं बहन! हमारी तरफ से मुआफी कबूल करे ।” बेनीश की तरफ कोई लचक महसूस नहीं हो रही थी। “अब मैं खुद भी यहां शादी करना नहीं चाहूंगी । बेहतर होगा आप लोग इज्जत के साथ अपने घरों को लोट जाएं।”

खुद नसीम के मुंह से ऐसी बात सुन कर सतूत आरा चुप रह गई। बाकी सब अभी तक खुद को इस सदमे से निकाल ही नहीं पा रहे थे । यह एक दम से क्या हो गया ।

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सबके सब खामोश बैठे रह गए। नसीम के पीछे उसके घर वाले भी उन्हें ड्राइंगरूम में अकेला छोड़ कर जा चुके थे ।

और घर आए मेहमान के लिए इससे ज्यादा बेइज्जती की बात और क्या होगी कि मेजबान खुद उन्हें घर से निकलने का कह कर चले जाए।”

“जोया…. “अकरम साहब की पुकार सख्त गुस्से से भरी हुई थी। “तुम वह सांप हो जिसे हम अपनी आस्तीन में पाल रहे हैं….” “मुझे कुछ मत कहिइएगा भाई साहब…” वह बदतमीजी से बोली ।

“मेरी बहन की जिन्दगी बर्बाद करके अपने भाई के सर पर सेहरा सजाने चले हैं आप लोग….बहुत कोशिश की न आप लोग ने मुझसे छुपाने की….हवा तक न लगने दी

मुझे….इसीलिए साथ आने के लिए तय्यार हुई थी मैं….मेरी बहन को खुशी नहीं मिली तो खुश में राशिद को भी नहीं रहने दूंगी ।”

अपनी बात कह कर वह वहां रुकी नहीं तन फन करती अकेली वहां से निकल गई । जो होना था हो चुका था।

उन सब ने बिना कुछ बोले अपना सामान समेटा और वापस घर आ गए। फिर जिस जिसने यह सुना हैरत से दंग रह गया…जोया ऐसा भी कर सकती है….. चाची पहले पीठ पीछे वार करती थीं, अब इतनी हिम्मत हो गई कि सामने आकर इन्तिहा कर दी…. बेनीश ने किसकी बात पर यकीन कर लिया।

…. ज़ोया हमारी मुखालिफ है और मुखालिफ कभी अच्छा नहीं कह सकता फिर भी बेनीश ने यकीन कर लिया….हैरत की बात है ।

सबको इस रिश्ते के टूटने का बहुत दुख हुआ था और जब यह सब खुद राशिद ने सुना तो कुछ लम्हा बोलने के काबिल ही न रहा….और जब बोला तो बहुत सर्द लहजे में बस इतना कहा ।

“वकार के दम पर जोया की हिम्मत बढ़ी हैं। मैं आज और अभी जोया और वकार से रिश्ता खत्म करने का इजहर करता हूं।

आइन्दा आप में से भी कोई मुझे उनसे मिलने के लिए नहीं कहेगा….।” राशिद ने खुद को अपने कमरे तक ही महदूद कर लिया था। उनके दुख का अन्दाजा उन सब को था।

किसी में इतनी हिम्मत न हुई इस टूटे हुए शख्स को फिर से जोड़ सके, हां बस इतना हुआ कि मलका और नायला फिर से लड़की की तलाश में सरगर्म हो गई….और यह उन दोनों

ही की मेहनत का नतीजा था कि इस इन्कार के ठीक दो महीने बाद वह दूसरी लड़की ढूंढ लेने में कामयाब हो गई ।

उनकी सब तय्यारी पहले से मुकम्मल थी ओर लड़की वाले भी जल्द शादी के ख्वाहिश मन्द थे, इसलिए फौरन ही रिश्ता तय पा गया । इस बार जोया और वकार को बुलाने की भी जहमत किसी ने गवारा नहीं की थी।

लड़की भी मिडिल घराने से तअल्लुक रखती थी । इसीलिए तारीख पर सादगी से राशिद मलीहा की शादी हो गई और अब मलीहा अपने घर से विदा होकर राशिद के घर पहुंच चुकी थी ।

जहां बड़ों के साथ पूरी बच्चा पार्टी ने भी खुले दिल और फैली बाहों के साथ इसका इस्तकबाल किया था ।

इस शादी पर सबसे ज्यादा खुश गुड़िया थी। “यह वाली चाची बिल्कुल ठीक मैच करती हैं हमारे आडियल चाचू के साथ… परफेक्ट जोड़ी….. ।”

वह जितनी खुश थी, उसका इजहार भी दिल खोल कर रही थी । तमाम रस्मों की अदायगी के बाद मलीहा को राशिद के कमरे में पहुंचा दिया गया था और अब राशिद घूंघट में छिपी मलीहा के सामने विराजमान था।

धीरे धीरे उसका घूंघट उठा कर मुंह दिखाई के नाम पर सोने की खूबसूरत सी अंगूठी उसकी उंगली में पहना दी।

“आप और मैं जिन्दगी की नई शुरूआत करने जा रहे हैं, मगर इससे पहले मैं चाहूंगा अगर आपके दिल में मेरी बीती जिन्दगी के बारें में कोई सवाल है तो आप अभी मुझसे पूछ कर क्लीयर कर लें।

मैं नहीं चाहता नई जिन्दगी की शुरूआत के साथ आपके दिल में कोई सवाल फांस की तरह चुभता रहे…. मलीहा ने धीरे से निगाहें उठा क़र उसकी तरफ देखा था।

“हां पूछे आप जो पूछना चाहती हैं।” कुछ बोलने को होते उसके लबों को देख कर राशिद ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर जैसे उसका हौसला बढ़ाया था।

“आपने अपनी पहली बीवी को तलाक क्यों दी….?” उसके सवाल को सुन कर राशिद ऐसे मुसकुराया जैसे वह जानता हो, मलीहा की तरफ से यही सठाल होगा…. ।

“शहनाज मेरी बीवी थी और हर नॉमर्ल इन्सान की तरह मैंने भी शादी से पहले एक अच्छी और खुशगवार जिन्दगी गुजारने का खुवाब देखा था, मगर शादी के पहले दिन ही मेरा ख़्वाब टूट गया ।

शहनाज एक हट धर्म और जिद्दी औरत थी, पहले दिन मैंने उससे कहा- “तुम अपनी अम्मी के घर शाम में मेरे साथ चलना ।” वह यह सुनकर तेज़ गुस्से में आ गई और चीखने लगी ।

“क्या मैं आपकी वजह से अपनी मां से न मिलूं… मेरी मां वहां मेरे इन्तिजार में होगी।” मैं खामोश हो गया । यह पहला दिन था।

“फिर हमेशा उसे मेरी बातों से इख्तलाफ रहा। वह हमेशा अपनी मर्जी करना चाहती थी। यहां से ज्यादा वह अपनी मां के घर रहना पसन्द करती थी । उसकी बहन मेरी भाभी थी।

उसने भी कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन वह शायद मेरे साथ रहना नहीं चाहती थी । फिर एक दिन वह अपनी मां और अपने भाइयों के साथ आई और तलाक मांगा और अपना सामान उठा कर चली गई…. ।”

राशिद सब कह कर खामोश हो गया कुछ पल इसी खामोशी की नजर हो गए… जब मलीहा ने राशिद के हाथों में दबे अपने हाथों को हिला कर उसे अपनी तरफ मुतवज्जोह किया और वाकई राशिद सर झटक कर उसकी तरफ मुत्वज्जोह हुआ था।

“मैं लड़ाई झगड़े से दूर एक पूर सुकून जिन्दगी चाहता हूं….क्या उस में आप मेरा साथ देंगी….?” “जी आप हमेशा मुझे अपने संग पाएंगे… … ।” मलीहा ने उसे अपने साथ यकीन दिलाया था। राशिद पुरसुकून सी हंसी हंस दिया ।

राशिद, मलीहा के साथ खुशगवार शादीशुदा जिन्दगी गुजार रहा था । उसकी शादी को पांच महीने हो चुके थे सर्दियों की आमद आमद थी।

इस लिए आज मलीहा अपनी दोनों जेठानियों नायला और मलका के हमराह सर्दी के कपड़ों की खरीदारी के लिए बाजार आई हुई थी।

जब वह एक दुकान में दाखिल हुई तो मलका की नजर नसीम और बेनीश पर पडी, मलका ने एक दम ही नायला को उन्हें दिखाया था।

दोनों ने एक साथ एक दूसरे को मानीखेज नजरों से देखा और ऐसे सर हिलाया जैसे वह आपस में किसी बात पर मतफिक हो गई हों….मलका ने मलीहा का हाथ पकडा और बेनीश के सामने जा खड़ी हुई।

“बेनीश क्या हाल है आपका….?” बेनीश और नसीम चौंक कर उनकी तरफ मुतवज्जोह हुई थीं। “क्या हुआ पहचाना नहीं क्या….? हम वहीं है जो नसीम के रिश्ते के लिए आई थीं।

में मलका यह नायला” अपनी तारीफ के साथ उन्होंने सवाल भी दाग दिया । “नसीम की शादी हें गई….?” कुछ ज्यादा वक्‍त तो न गुजरा था जो बेनीश उनको भूल जाती….मगर उनके इस तरह तारीफ कराने पर वह सिसिया सी गई ।

“जी जी मलका बहन! में जानती हूं आप और नायला को….और नसीम की शादी अभी तक नहीं हुई है…. ।” “अच्छा मगर आप इसको नहीं जानती ये हमारे राशिद की दुल्हन मलीहा है

माशा अल्लांह पांच महीने हो गए हमारे राशिद की शादी को…. ।” मलका बेगम ने ना महसूस अन्दाज में मलीहा को नसीम के सामने खड़ा कर दिया ।

मुकम्मल नसीम भी थी, मगर वह अपने कद की वजह से मलीहा के सामने दबी हुई लग रही थी। अच्छा…” बेनीश बस इतना ही कह पाई।

शायद वह अपने पिछले रवैये पर शर्मिन्दा थी। “मेरा मकसद आपको शर्मिन्दा करना हरगिज नहीं बेनीश….और मलीहा से तारीफ करानें का भी कोई खास मकसद नहीं मैंने आपको उस दिन भी यही समझाना चाहा और आज भी वहीं कहूंगी ।

कभी किसी की बात पर उस वक्‍त तक यकीन न करें जब तक खुद सच्चाई को आंखों से देख न लें।

कानों से सुन न ले…..मैं नहीं जानती जोया ने आपको क्या कुछ बताया, मगर आज मलीहा इस बात का सुबूत है कि राशिद एक अच्छा लड़का है जो वाकई एक अच्छी लड़की डिजरव करता था।

उसमें कोई खराबी होती तो हम खुद ही इसकी शादी के लिए न फिरते… खैर नसीम राशिद के नसीब में न थी तो आप और मैं कैसे उनको मिला सकते थे, मगर आईन्दा जिन्दगी में मेरी बात को जहन में रख कर कोई फैसला कीजिएगा… ।”

मलका सोच का एक नया दौर उनके जहनों में ख्रोल कर जिस तरह आई थी उसी तरह मलीहा का हाथ पकड़े आगे बढ़ गई….पीछे नसीम और बेनीश खामोश खड़ी उनके बढ़ते कदमों को देखती रह गई….।

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This Post Has 2 Comments

  1. Hasrat Ali khan

    Best story please update story more thank you

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