Soch ka Dar – Mahakta Anchal Story – महकता आँचल कहानियां

Soch ka Dar by Farah Tahir – Mahakta Anchal Story

सोच का दर – खूबसूरत कहानी – फरह ताहिर

“उफ़ क्या रुस्वा किया है चाचू जान ने ….इसीलिए तो गुस्से को हराम कहा गया है । पल भर के गस्से ने दो जिन्दगियों को केसें दो अलग अलग किनारों पर ला खडा किया। बीबी को तलाक देकर तनहा जिन्दगी गुजारने पर मजबूर हैं बेचारे चाचू जान!”

वह दुपट्टे पर लेस टांकटी हुई लगातार चाचू की शान में कसीदा खावानी कर रही थी। सतूत आरा मुस्कुराहट लबों में दबाए अफसोस के अन्दाज में बोलती भतीजी को देखे जा रही थीं।

“दादी जान इसी ख्वाहिश में कब्र में जा सोई कि किसी तरह मेरे सपूत की शादी हो जाए। यह भी बाकी भाइयों की तरह खुशगवार जिन्दगी गुजार सके मगर न जी! तलाक देने के

बाद दो साल तो वैसे ही तलाक के गम में गुजार दिए, फिर कही जाकर दूसरी शादी के लिए तय्यार हुए भी तो शर्त यह रखी कि लड़की कुआरी हो।

बेवह या तलाकशुदा भी चलेगी, मगर उसके साथ औलाद न हो । कुछ उनकी फरमाइश ने और कुछ हमारी पुरानी चाची जान और उनकी दुलारी बहन ने जो तलाक लेने के बाद भी

हमारी पसन्द की गई लड़की के घर पहुंच कर गलत ब्यानी कर डालती हैं और इतनी मेहनत से तलाश की गई लड़की झट से पराई बन जाती है।” लेस और दुपट्टा गोद में रखे वह सर पकड़ कर बैठ गई ।

उसके चेहरे पर उस वक्‍त अफसोस ही अफसोस था। “सच में यह तलाक देने की सजा मिल रही है चाचू को ।

पहले लड़की नहीं मिलती थी और अब मिली भी तो उसका कद इतना छोटा….कि हमें देखकर ही एतराज हुआ ।

हमारे आइडियल क़द के मालिक चाचू के साथ उसका मैच बिल्कुल भी नहीं सजेगा । मगर चाचू जान की कनाअत देखें, छोटे क़द की लड़की को भी इंकार नहीं कर रहे है फौरन मान गए।” वह जो दोबारा शुरू हो चुकी थी ।

अपनी बात के खत्म पर खुद ही क़हक़हा लगाकर हंस पड़ी । सतूत आरा भी खुल कर मुस्कुरा रही थीं। “कैसे कैंची की तरह जबान चल रही है इसकी और सतूत! आप भी बजाए मना करने के हंस कर इसकी और हिम्मत बढा रही हैं…..तंग आ गई हूं मैं इसकी इस तरह टर टर चलती जबान से…. ।”

मलका बेगम गस्से से बेटी को घूर रही थीं। “अम्मी! मैंने कुछ ग़लत तो नहीं कहा ।” उसने ऐतराज किया था। इससे पहले की मलका बेगम बोलें सतूत आरा बोल पड़ी।

“बेशक गुडिया! तुमने कुछ गलत नहीं कहा मगर जो गुजर गया उसे जाने दो ना और हम सब जानते हैं जो भी हुआ इसमें राशिद से ज्यादा शहनाज और उसके घर वालो की गलती थी । राशिद ने तलाक गुस्से में दी।”

“एक मिनट फूफी जान!” गुड़िया ने हाथ उटा कर उनकी बात बीच में रोक दी । वह गुस्सा नहीं था वह तो उन लोगों की ललकार का जवाब था। उन्होंने ललकारा ।

“मर्द हैं तो हमारी बेटी को अभी तलाक दें ।” फिर चाचू जान कैसे न अपनी मर्दानगी का सबूत पेश करते फट से “एक दो, तीन” कर दी….यह मर्दानगी नहीं थी उनकी, अस्ल

मर्दानगी यह थी वह बीवी का हाथ पकड कर कमरे में बन्द करते और उनके घर वालों को निकाल बाहर करते, अगर यह मर्दानगी दिखाई होती न तो यह चार साल का बनवास काटना पड़ता और ज्यादा नहीं तो दो तीन चयांव मयांव के अब्बा जी भी बन चके होते ।”

इसका जोर व शोर से जारी ब्यान न जाने और कहां तक पहुंचता कि मलका बेगम ने झुक कर पास पडी चप्पल उठाई और माहिर निशाने बाज की तरह उसकी कमर पर दाग दी…उसकी चलती जबान को एक दम ही ब्रेक लगे थे।

“अम्मी….” उसकी आंखों में फौरन नमी उतर आई थी। “कब से मना कर रही हूं, मगर मजाल है जो यह लड़की चुप हो जाए बस बहुत बोल लिया । लाओ दिखाओ कहां तक लेस टंकी है।

वह मुंह फूलाए खामोशी से उठी और दुपट्टा उनके हाथ में देकर दरवाजे की तरफ चली गई । बीच दरवाजे पर रुक कर पीछे मुड़ी थी।

“मगर मैं आखिरी बात कह कर ही जाऊंगी। खबरदार जो आप लोगों ने उस लड़की का हस्ब नस्ब या अता पता छोटे चाचू या और किसी को बताया तो….वर्ना जेसे ही उनको

लड़की का पता लगेगा छोटी चाची फौरन पहुंच जाएंगी और फिर वह होगा जो चार साल से होता आया है फिर हाथ मलते रह जाना आप लोग ।” अपनी बात मुकम्मल करके वह झपाक से बाह निकल गई ।

मलका बेगम और सतूत आरा दोनों ही हंस पड़ी थीं। अलीमुद्दीन की सात औलादें थीं, तीन बेटियां और चार बेटे ।

बड़े बेटे अकरम, दूसरे इफ्तिखार, तीसरे राशिद और छोटे वकार, अकरम और इफ्तिखार से छोटी सतूत आरा थीं । बाकी दो बेटियां वफात पा चुकी थीं।

अकरम और इफ्तिखार की शादियां अलग अलग घर में हुई थीं। दोनों ही अपनी फैमिली के साथ खुशगवार जिन्दगी बसर कर रहे थे ।

जबकि राशिद और वकार की शादी एक ही घर में हुई थी, शहनाज और जोया दोनों बहनें थी । जोया थोड़ी तेज मिजाज की लड़की थी, मगर फिर भी इसकी वकार के साथ बनती थी ।

वजह थी वकार का नेक और अच्छा अन्दाज। जैसे के शहनाज़ तेज मिजाज न थी, मगर फिर भी न जाने क्या वजह थी कि शुरू के दिनों के अलावा कभी उसकी और रशिद की आपस में नहीं बनती थी ।

शहनाज का ससुराल में दिल कम ही लगता था, इसलिए वह ज्यादातर अपने मायके में पाई जाती थी।

और कभी ससुराल में जलवागर हो भी जाती तो कुछ रोज से ज़्यादा उसका कयाम ससुराल में न होता, फिर किसी न किसी बात को बहाना बना कर नाराज होती और मायके जा बैठती ।

ऐसे हालात के बावजद उनकी शादी तीन साल रही और फिर शहनाज खुद ही तलाक की फरमाइश करके अलग हो गई । अलीमुद्दीन के तमाम बेटे, बाप के छोड़े घर में ज्वाइंट

फैमिली सिस्टम के तहत रिहाइंश पजीर थे, मगर शहनाज की तलाक के बाद उसकी बहन जोया ने इस घर में रहना पसन्द नहीं किया और अपने शौहर और बेटी के साथ अलग घर में जा बसी ।

बाकी तीनों भाई इसी घर में मौजद थे । अकरम और इफ्तिखार के पोरशन इसी तरह आबाद थे, मगर राशिद तन्हा जिन्दगी गजार रहा था।

मां की वफात के बाद बिल्कुल ही अकेला हो गया था । फिर भी इसकी दोनों भाभियां उसका अपने बेटे की तरह ख्याल रखती थीं।

उन ही की लगन का फल था कि तलाक के बाद उन्होंने बेशुमार लडकियां तलाश कीं, हर मर्तबा किसी न किसी बिना पर कभी उनकी तरफ से तो कभी लड़की वालों की तरफ से

रिश्तें से इन्कार हो जाता, फिर भी उन्होंने हिम्मत न हारी, यह इसी बात का नतीजा था एक बार फिर उन्होंने लड़की तलाश कर ही ली थी, जिसका उन्हें सौ फीसद यकीन था कि इस बार राशिद की शादी जंरूर ही हो जाएगी।

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